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होली पर हर्बल कलर के लिए तैयार सिंदूरी, भगवान पर चढ़ने में भी इस्तेमाल

एक वर्ष पहले
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होली रंगों का त्यौहार है और अगर इस मौके पर हर्बल रंग मिल जाए तो यह दोगुना हो जाता है। बाजार में मिलावटी और केमिकल रंगों का डर बना रहता है।

ऐसे में हर्बल रंगों का महत्व और भी बढ़ जाता है। इसे देखते हुए वन विभाग ने साल 12 साल पहले प्रकृति प्रदत्त कुछ ऐसे औषधीय पौधों को नर्सरी में तैयार किए थे जिनसे आसानी से नेचुरली कलर बनाए जा सकते थे। इनमें अमलाश, सेमल और सिंदूरी प्रमुख थे। चूंकि, सिंदूरी दक्षिण अफ्रीकी क्षेत्र में ज्यादा पाए जाते है थे ऐसे में प्रायोगिक तौर पर इसके 5 हजार पौधे हाईटेक नर्सरी में तैयार किए गए थे। बांसवाड़ा की जलवायु इस पौधे को रास आने के बाद अलग-अलग नर्सरियों में इन्हें तैयार किया गया। जिन्हें बाद में जंगलों में लगाया गया। सिंदूरी के लाल रंग के बीज इतने कलर दार होते है कि इनके कुछ बीजों डालने पर भी पानी केसरी रंग का हो जाता है। सिंदूर के पौधे से बनने वाला रंग न सिर्फ पूरी तरह हर्बल होता है बल्कि इससे कोई गहरा दाग तक नहीं लगता। बाजार में मिलावटी और केमिकल युक्त रंगों की बजाय ऐसे प्रकृति प्रदत्त रंगों का इस्तेमाल करके भी हम सुरक्षित होली मना सकते है। हालांकि, इनसे कलर बनाने की विधि और इनका इस्तेमाल पूरी जानकारी लेने और विशेषज्ञों के मार्गदर्शन के बाद ही करना चाहिए।

कलरफुल है नेचर, हर्बल कलर से कोई खतरा नहीं

प्रकृति बेहद रंगीन है। कई औषधीय पौधे हैं जिनके फुलों, बीजों और पत्तियों से कलर बनाए जा सकते है। अमलाश, सेमल, सिंदूर सरीखे ऐसे पौधों को हमनें हमारी विभागीय नर्सरियों में तैयार किए है। यह पौधों औषधीय गुणों से भरपुर तो है ही, जलवायु काे भी इससे फायदा हो गा। आमजन के लिए भी यह नर्सरियों में उपलब्ध है।
सुगनाराम जाट, डीसीएफ

भगवान पर वागा चढ़ाने में इस्तेमाल

{सिंदूरी का बायोमैट्रिक नाम बिक्सा ओरेलेना है। इसकी ऊंचाई अधिकतम 2 से 6 मीटर होती है। यह कई रोगों के उपचार में कारगर है। इसकी पत्तियां, तना और छाल संक्रमण, हेपेटाईट, मिरगी के दौरे में, किड़नी समस्या, स्किन समस्या के उपचार के लिए दवा बनाने में सहायक है। वहीं इसकी पत्तियां एंटी ट्यूमर, पित्तरोग, बुखार, दस्त, डायबिटीज व लीवर रोगों में लाभदायक है। वहीं भगवान पर चढ़ाया जाने वाला अष्टगंध की कीमत 200 से 250 रुपए किलो करीब बाजार में मिलता है। जबकि सिंदूरी के एक पौधे से ही अच्छी मात्रा सिंदूर प्राप्त हो जाता है।

यह होगा फायदा

{अष्टगंध बनाने में उपयोगी।

{आइसक्रीम, चाकलेट और मिष्ठानों पर रंग चढ़ाने में।

{सिंदूर बनाने में। {रोग उपचार में।

नर्सरी में वर्ष 2009 में प्रायोगिक तौर पर सिंदूरी के 2000 पौधों को तैयार किया गया था। पौधों के तीव्र विकास और औषधीय गुणों को देखते हुए तांबेसरा के कासला गांव में 200 पौधे और ओसरा ग्राम पंचायतों में 150 सिंदूरी का पौधरोपण किया गया था। जहां भी पौधों का विकास तीव्र गति से हुआ है। वहीं वर्तमान में यह वन विभाग की हाईटेक नर्सरी, वनक्षेत्रों के अलावा कुछ विभागीय नर्सरियों मे उपलब्ध है।

साल 2009 में किया था इसका प्रयोग

बांसवाड़ा. हि
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