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6 साल पहले एमजी अस्पताल में बीमार 3 साल के बच्चे ने तोड़ा था दम, परिजन अब ढोल बजाकर लेने आए आत्मा

भास्कर संवाददाता | बांसवाड़ा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकारें पुरजोर कोशिश कर रही है...

Dainik Bhaskar

Apr 02, 2018, 03:40 AM IST
6 साल पहले एमजी अस्पताल में बीमार 3 साल के बच्चे ने तोड़ा था दम, परिजन अब ढोल बजाकर लेने आए आत्मा
भास्कर संवाददाता | बांसवाड़ा

शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकारें पुरजोर कोशिश कर रही है बावजूद इसके कई अंधविश्वास आज भी लोगों के जेहन से नहीं निकल पाए हैं। चाहे वह फिर किसी की मौत के सालों बाद भी आत्मा घर लाने जैसे भ्रम से ही क्यो न हो। रविवार को एमजी अस्पताल में ऐसा ही अंविश्वास देखने को मिला। जिसकी वजह से वार्डों में भर्ती मरीजों को खासी परेशानी झेलनी पड़ी। यहां कलिंजरा के बारीगामा के चौपहिया गांव से आए लोग थाली में दीया जलाकर और ढोल बजाकर अस्पताल में घुस आए। इसे देख वहां इलाज के लिए आए लोग भी हैरत में पड़ गए। लोग ढोल बजाते हुए अस्पताल में आए और फिर दीया जलाकर आत्मा ले जाने का टोटका किया। परिजनों से जब पूछा गया कि वह ऐसा किसलिए कर रहे है तो उनका जवाब सुनकर वहां मौजूद हरकोई स्तब्ध रह गया। परिजनों ने बताया कि वह अपने मृत बेटे की भटकती रूह लेने आए हैं। वह भी उस बेटे की जो 6 साल पहले मर चुका था।

परिजनों ने बताया कि 6 साल पहले उनका 3 वर्षीय बेटा हुरमाल एकाएक बीमार पड़ गया था। जिस पर अस्पताल में भर्ती कराया। इलाज के दौरान बेटे की मौत हो गई थी। परिजनों का भ्रम है कि बेटे की माैत के बाद घर में परेशानियां आने लगी। इसे दूर करने के लिए उसकी आत्मा को घर ले जाने आए हैं। दरअसल, बांसवाड़ा के देहात इलाकों में आज भी किसी की मौत पर यह अंधविश्वास है कि जिस जगह व्यक्ति की माैत हुई उसकी रूह वहीं भटकती है। इसी अंधविश्वास के चलते परिजन मृतक की रूह लेने के लिए उसी जगह दोबारा जाते हैं और टोटका करते हंै। लौटने पर ग्रामीणों को जीमण भी दिया जाता है। इसी अंधविश्वास के चलते परिजनों को रुपए के बंदोबस्त करने में कई बार सालों लग जाते हैं।

पहले भी प्रकरण आए हैं सामने

एमजी अस्पताल में यह कोई नई बात नहीं हैं। मेल वार्ड हो या फीमेल वार्ड, या फिर कोई अन्य संवेदनशील वार्ड। आत्मा वहीं से ले जाई जाती है, जहां मरने वाले व्यक्ति की मौत हुई हो। इस कारण वार्ड में अन्य मरीजों को भी परेशानी उठानी पड़ती है, और उनकी सेहत पर भी विपरित असर पड़ता है, लेकिन अस्पताल प्रबंधन की ओर से कोई प्रतिबंध नहीं है।

अस्पताल और पुलिस प्रशासन बना मूकदर्शक

महात्मा गांधी अस्पताल से रविवार को बच्चे की आत्मा ले जाते लोग।

डॉक्टर : रूह जैसी बात नहीं

फिजिशियन डॉ. देवेश गुप्ता बताते हैं कि अस्पताल में किसी भी मरीज की मौत के बाद आत्मा ले जाने का अंधविश्वास नया नहीं है। यहां अक्सर देहात से लोग अपने मृतक परिजन की आत्मा ले जाने के नाम से ढोल बजाकर आते हैं। मेडिकल साइंस की बात करे किसी की मौत के बाद उसका शरीर ही रहता है रूह जैसी कोई चीज नहीं होती। उल्टा इससे मरीजों को परेशानी होती है।

असर : ये है मरीजों को खतरा

अस्पताल जैसे संवेदनशील जगह पर शोर शराबा और ढोल नगाड़ों के बजने से भर्ती मरीजों को तकलीफ होती है। अधिक संख्या में लोगों के वार्डों में घुसने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। जबकि आईसीयू, एसएनसीयू, पोस्ट ऑपरेटीव जैसे वार्ड में तो मरीज के अलावा किसी और के प्रवेश पर भी रोक है। कई बार परिजन आत्मा लेने के भ्रम में इन वार्डों तक में घुस आते हैं।


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