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सबसे ज्यादा बारिश वाले इलाके में रेगिस्तान, रेत के टीलों-सा नजारा

प्रियंक भट्ट/भुवनेश द्विवेदी| बांसवाड़ा प्रदेश में सर्वाधिक औसत बारिश हमारे बांसवाड़ा में हाेती है। यहां एक...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 01, 2018, 03:30 AM IST

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    प्रियंक भट्ट/भुवनेश द्विवेदी| बांसवाड़ा

    प्रदेश में सर्वाधिक औसत बारिश हमारे बांसवाड़ा में हाेती है। यहां एक सीजन में औसत 1000 मिलीमीटर बरसात होती है। संभाग का सबसे बड़ा मानवनिर्मित माही बजाज सागर बांध भी हमारे यहां है। बावजूद इसके आपको जानकार हैरानी होगी कि शहर से 35 किमी दूर कटूंबी पंचायत में 4 गांव ऐसे भी हैं जहां गर्मी के 60 दिन(मई-जून) में सूखे के हालात पनपते हैं। 100 फीट से भी ज्यादा ऊंचाई पर बसे इन गांवों की पहाड़ियां उजड़ने के बाद नजारा थार के रेगिस्तान से कम नहीं होता। दूर-दूर तक नजर आती है तो सिर्फ सूखी पहाड़ियां। दूर से यह पहाड़ियां बीकानेर-जैसलमेर के रेत के टीलों सी नजर आती है। हमारे संवाददाता ने रविवार को 100 फीट ऊंचाई पर बसे गांवों का जायजा लिया तो कुछ ऐसी तस्वीर सामने आई। हांदड़ियापाड़ा, हरियापाड़ा, परतपाड़ा और खेड़ापाड़ा। पहाड़ियों के बीच बसे ये छोटे गांव ऐसे हंै जहां सड़क तो पहुंच गई लेकिन बिजली और पीने के पानी का अब तक सही बंदोबस्त नहीं है। गर्मियों के दिनों में आज भी ग्रामीण कुआें और नदी के सूखे पेटे में कुंडी बनाकर पानी सहेज रहे हैं। ऐसे हालातों में इतनी ऊंचाई पर रहने वाले इन ग्रामीणों को पीने के पानी के जुगाड़ के लिए पहाड़ी चढ़ना उतरना पड़ रहा है। पानी के जुगाड़ में ही इन ग्रामीणों का आधा दिन गुजर रहा है।

    माही बांध के पीछे बसे चार गांवों में सूखे के हालात

    560 करोड़ की योजना से बंधी पानी पहुंचने की आस

    सूखे की मार झेलने वाले इन गांवों में पीने का पानी पहुंचाने सरकार ने वृहद पेयजल परियोजना की शुरुआत की है। योजना के तहत 560 करोड़ की लागत से बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के 334 गांवों में पीने का पानी पहुंचाया जाएगा। खास बात यह है कि इस योजना का शुरुआती काम इन्हीं गांवों से शुरु किया गया है। ज्यादातर जगह पाइप लाइन बिछाने का काम शुरू हो चुका है। ऐसे में पीढ़ियों बाद इन गांवों सहजता से पीने का पानी मिलने की आस बंधी है। स्थानीय बाबूलाल मोरी बताते है कि मई-जून में पीने के पानी की खासी परेशानी रहती है। नदी के सूखे पेंदे में थोड़ा पानी जमा रहता है जिससे मवेशियों के पीने के पानी का जुगाड़ हो जाता है। शहर जाने निकले तो सूखी पहाड़ियों के बीच रास्ते में दूर तक छांव नसीब नही होती।

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