- Hindi News
- National
- Banswara News Rajasthan News Corona D America Britain Not Far Away From Situation Like Italy On Better Control In Korea
कोरोना: द. कोरिया में बेहतर नियंत्रण पर इटली जैसे हालात से अमेरिका, ब्रिटेन ज्यादा दूर नहीं
चीन में थोड़ा नियंत्रण हुआ पर बीमारी फिर फैलने का अंदेशा
निजी कंपनियों को पैसे की कमी से जूझना पड़ेगा
Âविश्व के शेयर बाजारों में 20% गिरावट आई है। 10 से 15% कंपनियों को पैसे की कमी का सामना करना पड़ेगा।
Âअमेरिका की आर्थिक गतिविधियों पर कोरोना का असर दिखाई पड़ने लगा है। बेरोजगारी बढ़ी।
 चीन में वायरस का असर कम हो रहा है। 60% के स्वस्थ होने का दावा। खेती पर असर पड़ेगा।
Âइटली में सिर्फ दैनिक जरूरत की चीजें खरीदने के लिए बाहर निकल सकते हैं।
 ईरान में 24 सांसद प्रभावित। अर्थव्यवस्था को 25-30% नुकसान का अंदेशा।
Âदक्षिण कोरिया में नए मामलों में गिरावट आई। रेस्त्रां और ट्रेनों में भीड़ बढ़ने लगी।
यस बैंक संकट से छोटे बैंकों की मुश्किल बढ़ी
स्थिति से निपटने के लिए सरकार के प्रयास नाकाफी
कोरोना वायरस से ग्लोबल बाजारों की उथल-पुथल से भारत भी प्रभावित हुआ है लेकिन उसके सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। यस बैंक के धराशायी होने से सवाल उठे हैं कि भारत के फाइनेंशियल सिस्टम की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन संभाल रहा है। छह माह के भीतर ध्वस्त होने वाला यह दूसरा बैंक है। यस बैंक की समस्याएं नई नहीं है। 2013 में रिजर्व बैंक में कुछ लोगों ने उसकी स्थिति पर चिंता जाहिर की थी। 2019 में जाकर रिजर्व बैंक ने यस के को- फाउंडर राणा कपूर को हटाया। कपूर को गिरफ्तार कर लिया गया है।
द्ररावपथी, दरबार
और संस्कार
दक्षिण भारत में अल्प बजट में बनी गैर सितारा फिल्म ‘द्ररावपथी’ ने पहले दिन ही अपनी पूंजी वसूल कर ली। गौरतलब है कि इसी फिल्म के साथ ‘दरबार’ नामक सुपर सितारा फिल्म का प्रदर्शन भी हुआ था, परंतु उसे उतने दर्शक नहीं मिले। बॉक्स ऑफिस पर यह प्रकरण दीए और तूफान के बीच का सा द्वंद्व बन गया। ऐसा कई बार हुआ है कि अल्प बजट की सिताराविहीन फिल्में सफल रही हैं। अमिताभ बच्चन के दौर में अमोल पालेकर की फिल्मों ने भी लाभ कमाया है। यश चोपड़ा की अल्प बजट की फिल्म ‘नूरी’ की कमाई से उनकी बहु सितारा फिल्म ‘काला पत्थर’ के घाटे की भरपाई हुई। दरअसल संगीतकार खय्याम साहब ने नूरी का अकल्पन किया था। उन्हें फिल्म मुनाफे का भागीदार भी बनाया गया था। उनको शिकायत रही कि बंदरबांट के कारण उन्हें अपना पूरा लाभांश प्राप्त नहीं हुआ। खय्याम साहब इतने सरल थे कि उन्हें ज्ञात ही नहीं था कि मुनाफा भी ललाट देखकर तिलक लगाने की तरह होता है।
इस प्रकरण में सबसे अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि अल्प बजट की सफल फिल्म अंतरजातीय प्रेम विवाह की मुखालफत करती है। फिल्म में संदेश है कि उच्च जाति की कन्या सोच-समझकर प्रेम करे। हिदायत दी गई है कि दलित वर्ग के युवा से दूरी बनाए रखे। फिल्म की बॉक्स ऑफिस पर प्राप्त अपार सफलता यह तथ्य रेखांकित करती है कि अवाम भी संकीर्णता का हामी है। निदा फाजली ने संकेत दिया था कि मौला बच्चों को गुड़-धानी दे, सोच-समझ वालों को थोड़ी सी नादानी दे। आज अवाम संकीर्णता के पक्ष में खड़ा दिख रहा है। मराठी भाषा में बनी फिल्म ‘सैराट’ में प्रस्तुत किया गया कि अंतरजातीय प्रेम विवाह करने वालों को उन दोनों के परिवार के सदस्यों ने ही मार दिया था। ‘सैराट’ के अंतिम दृश्य में उन दोनों का अबोध शिशु जीवित है जो संकेत था कि भविष्य में कुरीतियां समाप्त हो जाएंगी। सुना है कि सैराट के हिंदी में बने चरबे में शिशु को भी मार दिया गया, परंतु जख्मी कन्या जीवित है। संभवत: यह सफल फिल्म के भाग दो की संभावना को देखकर किया गया।
दशकों पूर्व गिरीश कर्नाड की फिल्म ‘संस्कार’ भी सराही गई थी। संस्कार में बचपन से ही दो ब्राह्मण गहरे मित्र रहे हैं। उनमें से एक को दलित स्त्री से प्रेम हो जाता है और वह उसी के साथ रहने लगता है। कालांतर में उस ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती है तो वह अपने प्रेमी पति के बचपन के मित्र से पूछने आती है कि क्या मरने वाले का अंतिम संस्कार ब्राह्मणों की विधि से किया जाएगा? इस प्रकरण पर निर्णय के लिए वह कुछ समय मांगता है, मन के द्वंद्व को शांत करने के लिए वह नदी में स्नान करने जाता है। वहीं स्त्रियों के लिए बने घाट पर गीली साड़ी में उस दलित स्त्री को पानी से निकलते देखता है। वह उसकी देह के सौंदर्य से अभिभूत होकर सोचता है कि उसके बाल सखा ने कितना सुखी जीवन जीया होगा। वह निर्णय देता है कि मृतक का अंतिम संस्कार ब्राह्मण विधि से हो।
यह तथ्य भी सामने है कि राजनीति में भी चुनाव क्षेत्र में अधिक मतदाता जिस जाति के होते हैं, चुनाव लड़ने का अवसर भी उसे ही दिया जाता है। हमारी गणतंत्र व्यवस्था में जातिवाद ने दरारें बना दी हैं और कालांतर में व्यवस्था ढह सकती है। यह भी चिंतनीय है कि अपेक्षाकृत कम सफल फिल्म जातिवाद पर प्रहार करने वाली फिल्म है।
संकट में अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी खुद लें
डर ने मेरे शहर मुंबई को जकड़ लिया है। जब दस पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमारे शहर पर हमला किया था और पॉइंट ब्लैंक रेंज पर कई सौ निर्दोष लोगों को मार डाला था, तब भी मेरा शहर निडर होकर सामान्य तरीके से रोजमर्रा के काम कर रहा था। लेकिन 2020 के कोरोना वायरस का मामला अलग लग रहा है। भारत में गुरुवार को कर्नाटक में पहली मौत की रिपोर्ट आई और मुंबई में पिछले तीन दिनों में हर गुजरते दिन के साथ कोरोना वायरस के नए मामलों की रिपोर्ट आ रही हैं।
लोगों के कपड़े पहनने का तरीका बदल चुका है। मेरे फैशन से प्रेरित शहर में, दस्ताने और मास्क पहने लोग, कैजुअल कपड़े पहने लोगों की तुलना में अधिक देखे जा रहे हैं। गुरुवार और शुक्रवार को सड़क पर ऑटो रिक्शा और टैक्सियों में कम भीड़ देखी गई, जबकि व्यस्त रेलवे स्टेशनों में कम से कम चार लोग हर घंटे एस्केलेटर के हैंडल की सफाई करते देखे गए। जबकि एस्केलेटर पर यात्रा करने वाले कुछ भी छू नहीं रहे हैं, एक नया सलीका जो पिछले 48 घंटों में मुंबईकरों में देखने को मिला। कई सार्वजनिक कार्यक्रमों के रद्द होने के साथ-साथ फिल्म ‘सूर्यवंशी’ की रिलीज और सिने पुरस्कार भी रुक गए। मतलब मुंबई ने सचमुच ‘पैनिक बटन’ दबा दिया है। लेकिन समय की मांग है कि हम सावधानी बरतें, न कि हजारों और लोगों को मुसीबत में डाल दें।
शहर के नागरिक निकाय द्वारा एक बहुत अच्छा निर्णय लिया गया, जिसके तहत शुक्रवार को 700 बेड का अस्पताल एक साल बाद दोबारा खोला गया, जो नागरिक निकाय को प्रॉपर्टी टैक्स का भुगतान नहीं करने की वजह से बंद कर दिया गया था। तेरह महीने से बंद ‘सेवन हिल्स’ अस्पताल को मुंबई के सबसे बड़े क्वारंटीन (संगरोध) केंद्र के रूप में तुरंत इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया था। ये सुझाव देने वाले और कोई नहीं महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे थे। ऐसा करने से शहर के कई नागरिक अस्पतालों को बड़ी राहत मिल सकती है। एक नई टीम बनाई गई है जो शुक्रवार से बंद अस्पताल को तत्काल चालू करने के लिए जुटेगी। बिजली, पानी, दवाओं और आपातकालीन वस्तुओं जैसी विभिन्न सुविधाओं के आपूर्तिकर्ता भी जरूरतों को पूरा करने के लिए टीम में शामिल होंगे। मुंबई जैसे बड़े शहर में प्रति दिन 300 सैंपल का परीक्षण करने के लिए केवल एक केंद्र है। इसलिए शहर प्रत्येक 1000 ब्लड सैम्पल्स का परीक्षण करने के लिए प्रत्येक स्थान पर ऐसी दो और केंद्रों को जोड़ने की योजना बना रहा है। शुक्रवार दोपहर महाराष्ट्र के सभी स्कूलों को बंद रखने के लिए भी कह दिया गया है।
कुछ सहकारी सोसाइटीज ने प्रवेश द्वार पर वॉशबेसिन रखना शुरू कर दिया है। बिल्डिंग में प्रवेश करने से पहले सभी को अपने हाथ धोने के लिए कहा जा रहा है। जिन लोगों ने मास्क लगा रखा है, उन्हें प्रवेश करने दिया जाता है। बाकी लोगों को कहा जाता है कि वे सामान चौकीदारों के पास छोड़ जाएं, जिनका है, उन्हें दे दिया जाएगा। सोसायटी के यात्रा कर रहे सभी लोगों को सूचीबद्ध कर स्वास्थ्य जांच करने के लिए कहा जा रहा है। पुणे में किसी भी परिसर में प्रवेश से पहले सभी मिलने वाले और कर्मचारियों के लिए फेस मास्क पहनना और हाथ धोना अनिवार्य कर दिया गया है। स्वास्थ्य अधिकारियों और हेल्पलाइन नंबरों के संपर्क विवरण नोटिस बोर्ड पर लगाए जा रहे हैं, जबकि वॉट्सएप के माध्यम से सभी सोसाइटी के सदस्यों को क्या करें और क्या न करें, इसके बारे में बताया जा रहा है। सोसाइटी के सदस्य स्पष्ट रूप से चाहते हैं कि वे उस दिन का इंतजार न करें जब दूसरे सदस्यों को बंद कर दिया जाए या अस्पताल ले जाकर अलग कमरे में रखा जाए।
इकोनॉमिस्ट ने कोरोना वायरस को लगभग सभी देशों के लिए कठिन चुनौती बताया है।
विशेष अनुबंध के तहत सिर्फ दैनिक भास्कर में
मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए 9190000071 पर मिस्ड कॉल करें
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लोगों को अलग-थलग रखने के चीन के निर्मम तरीकों का समर्थन किया है जिससे वहां नए प्रभावितों की संख्या कम हुई है। पिछले सप्ताह राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बीमारी से सबसे पहले प्रभावित शहर वुहान का दौरा किया। फिर भी चीन में अनिश्चय है क्योंकि कोई नहीं जानता कि सावधानियां बंद करने पर संक्रमण का दूसरा दौर कब शुरू हो जाएगा। सबसे अधिक प्रभावित एक अन्य देश दक्षिण कोरिया ने बीमारी पर बहुत नियंत्रण कर लिया है। संपन्नता और उत्कृष्ट मेडिकल सुविधाओं के बावजूद अमेरिका के सामने कई बाधाएं हैं। वहां इलाज का खर्च बहुत ज्यादा है। दो करोड़ 80 लाख लोगों का हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है। टेस्टिंग में भी देर हुई है। ईरान सरकार पर मौतें छिपाने का संदेह है। चीन, दक्षिण कोरिया ने बड़े पैमाने पर जांच से होने वाले फायदे सामने रखे हैं। सिंगापुर ने भी अच्छा उदाहरण पेश किया है। वहां सार्स वायरस से निपटने का अनुभव काम आया है।
© 2019 The Economist Newspaper
Limited. All rights reserved.
कुछ राजनेताओं ने ही महामारी और उसके आर्थिक नतीजों का सामना किया है। कई नेता 2007-09 के वित्तीय संकट जैसी स्थितियों के हिसाब से कदम उठा रहे हैं। हर क्षेत्र या देश में बीमारी बिना पहचाने तेजी से फैलती है। जब तक एक स्थान में बीमारी का पता लगता है, वह दूसरी जगह पहुंच जाती है। इटली, ईरान और दक्षिण कोरिया में ऐसा ही हुआ है। सरकारें प्रतिबंध लगाती हैं। लेकिन, इस प्रक्रिया में बहुत देर हो जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लोगों को अलग-थलग रखने के चीन के निर्मम तरीकों का समर्थन किया है जिससे वहां नए प्रभावितों की संख्या कम हुई है। पिछले सप्ताह राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बीमारी से सबसे पहले प्रभावित शहर वुहान का दौरा किया। फिर भी चीन में अनिश्चय है क्योंकि कोई नहीं जानता कि सावधानियां बंद करने पर संक्रमण का दूसरा दौर कब शुरू हो जाएगा। सबसे अधिक प्रभावित एक अन्य देश दक्षिण कोरिया ने बीमारी पर बहुत नियंत्रण कर लिया है। संपन्नता और उत्कृष्ट मेडिकल सुविधाओं के बावजूद अमेरिका के सामने कई बाधाएं हैं। वहां इलाज का खर्च बहुत ज्यादा है। दो करोड़ 80 लाख लोगों का हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है। टेस्टिंग में भी देर हुई है। ईरान सरकार पर मौतें छिपाने का संदेह है। चीन, दक्षिण कोरिया ने बड़े पैमाने पर जांच से होने वाले फायदे सामने रखे हैं। सिंगापुर ने भी अच्छा उदाहरण पेश किया है। वहां सार्स वायरस से निपटने का अनुभव काम आया है।
कोरोना वायरस के कहर का अंदाजा लगाने के लिए इटली के संपन्न इलाके लोंबार्डी के उदाहरण पर गौर कीजिए। उसके आधुनिक अस्पतालों में विश्व स्तर की स्वास्थ्य सेवा है। पिछले सप्ताह तक वहां लोग सोच रहे थे कि आसानी से बीमारी पर काबू पा लेंगे। फिर निमोनिया से पीड़ित लोग बड़ी संख्या में अस्पतालों में आने लगे। ऑक्सीजन, वेंटीलेटर की कमी पड़ गई। कुछ अस्पतालों में तो मरीजों को इलाज के बिना मरने के लिए छोड़ दिया गया। विशेषज्ञ मानते हैं, बीमारी फैलने के मामले में स्पेन, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों से इटली एक या दो सप्ताह आगे है। दूसरे देशों से थोड़ा कम जुड़े हुए भारत, मिस्र जैसे देश और पीछे हैं लेकिन बहुत ज्यादा नहीं।
कुछ राजनेताओं ने ही महामारी और उसके आर्थिक नतीजों का सामना किया है। कई नेता 2007-09 के वित्तीय संकट जैसी स्थितियों के हिसाब से कदम उठा रहे हैं। हर क्षेत्र या देश में बीमारी बिना पहचाने तेजी से फैलती है। जब तक एक स्थान में बीमारी का पता लगता है, वह दूसरी जगह पहुंच जाती है। इटली, ईरान और दक्षिण कोरिया में ऐसा ही हुआ है। सरकारें प्रतिबंध लगाती हैं। लेकिन, इस प्रक्रिया में बहुत देर हो जाती है।
इटली में विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं, फिर भी इलाज न होने से लोग मर रहे
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि उनके कार्यकाल में किसी बैंक को धराशायी नहीं होने िदया जाएगा। रिजर्व बैंक ने जमाकर्ताओं का पैसा सुरक्षित होने का भरोसा दिलाया है। एेसी ही बातें सितंबर 2019 में पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक के ढहने के समय कही गई थीं। यस के तकनीकी मामलों को तो जल्द सुलझा लिया गया है लेकिन बुनियादी मसले बाकी हैं। क्रेडिट सुइसे बैंक के विश्लेषक आशीष गुप्ता कहते हैं, बैंक को संभालने के लिए 29 हजार करोड़ रुपए की जरूरत है। इस हिसाब से स्टेट बैंक की वर्तमान योजना नाकाफी है। स्टेट बैंक ने कहा है, उसका इरादा यस का विलय करने का नहीं है। गुप्ता कहते हैं, इस अराजक तरीके के कारण अन्य छोटे और मध्यम बैंकों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनके पास नकदी की कमी होगी। डिपॉजिट नहीं आएंगे। लोगों को कर्ज नहीं मिल सकेगा।
एक प्राइवेट इक्विटी इन्वेस्टर ने बताया, 40 से अधिक निजी निवेशकों ने यस बैंक को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई थी। इनमें अधिकतर विदेशी हैं। वे बाद में पीछे हट गए। विदेशी निवेशकों के लिए कड़े नियमों और जोखिम के कारण ऐसा हुआ है। आर्थिक गिरावट की वजह से लोग फिलहाल हिचक रहे हैं।
कोरोना वायरस से ग्लोबल बाजारों की उथल-पुथल से भारत भी प्रभावित हुआ है लेकिन उसके सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। यस बैंक के धराशायी होने से सवाल उठे हैं कि भारत के फाइनेंशियल सिस्टम की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन संभाल रहा है। छह माह के भीतर ध्वस्त होने वाला यह दूसरा बैंक है। यस बैंक की समस्याएं नई नहीं है। 2013 में रिजर्व बैंक में कुछ लोगों ने उसकी स्थिति पर चिंता जाहिर की थी। 2019 में जाकर रिजर्व बैंक ने यस के को- फाउंडर राणा कपूर को हटाया। कपूर को गिरफ्तार कर लिया गया है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि उनके कार्यकाल में किसी बैंक को धराशायी नहीं होने िदया जाएगा। रिजर्व बैंक ने जमाकर्ताओं का पैसा सुरक्षित होने का भरोसा दिलाया है। एेसी ही बातें सितंबर 2019 में पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक के ढहने के समय कही गई थीं। यस के तकनीकी मामलों को तो जल्द सुलझा लिया गया है लेकिन बुनियादी मसले बाकी हैं। क्रेडिट सुइसे बैंक के विश्लेषक आशीष गुप्ता कहते हैं, बैंक को संभालने के लिए 29 हजार करोड़ रुपए की जरूरत है। इस हिसाब से स्टेट बैंक की वर्तमान योजना नाकाफी है। स्टेट बैंक ने कहा है, उसका इरादा यस का विलय करने का नहीं है। गुप्ता कहते हैं, इस अराजक तरीके के कारण अन्य छोटे और मध्यम बैंकों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनके पास नकदी की कमी होगी। डिपॉजिट नहीं आएंगे। लोगों को कर्ज नहीं मिल सकेगा।
© 2019 The Economist Newspaper Limited. All rights reserved. From The Economist, translated by DB Corp, published under licence.
The original article, in English, can be found on www.economist.com
**
जयप्रकाश चौकसे
फिल्म समीक्षक
 
फंडा यह है कि  मुंबई शहर की तरह ‘पैनिक बटन’ दबाने का इंतजार न करें। जब कोई संकट आता है, तो प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक समूह को जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है, बिना यह सोचे कि दूसरे इसके बारे में क्या कहेंगे।
**
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु
raghu@dbcorp.in