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14 साल बाद बदलाव, कॉलेजाें को फायदा पर कर्मचारियों को नहीं

कॉलेजों में करोड़ों की छात्र निधि के इस्तेमाल के लिए सरकार ने प्राचार्यों के अधिकार तो बढ़ा दिए, लेकिन 14 साल बाद भी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 07:30 AM IST

कॉलेजों में करोड़ों की छात्र निधि के इस्तेमाल के लिए सरकार ने प्राचार्यों के अधिकार तो बढ़ा दिए, लेकिन 14 साल बाद भी इसका लेखा-जोखा रखने वाले कर्मचारियों को कोई लाभ नहीं दिया है। अब भी कर्मचारी इस अतिरिक्त जिम्मेदारी को पुराने ढर्रे पर ही संभालने को विवश है।

दरअसल, सरकार ने हाल ही राजस्थान राज्य छात्र निधि नियम 1970 के प्रावधानों में संशोधन कर स्नातक स्तर के कॉलेज प्राचार्य को एक लाख की बजाय 8 लाख रुपए सालाना राशि इस निधि से कॉलेज के कार्यों पर खर्च करने का अधिकार दिया है।

स्नातकोत्तर कॉलेज के प्राचार्यों को 1.5 लाख के मुकाबले अब 10 लाख रुपए तक खर्च करने का अधिकार मिल गया है, जबकि इससे ज्यादा बड़ी लागत के निर्माण कार्यों या खर्च पर अब सरकार की मंजूरी पर निर्भर रखा गया है। हालांकि इसका दायरा बढ़ाकर सरकार की मंजूरी से 15 लाख रुपए तक की राशि छात्र निधि से लेकर खर्च करने में प्राचार्य सक्षम हो गए हैं, लेकिन पेच यह है कि इसका लेखा-जोखा रखने के लिए केश बुक लिखने का जिम्मा संभालने वाले बाबुओं के लिए कोई संशोधित प्रावधान नहीं किया है। जब नियम बने, तब कॉलेजों में छात्र-छात्राओं की संख्या सैकड़ों में थी, जो अब हजारों में हो चुकी हैं।

छात्रों पर अलग लिपिक रखने का प्रावधान पर अमल नहीं

राजस्थान राज्य छात्र निधि नियम 1970 के प्रावधानों पर गौर करें, तो इसके तहत 500 विद्यार्थियों तक छात्र निधि की केश बुक लिखने के लिए बाबुओं के लिए 10 रुपए, इससे ज्यादा और अधिकतम 1000 छात्र-छात्राओं तक 20 रुपए और एक से दो हजार विद्यार्थियों तक के लिए 40 रुपए देय रहे। फिर 2004 में संशोधन से 5000 विद्यार्थथ्यों तक इसे 100 रुपए, 500 से 1000 तक के लिए 200 रुपए और 1000 से ज्यादा छात्र-छात्राओं के लिए 600 रुपए फिक्स देना तय हुआ। ऐसे में जबकि छात्र और छात्रनिधि का खर्च सीमित रहे, तो ज्यादा मुसीबत नहीं थी। अब छात्रों की संख्या भी सरकारी कॉलेजों में हजारों है और छात्रनिधि खर्च करने का अधिकार भी कई गुना बढ़ा दिया गया है, तो काम बढ़ने पर भी बाबुओं के लिए कोई नई व्यवस्था नहीं दी है। ताज्जुब यह है कि 2000 से ज्यादा छात्रों पर छात्रनिधि की केशबुक लिखने का दायित्व संभालने का काम अतिरिक्त लिपिक रखकर करने का कायदा पहले भी था और अब भी है, लेकिन आज तक किसी कॉलेज में अलग जिम्मा किसी को नहीं सौंपा गया और मौजूदा स्टाफ ही जैसे-तैसे यह काम करता रहा है।

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Web Title: 14 साल बाद बदलाव, कॉलेजाें को फायदा पर कर्मचारियों को नहीं
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