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जिंदगीभर विवाद नहीं हो, इसलिए पहली हाेली पर एक साथ नहीं रहती सास-बहू

एक वर्ष पहले
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वागड़ अंचल में होली के अवसर पर एक नहीं, दो नहीं बल्कि दस प्रकार के रिवाज अाैर इतनी ही प्रकार की हाेली खेली जाती है। हाेली के अवसर पर इतने अायाेजन संभवतया प्रदेश के किसी दूसरे जिले में देखने काे नहीं मिलते। कई ऐसी परम्पराएं है, जो सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। रिवाज और रस्मों में आज भी कई अनसुलझे सवाल खड़े है।

इसके लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है लेकिन आगे बढ़ती जा रही है। आस्था या फिर रिवाज कहो, इन दोनों में होली के इस पर्व में ज्यादा उल्लास रहता है। वागड़ में होली के अनेक रूप है। इसमें सागवाड़ा और गलियाकोट में कंडे की राड, टमाटर की राड़, भिलूड़ा में पत्थर की राड़, कोकापुर और शिवपुरा में अंगारे पर पैदल चलने की परम्परा, सागवाड़ा में सडिया परम्परा, ओबरी और पीठ क्षेत्र में शौर्य प्रदर्शन के लिए फूतरा परम्परा शामिल है वहीं बांसवाड़ा के बडोदिया में गढ़ भेदन, पालोदा में जलते कंडों की राड, अरथूना, रैयाना, जौलाना क्षेत्र मे कंडों की राड शामिल है। सर्वसमाज एक जाजम पर बैठता है। इसी को ध्यान में रखते हुए दैनिक भास्कर की ओर से आज दस रिवाजों पर फोकस किया जा रहा है। भास्कर इन परम्पराओं और इसके पीछे के कारणों की तलाश में आगे बढ़ा। कुछ के मिले तो कुछ पुरखों की परम्पराओं के चलाने के आदर्श को समर्पित हो गई।

प्रदेश में केवल वागड़ में सात तरीकों से खेली जाती है होली, 5 परपंराएं भी निभा रहे

सास-बहू पहली होली पर साथ नहीं रहते

वागड़ में सास और बहू पहली होली एक साथ नहीं मनाते हैं। नवविवाहित पीहर में होली मनाती है।

आखिर क्यों: बुजुर्गों का कहना है कि एक साथ रहने पर इनके मध्य जिंदगी भर विवाद रहता है। हालांकि प्रमाण किसी के पास नहीं है।

होआरी बनाने का रिवाज

होली पर यहां आटे, गुड और तेल की होआरी बनाई जाती है। इसका उपयोग होलिका पूजन में भी किया जाता है।

आखिर क्यो: इस परम्परा को सिर्फ वागड़ में ही अपनाया जाता है। पहले के जमाने में लोगों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती थी। ऐसे में घरो में मीठा भोजन बनाने के लिए पैसा नहीं थी। इस पकवान को आसानी से बनाया जाता था। जो लम्बे समय तक खराब भी नहीं होता था। ढूंढियों में पीला, केसरी और लाल रंग

होलिका पूजन में महिलाएं विशेष रंग की साड़ी पहनती है। इनमें पीला, केसरी और लाल रंग शामिल है।

आखिर क्यों: धारणा है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठी थी। अग्रि का स्वरुप पीले रंग का होता है। वहीं हिरण्यकश्यप का घमंड लाल रंग से खत्म होता है। इससे अहंकार मिटेगा और पवित्रता आएगी।

चांदी के आभूषण

छोटे बच्चों के ढूंढ़ोत्सव में प्रत्येक परिवार की ओर से बच्चों के चांदी के कडे, पायजब, चेन, कमरबंद लिया जाता है।

आखिर क्यों: खरीद के पीछे मुख्य तर्क यहां के गरीब क्षेत्र के लोगो के पास पैसा कम होता था। होली पर चांदी की बिक्री सबसे ज्यादा होती है।

सेमल की लकड़ी

देशभर में होलिका दहन के लिए साधारण लकड़ियों का उपयोग होता है। वागड़ में विशेष रूप से सेमल की लकड़ी का अंश जरूर रखते है।

आखिर क्यों: वरिष्ठजनों का कहना है इसकी लकड़ी बहुत देर तक अग्रि देती है। यह उष्णकटिबंधिय पौधा होता है। इसकी हरी पत्तियां बसंत ऋतु में नहीं दिखती है। इसकी शाखाएं 90 डिग्री के कोण में रहती है।

होली के तरीके व शुरू होने का इतिहास

{कंडे और टमाटर की राड सागवाड़ा क्षेत्र में खेली जाती है। इसके पीछे कोई विशेष कारण नहीं है लेकिन लोकोक्ति है कि पहले लोगो के घरों में गाय होने के कारण गोबर रहता था। एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले में हंसी की ठिठोली के तहत एक-दूसरे को फेंककर उपहास किया जाता था। फिर टमाटर का भी उपयोग किया जाने लगा।

{ अंगारे पर चलने की पीछे वहां के सुख, शांति, अच्छी फसल और मानसून से जोड़ा गया है। इससे गांव में किसी भी प्रकार का प्रकोप नहीं हो। वहीं किसी भी प्रकार की बीमारी से बचने के लिए अंगारे पर चलने की परम्परा बना रखी है।

{ भिलूड़ा में पत्थर की राड़ भी शौर्य प्रदर्शन और उस भूमि पर खून गिरने से जोड़ा गया है। रघुनाथ मंदिर के पास दो समुदाय पत्थर की राड़ खेलकर जमीन पर खून गिराते है। मान्यता है कि ऐसा करने से क्षेत्र में अच्छी बारिश के साथ प्राकृतिक आपदा नहीं आती है।

{फुतरा पंचमी को भी शौर्य प्रदर्शन से जोडा गया है। इसमें खजूर के पेड़ पर कपड़ा बांधकर युवा लोग उसे उतारने में लगते है। इससे गांव में मेले सा माहौल रहता है।

होली पर इस रंग की साड़ी पहनी जाती है।
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