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न्यायिककर्मियों की शेष मांगों पर शीघ्र विचार करे सरकार

जोधपुर | हाईकोर्ट ने राजस्थान राज्य न्यायिक कर्मचारी संघ की ओर से दायर याचिका को निस्तारित करते हुए शेट्टी पे...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 02, 2018, 06:40 AM IST

जोधपुर | हाईकोर्ट ने राजस्थान राज्य न्यायिक कर्मचारी संघ की ओर से दायर याचिका को निस्तारित करते हुए शेट्टी पे कमीशन की सिफारिशों को शीघ्र लागू करने को कहा है। सरकार की ओर से पैरवी करते हुए एएजी पीआर सिंह व अधिवक्ता दिनेश ओझा ने कोर्ट को बताया, कि कुछ मांगे पूर्व में सरकार द्वारा मान ली गई थी। हाईकोर्ट की ओर से गठित कमेटी व सरकार ने कुछ मांगों को मान लिया था, दो तीन मांगे ऐसी है जो अभी तक विचाराधीन हैं। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए कि जो मांगे शेष रही है, उन पर अगले चार महीने में विचार कर उन्हें स्पीकिंग आदेश से पारित किया जाए। उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट में वर्ष 2012 से ही कर्मचारी संघ की याचिका विचाराधीन थी। हाईकोर्ट का आदेश आने के बाद राज्य न्यायिक कर्मचारी संघ ने खुशी जाहिर की है।

समायोजित शिक्षाकर्मी भी पेंशन के हकदार, सरकार परिलाभ दे

जोधपुर | हाईकोर्ट ने आंशिक रूप से रिट याचिका स्वीकार करते हुए राजस्थान स्वेच्छा ग्रामीण शिक्षा सेवा नियम 2010 के तहत राज्य सरकार में समायोजित होने वाले अनुदानित शिक्षण संस्थाओं के कर्मचारियों को राजस्थान सिविल सेवा पेंशन नियम 1996 के तहत पेंशन परिलाभ देने का महत्वपूर्ण आदेश दिया है।

याचिकाकर्ता राजस्थान समायोजित शिक्षाकर्मी वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष सरदारसिंह बुगालिया ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महेन्द्रसिंह सिंघवी ने तर्क दिया कि एक ओर तो राज्य सरकार द्वारा संस्था के सदस्यों को राज्य सरकार में समायोजित किया गया है और दूसरी ओर इन कर्मचारियों को इन नियमों के अंतर्गत समायोजन के लिए अंडरटेकिंग भरना अनिवार्य किया गया है।





इस अंडरटेकिंग में यह लिखवाया गया कि कर्मचारी अपनी सेवानिवृत्ति तक पदोन्नति के लिए कोई क्लेम नहीं करेगा तथा राजस्थान सिविल सेवा (अंशदान पेंशन) नियम 2005 के प्रावधानों से शासित होंगे। गैर सरकारी शिक्षण संस्था द्वारा अंशदायी भविष्यनिधि अंशदान राज्य सरकार में समायोजित होने से पहले अगर जमा नहीं करवाया गया तो किसी प्रकार का राज्य सरकार से क्लेम नहीं करेगा।

सिंघवी ने कहा कि यह अंडरटेकिंग सम्पूर्णतः गैरकानूनी तथा असंवैधानिक है। उनके द्वारा यह तर्क दिया गया कि एक बार जब राज्य सरकार द्वारा 2010 के नियम बनाते हुए अनुदानित शिक्षा कर्मियों को राज्य सरकार में समायोजन के लिए निर्णय लिया जाकर समायोजित किया गया। उनकी वेतनवृद्धि व चयनित वेतनमान के लिए जब अनुदानित शिक्षणसंस्था की सेवा को शामिल किया तो ऐसी स्थिति में पेंशन के लिए भी वह सेवा मान्य होगी।

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता पीआर सिंह ने बहस करते हुए यह तर्क दिया कि कर्मचारियों द्वारा 2010 के नियमों में समायोजन के लिए स्वेच्छा से अंडरटेकिंग दी है, इसलिए अब वे अपनी इस अंडरटेकिंग को न्यायालय में चुनौती नहीं दे सकते।

जस्टिस व्यास एवं गर्ग की खंडपीठ ने इस विवाद को अभिनिर्णित करने के लिए चार प्रश्न रखे। कोर्ट ने अधिनिर्णीत किया कि अनुदानित संस्थाओं के कर्मचारियों, जो कि राजस्थान सिविल सेवा (अंशदायी पेंशन) नियम 2005 से पहले के नियुक्त थे, को पेंशन नियम 1996 से वंचित रखना गैर संवैधानिक है यह भी निर्णित किया गया कि सभी कर्मचारी जो कि अनुदानित पदों पर राजस्थान सिविल सेवा (अंशदायी पेंशन) नियम 2005 से पहले कार्यरत थे एवं 2010 के नियमों में समायोजित हुए, उन कर्मचारियों पर राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम 1996 प्रभावी होंगे तथा इन कर्मचारियों द्वारा समायोजन के पश्चात् प्रोविडेण्ट फण्ड की राशि जो कि उनके द्वारा उठाई गई थी, को दो माह के अन्दर 6 प्रतिशत ब्याज के साथ राज्य सरकार में जमा करानी होंगी अन्यथा वे कर्मचारी पेंशन नियम 1996 के परिलाभ पाने के अधिकारी नहीं होंगे। कोर्ट ने यह भी निर्णीत किया कि राज्य सरकार इन कर्मचारियों को शहरी इलाकों में सेवाएं लेने के लिए स्वतन्त्र है।

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