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होली पर केमिकल वाले रंगों की एलर्जी से बचाने के लिए वन विभाग ने तैयार किए सिंदूरी के पौधे

Banswara News - होली पर केमिकल से युक्त रंगों से लोगों को एलर्जी और दूसरी परेशानियों से बचाने इस बार वन विभाग ने अपनी नर्सरियों...

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2018, 02:10 AM IST
होली पर केमिकल वाले रंगों की एलर्जी से बचाने के लिए वन विभाग ने तैयार किए सिंदूरी के पौधे
होली पर केमिकल से युक्त रंगों से लोगों को एलर्जी और दूसरी परेशानियों से बचाने इस बार वन विभाग ने अपनी नर्सरियों में दुर्लभ प्रजाति के सिंदूरी के पौधे तैयार किए हैं। कुछ पौधों के बीज तक निकल आए है। जिनसे काफी मात्रा में लाल रंग बनाया जा सकता है।

वन अधिकारियों का मानना है कि केमिकल वाले रंगों की तुलना में औषधीय गुणों से भरपूर सिंदूरी के बीजों से बने रंग का इस्तेमाल करने से एलर्जी का खतरा कम हो जाता है। इसी मंशा से साल 2009 में प्रायोगिक तौर पर सिंदूरी के कुछ पौधे नर्सरियों में लगाए गए थे। सिंदूरी को बांसवाड़ा की आबोहवा रास आने पर इसके 5 हजार पौधे लगाने की योजना बनाई है। इसके अलावा सेमल और पलाश के पौधे से भी प्राकृतिक रंग बनाया जा सकता है।

नर्सरी प्रभारी रहे और सेवानिवृत्त क्षेत्रीय वन अधिकारी सीपी पुरी बताते है कि सिंदूरी दक्षिण अफ्रीका में बहुतायत में पाया जाता है। भारत के भी कुछ हिस्सों में यह मौजूद है लेकिन काफी कम संख्या में। इसीलिए बांसवाड़ा की हाईटेक नर्सरी में मेरे कार्यकाल के समय इन्हें तैयार किया गया था। इसके एक पौधे से हजारों बीज निकलते हैं। एक बीज में सैकड़ों दाने होते है।

हाईटेक नर्सरी में साल 2009 में प्रायोगिक तौर पर की थी शुरुआत, इसके थोड़े ही बीजों से बनता है प्राकृतिक लाल रंग

इस तरह लाल रंगों से भरे होते हैं सिंदूरी के बीज।

9 साल पहले शुरू किए थे प्रयास

नर्सरी में साल 2009 में प्रायोगिक तौर पर सिंदूरी के 2000 पौधे रोपे गए थे। पौधों का तीव्र विकास होने पर तांबेसरा के कासला गांव में 200 पौधे और ओसरा पंचायत में 150 सिंदूरी के पौधे और लगाए गए। मौजूदा समय में हाईटेक नर्सरी में सिंदूरी के 150 पौधे तैयार किए गए है। इसके अलावा वनक्षेत्रों में भी लगाए गए हैं। नर्सरी प्रभारी देवेंद्र जोशी बताते है कि नर्सरी में एक पौधे पर तो फल भी उगने शुरू हो चुके हैं।

इस तरह पहचान सकते है सिंदूरी को

सिंदूरी का बायोमैट्रिक नाम बिक्सा ओरेलेना है। इसकी ऊंचाई अधिकतम 2 से 6 मीटर होती है। यह कई रोगों के उपचार में कारगर है। आयुर्वेदिक चिकित्सक पीयूष जोशी बताते है कि इसकी पत्तियां, तना और छाल संक्रमण, हेपेटाइट, मिरगी के दौरे में, किड़नी समस्या, त्वचा रोगों के उपचार में सहायक है। इसकी पत्तियां एंटी ट्यूमर, पित्तरोग, बुखार, दस्त, डायबिटीज और लीवर रोगों की दवाईयां बनाने में लाभदायक है। वहीं भगवान पर चढ़ाया जाने वाला अष्टधंग की कीमत 200 से 250 रुपए प्रति किलो है। जबकि सिंदूरी के एक पौध से ही अच्छी मात्रा में सिंदूरी प्राप्त हो जाता है। इसलिए है फायदेमंद

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