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पढ़ाई में कमजोर थे इसलिए स्कूल छोड़ना पड़ा, 400 से ज्यादा कंपनियों के मालिक

एक वर्ष पहले
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डिप्रेशन के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी होना क्यों जरूरी है जानिए हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू से। यह भी जानिए कि छोटी आदतें कैसे आपका व्यवहार बदल देती हैं और कर्मचारी समय पर काम पूरा नहीं कर पा रहे हैं तो क्या करेंगे?

लगातार डेडलाइन्स छोड़ने वाले कर्मचारी की कैसे करेंगे मदद?

जब कोई कर्मचारी लगातार अपनी डेडलाइन्स छोड़ रहा है या अपने काम के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है, तो वो जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहा है। ये अवास्तविक लक्ष्य या अस्पष्ट जिम्मेदारियों का परिणाम भी हो सकता है। असल समस्या जानने के लिए और इसे सुधारने के लिए सबसे पहले यह जान लें कि कहीं ये आपकी वजह से तो नहीं हो रहा है। अपने आप से सवाल करें कि इसमें आप उनकी किस तरह मदद कर सकते हैं। कर्मचारी से बात करके उनका नजरिया जानने की कोशिश भी कर सकते हैं। जैसे- यदि व्यक्ति लगातार डेडलाइन्स छोड़ रहा है, तो आप कह सकते हैं कि - ‘आपको काम पूरा करने के लिए इन दिनों ज्यादा समय की जरूरत पड़ रही है। हम क्या मदद कर सकते हैं कि आप पहले की तरह समय पर काम पूरा कर सकें।’ जब टीम के सदस्य भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं तो वे आपके साथ काम करके अपनी समस्या को सुलझाना भी चाहेंगे। साथ काम करके आप अपने लक्ष्य पूरे करते हुए लगातार आगे बढ़ सकते हैं।

(डज यॉर टीम हैव अकाउंटेबिलिटी प्रॉब्लम, मेलिसा रेफोनी)

कर्मचारी डिप्रेशन में है तो किस तरह मदद कर सकते हैं आप?

दुनियाभर में लोग तेजी से डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। हो सकता है आपको भी कोई ऐसा मिल जाए जो इस बीमारी से जूझ रहा है। बहुत जरूरी है कि आप डिप्रेशन के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी जरूर रखें। यदि आप इसके लक्षण समझ लेते हैं तो कर्मचारियों की जरूरतों को भी समझेंगे और कई तरह से उनकी मदद कर सकेंगे। उनपर समय की पाबंदी ना करते हुए फ्लेग्जिबल टाइमिंग देंगे। शोध बताते हैं कि फ्लेग्जिबल टाइमिंग होने से कमिटमेंट और प्रोडक्विटी दोनों ही बढ़ जाते हंै। बड़े कामों को छोटे-छोटे कामों में बांट दें। छोटी डेडलाइन्स होने से कर्मचारी बड़े कामों को भी छोटे काम की तरह ही देखते हैं। अगर किसी को लगता है कि कोई काम उनके लिए बना है तो वे उसे महत्व देंगे और जल्दी पूरा करेंगे। लगातार जीत कर्मचारियों का आत्मविश्वास बढ़ाएगी और तजुर्बे देगी। कई कंपनियां फ्री एंप्लॉइ असिस्टेंस प्रोग्राम रखती हैं और कई अन्य असिस्टेंस देती हैं। (हाउ टू मैनेज एन एंप्लॉइ विद डिप्रेशन, क्रिस्टन बेल)

टैक्सी वालों की बातचीत से आया था ट्विटर का आइडिया

1976 में अमेरिका के सैंट लुईस में जन्मे जैक डोर्सी ट्वीटर के संस्थापक हैं। जैक को टैक्सी ड्राइवर्स को आपस में बात करते देखकर ट्वीटर का आइडिया आया था। ड्राइवर्स आपस में बहुत छोटे-छोटे वाक्यों में बात करते थे। कहां जाना है? अभी कहां हैं? इसे देखकर ही उनके मन में छोटे-छोटे कंवर्सेशन के लिए कोई प्लेटफॉर्म बनाने का आइडिया आया था। इसके अलावा कई बार ड्राइवर्स वे बहुत महत्वहीन बातें भी करते थे। लेकिन सभी कंवर्सेशन बहुत छोटे वाक्यों के रूप में ही होता था। छोटे वाक्यों का फॉर्मेट डोर्सी को बहुत रुचिकर लगा। इसलिए ट्वीटर का मतलब ही होता है महत्वहीन वार्तालाप या चिड़िया का चहचहाना...। इंटरनेट स्टार्टअप ओडियो के साथ काम करने के दौरान जैक ने सोचा कि हम एक ऐसी एसएमएस सर्विस शुरू करेंगे, जो ऑनलाइन वर्क करेगी। ओडियो कंपनी में इंटर्नल तौर पर ट्वीटर का प्रयोग शुरू हुआ। अप्रैल 2007 में ओडियो कंपनी के बिकने के बाद जैक, नोआ ग्लास, इवान विलियम्स और बिज स्टोन ने ट्वीटर इंक की स्थापना की। आज ट्वीटर यूजर की संख्या 59.35 मिलियन है और दुनिया के 80 फीसदी से अधिक नेता इसका इस्तेमाल करते हैं।


हर चीज़ की कीमत देनी होगी

एक शहर में संगमरमर से बना खूबसूरत संग्रहालय था। संग्रहालय में संगमरमर से बनी विशाल मूर्ति थी, जिसे देखने दुनियाभर से लोग आते थे। एक रात संग्रहालय के फर्श पर लगी संगमरमर की टाइल्स ने मूर्ति से पूछा- दुनियाभर से यहां आने वाले लोग मुझ पर चल कर आते हैं और आपकी प्रशंसा करते हैं। क्या यह सही है? जबकि हम दोनों एक ही खदान से निकाले गए हैं। दुनिया हमारे साथ अलग-अलग ढंग से कैसे पेश आ सकती है? मूर्ति ने कहा, ‘हां तुम ठीक कहते हो। लेकिन क्या तुम्हें याद है कि जब मूर्तिकार औजारों का प्रयोग तुम्हें तराशने के लिए कर रहा था, तो तुम उसका कितना विरोध कर रहे थे। टाइल्स ने कहा : हां। औजारों से मुझे दर्द हो रहा था। मूर्ति ने कहा, जब आपने उसके औजारों को खुद पर प्रयोग नहीं करने दिया, तो उसने भी आपको छोड़कर मुझ पर काम शुरू कर दिया। मैं यह जानती थी कि इस मूर्तिकार के छैनी और हथौड़े के प्रयोग के बाद मैं कुछ अलग और खास बनूंगी। मैंने उन सभी दर्दनाक चोटों को सहन किया, जो मूर्तिकार ने मुझे दीं। जीवन में हमें हर चीज की कीमत देनी होती है। जीवन में आप जितने कठिन दौर से गुज़रते हैं, उतना ही अधिक निखरते हैं।

बुरे दौर से एक खिलौने के दम पर बाहर आई ‘निन्टेंडो’

‘निन्टेंडो’ एक जापानी मल्टीनेशनल इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर है। बिक्री के लिहाज से इसकी गिनती दुनिया की दो सबसे बड़ी वीडियो गेम कंपनियों में भी होती है। इसे 23 सितंबर 1889 को फुसाजिरो यामाउची ने शुरू किया था। शुरुआत में यह कार्ड बिजनेस की छोटी खिलाड़ी थी। कार्ड के साथ प्रयोग किए गए और प्लास्टिक कार्ड्स ने कंपनी की काया पलट दी। ये हिट थे और इनकी बदौलत कंपनी ने कई साल तक इस बाजार पर राज किया। 1959 में कंपनी ने डिज्नी के साथ मिलकर प्लेइंग कार्ड्स बनाए जिन पर डिज्नी कैरेक्टर्स होते थे। योजना थी कि कार्ड खेलने वालों की इमेज को सुधारा जाए, जिससे यह घर-घर तक पहुंचें। योजना सफल रही और कंपनी ने एक साल में ही करीब 6,20,000 कार्ड पैक्स बेचे। 1962 में कंपनी, ओसाका स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट हुई। यहां से कंपनी को नई ऊंचाइयां छूना थी लेकिन एक के बाद एक मुसीबतों में घिरती चली गई। 1962 से 1970 का दौर कंपनी के लिए बेहद बुरा रहा और इसमें कई असफलताएं मिलीं जिससे यह बिजनेस से लगभग बाहर हो गई थी। सारी गड़बड़ स्टॉक लिस्टिंग से आए धन के साथ प्रयोग करने में हुई थी। इस अतिरिक्त पूंजी से टैक्सी कंपनी, होटल चेन और वैक्यूम क्लीनिंग बिजनेस शुरू किए गए जो सब असफल हुए। सिर्फ खिलौने बनाने के धंधे ने कंपनी में इतनी ऊर्जा बनाए रखी जिससे यह सांस ले सके। 1970 में केवल खिलौने बनाने पर ध्यान लगाया गया और इनका ‘अल्ट्रा हैंड’ खिलौना जबरदस्त हिट हो गया। इसकी लाखों यूनिट बिकीं। इस खिलौने ने खोई इज्जत कंपनी को लौटा दी। अगला प्रयोग वीडियो गेम्स के साथ किया गया। कई साल इन्हें बनाने में लगे। 1980 के दशक में इन्होंने ‘मारियो’, ‘रडार स्कैप’, ‘डॉन्की कॉन्ग’ जैसे हिट गेम्स दिए। 1985 में कंपनी का नाम ‘निन्टेंडो एंटरटेनमेंट सिस्टम’ कर दिया गया। कंपनी की ताजा बड़ी सफलता ‘स्विच’ है। इसकी करीब 170 लाख यूनिट एक वित्तिय वर्ष में बिकी हैं।

यह भी जानें

{बीते तीन दशक में कंपनी ने अपार सफलता देखी, इसमें इनके हैंडहेल्ड गेम कंसोल ‘द गेम बॉय’ का खासा योगदान रहा। गिनीज वर्ल्ड ऑफ रिकॉर्ड्स के मुताबिक टॉप टेन बेस्ट सेलिंग गेम कंसोल में निन्टेंडो के नाम चार स्पॉट हैं। निन्टेंडो डीएस सबसे ज्यादा पसंद किया गया कंसोल है।

‘जब ‘ना’ कहने का मौका आए तो इसे दृढ़ता से कहें’

‘दोस्तों, याद रखो, आप सभी एक ही तरह से सफलता हासिल नहीं कर सकते। अपने आप को किसी तुलना के जाल में फंसने न दें। खुद की दूसरे की सफलता से तुलना करने से आप खुद को खोजने की प्रक्रिया को धीमा कर देंगे।

आपका कई तरीकों से विकसित होना जारी रहेगा। आप उन जटिलताओं और आश्चर्यों से भरे हुए हैं जो शुरू भी नहीं हुए हैं। अभी जो आपको परिभाषित करता है वह अगले 5, 10, 50 वर्षों में आपको और अधिक जीवंत, और ज्यादा आकर्षक बना देगा। आप हमारी दुनिया के काम करने के तरीके को बदलने जा रहे हैं जिसकी कल्पना भी अभी नहीं की जा सकती। किसी भी पीढ़ी को मौका न दें कि वे आपको परिभाषित करे। लोग अक्सर उस बात से डरते हैं जो वो नहीं जानते हैं या नहीं देख पाए हैं, इसलिए बड़ा सोचें। केंद्रित रहें ताकि आपका बदलाव और विकास जानबूझकर हो। यदि हार और जीत का सामना करते हैं तो दोनों को एक समान लें।

जब आपका रास्ता अप्रिय हो जाता है, तो निराश न हों। आप गिरेंगे और रास्ते में असफल रहेंगे। लेकिन अप्रिय को गले लगाओ। इसके लिए तैयार हो जाओ और अपने आगे बढ़ने की क्षमता को विफल ना होने दो।

‘द हेल्प’ में मेड की भूमिका निभाने के बाद, मुझे मेड और नर्सों की भूमिका निभाने के खूब मौके आए। मैंने कई बार इन महान व्यवसायों से जुड़ी महिलाओं को परदे पर उतारा लेकिन मुझे उन लोगों को ‘ना’ कहना शुरू करना पड़ा, जो इस तरह की कहानियों के नए दृष्टिकोण को दिखाने का प्रयास नहीं कर रहे थे।

‘ना’ कहने से मुझे ‘हिडन फिगर्स’ मिली जहां हमने ऐसी महिलाओं का किरदार निभाया जिन्होंने एक समय में नासा के लिए काम किया था। ये वो तीन महिलाएं थीं जिन्होंने हमारे अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में जाने और फिर चांद तक पहुंचाने में मदद की थी। उन्होंने दृढ़ता से काम किया और इस देश को अंतरिक्ष के अग्रणी बनने में मदद की।

कुछ जगहों पर मैंने ‘ना’ कहना शुरू किया तो वह मेरे लिए नए दरवाजे खुलने का मौका था। मैं बड़े अवसरों को ‘हां’ कह सकी। न सिर्फ ‘हिडन फिगर’ बल्कि मैंने ‘द शैक’ में ईश्वर की भूमिका निभाई। जो मेरी प्रतिभा को सीमित कर रहे थे, उन्हें ‘ना’ कहने से मुझे नासा वैज्ञानिक और ईश्वर का प्रतिनिधित्व करने वाले किरदार मिले।

यह एक बड़ा सबक है क्योंकि जब आप अपने करियर की शुरुआत करते हैं, तो यह महत्वपूर्ण होता है कि जितना ‘ना’ कहें, उससे अधिक ‘हां’ कहें। यदि मैंने उन सभी शुरुआती भूमिकाओं के लिए ‘हां’ नहीं कहा होता, तो मुझे नहीं पता कि मुझे इस जगह आने का मौका मिलता भी या नहीं। ‘हां’ कहने से आप अपनी आवाज ढूंढ सकते हैं। यह आपको नए अवसरों को उजागर करने देता है और यह नए रिश्तों को प्रकट करता है। लेकिन जब ‘ना’ कहने का समय हो, तो इसे जोर से और दृढ़ता से कहें। ऐसे मौके आएंगे जब ‘ना’ कहना आपके मूल्यों और अपनी कीमत को बनाए रखने के लिए जरूरी होगा। आप ही अपने मूल्य को परिभाषित करते हैं, कोई दूसरा नहीं। हम सभी को अपनी मान्यताओं के लिए खड़े रहना होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कल किस रास्ते पर कदम रख रहे हैं।

पढ़ते रहो, लिखते रहो, अपनी कहानियां सुनाओ - दूसरों के लिए, या अपने लिए। आपकी आलोचनात्मक सोच को शिक्षा को परिभाषित करने दो, आपके करियर और जुनून को भी परिभाषित करने दो। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हमें इस बात की याद दिलाई जब उन्होंने चर्चा की थी कि कैसे वह लिखने, पढ़ने और सोच का इस्तेमाल खुद के लगातार पुनर्निर्माण के लिए करते हैं। मैं यहां बराक ओबामा की बात इसलिए नहीं कर रही हूं क्योंकि मैं उन्हें याद कर रही हूं, लेकिन मैं आपको केवल यह याद दिला रही हूं कि पढ़ना, लिखना और सोच, बहुत महत्वपूर्ण है।’

(2017 में केंट स्टेट यूनिवर्सिटी में अमेरिकी एक्ट्रेस ऑक्टेविया स्पेंसर)

छोटी आदतें बड़े व्यवहार के लिए कैसे जिम्मेदार हो जाती हैं?

बड़े लक्ष्य जैसे- रोज एक घंटा मेडिटेट करना या पढ़ने के लिए समय निकालना भारी लगते हैं। इसलिए छोटी-छोटी आदतों पर ध्यान देकर शुरुआत की जा सकती है। इस तरह समय के साथ आप अपने व्यवहार में बदलाव पैदा कर सकते हैं। ये आदतें बेहद छोटी होनी चाहिए। जैसे कुछ सेकंड के लिए मेडिटेट करना या सोने से पहले रोज रात को 30-40 लाइनें पढ़ना। चीजें आसान बनाने के लिए इन कामों को भी उसी समय पर कर सकते हैं जिस समय आप अपने अन्य काम करते हैं। जैसे- दांतों को ब्रश करने के दौरान ही किताब की 30-40 लाइनें पढ़ सकते हैं। कॉफी ब्रू हो रही है तब तक मेडिटेट कर सकते हैं। अपनी ‘यस’ लिस्ट भी बना सकते हैं। इसमें हर काम के आगे ‘हां’ या ‘ना’ लिखते जाएं जिससे आपको यह पता रहे कि आपने कौन-से काम कर लिए हैं। कई महीनोें तक ‘हां’ देखने के बाद अपनी छोटी आदतें बढ़ा लें। छोटे से शुरुआत करके आप बड़े नतीजे हासिल कर सकते हैं। (टू अचीव बिग गोल्स स्टार्ट विद स्मॉल हैबिट्स, सबीना नवाज)

समय पर काम पूरे करेगी शरीर में मौजूद अलार्म घड़ी

हर दिन हम बहुत सारे काम करते हैं। इनमें से कुछ काम तो हमें याद रहते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें हम भूल जाते हैं। पूरे दिन में इतना काम रहता है कि कोई भी काम सही समय पर नहीं हो पाता है। यह समस्या बहुत लोगों की है। हमारे शरीर में एक घड़ी होती है जिसे बायोलॉजिकल क्लॉक कहा जाता है। इसे शरीर की अलार्म घड़ी भी कहा जाता है। बहुत से लोग इस बायोलॉजिकल क्लॉक के बारे में जानते हैं लेकिन इसका प्रयोग कभी नहीं करते हैं। यदि आप दिन में एक निश्चित समय पर कोई एक काम करने की आदत का विकास कर लेते हैं तो आपका शरीर और आपका मन दोनों ही उस काम के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं। जैसे- यदि आप सुबह पांच बजे टहलने की आदत बनाते हैं तो आप देखेंगे कि कैसे प्रत्येक दिन सुबह पांच बजे आपका शरीर और मन टहलने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाएगा। बायोलॉजिकल क्लॉक का प्रयोग कर हम ऐसे काम भी आसानी से कर पाते हैं जो हमें अच्छे नहीं लगते। जैसे-पढ़ाई करना, व्यायाम करना आदि।

डेडलाइन से बढ़ेगी सफलता की रफ्तार

यदि हमें दुनिया की रफ्तार के साथ आगे बढ़ना है तो हमें अपने जीवन में सफलता की रफ्तार भी बढ़ानी होगी। कम समय में अधिक सफलताएं हासिल करनी होंगी। हमें कोई भी सफलता पाने के लिए उसमें लगने वाला समय कम करना होगा। इसके लिए आप डेडलाइन तय कर सकते हैं। पहले सोचें कि कोई कार्य कितने समय में पूरा किया जा सकता है उसके बाद एक डेडलाइन तय करें। कार्य पूरा करते समय यदि आपको लगता है कि बीच में कोई जरूरी काम आ सकता है तो उसके लिए आप पहले से ही थोड़ा अतिरिक्त समय जोड़ सकते हैं। डेडलाइन से शुरुआत में आपको दिक्कत आ सकती है लेकिन बार-बार करेंगे तो आपको आदत हो जाएगी। आदत हो जाने से आप अपने लक्ष्य को तय डेडलाइन में याा उससे पहले ही पूरा कर लेंगे।

प्रशंसा करके आप लोगों को प्रोत्साहित करते हैं

यदि आप लोगों के काम की प्रशंसा करते हैं तो आप उन्हें सही काम ज्यादा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यदि आपकी टीम को यह नज़र आता है कि उनकी हर कोशिश पर आप उनकी आलोचना करते हैं तो जल्द ही वे कोशिश करना छोड़ देंगे। ऐसे में टीम के कुछ सदस्य व्यस्त दिखने का नाटक और प्रदर्शन करना सीख लेते हैं, जबकि असल में वे संभावित आलोचना वाले कामों से बचना चाहते हैं। यदि आपको आलोचना करनी ही है तो कर्मचारी की बजाय कार्य की आलोचना करें। दूसरी ओर यदि आप कर्मचारी को बार-बार बताते हैं कि वे अच्छे हैं तो इससे वे अहंकारी भी बन सकते हैं। इससे आपके लिए अलग तरह की समस्याएं खड़ी हो सकती है। केवल विशिष्ट कार्यों की प्रशंसा करें। इससे टीम के अन्य सदस्य भी प्रोत्साहित होंगे।

{नाम- रिचर्ड ब्रैनसन {पेशा- बिजनेस मैगनेट {नेट वर्थ- 450 करोड़ यूएसडीइनके बारे में इसलिए पढ़ें- छोटी उम्र में बड़ा आदमी बनने का सपना देखा और अपनी मेहनत से उसे पूरा किया।

डिप्रेशन के लक्षण समझ जाएंगे तो कर्मचारी की जरूरतें भी समझेंगे आप

खेल नहीं...नेतृत्व की लड़ाई

इनके जीवन से मिली ये सीख

1. छोटी उम्र में ही बड़ा
सोचना शुरू करें।


2. जोखिम लेने से कभी ना डरें।

3. असफलता का भी जश्न मनाइए।

4. लोगों की मदद करने से कभी
पीछे ना हटें।


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18 जुलाई 1950 को सर रिचर्ड चार्ल्स निकोलस ब्रैनसन इंग्लैंड की राजधानी लंदन में पैदा हुए थे। उनके पिता बैरिस्टर थे और मां एयर होस्टेस होने के साथ ही एक आंत्रप्रेन्यॉर थीं। रिचर्ड की मां चाहती थीं कि रिचर्ड जिंदगी में किसी भी तरह की चुनौती के लिए तैयार रहें। इसलिए वे रिचर्ड को बचपन से ही अलग-अलग तरह की चुनौतियां देती थीं। रिचर्ड जब सात साल के थे तो उनकी मां ने उन्हें उनके दादाजी के घर कोई सामान भेजने का काम दिया था। दादाजी का घर उनके घर से लगभग 50 मील की दूरी पर था। उनकी मां ने उन्हें कुछ सैंडविच पैक करके दे दिए थे और पीने के लिए पानी का इंतजाम उन्हें खुद ही करने के लिए कह दिया था। अपने दादाजी के घर वह सामान पुंहचाकर अगले दिन एक चैंपियन की तरह वे घर लौटे थे।

डिस्लेक्सिया होने की वजह से रिचर्ड ठीक से पढ़ नहीं पाते थे। वे क्लास में हमेशा दूसरे बच्चों से पीछे रह जाते थे। यही वजह रही जो 16 की उम्र में मजबूर होकर उन्हें अपना स्कूल छोड़ना पड़ा था। स्कूल के आखिरी दिन हेडमास्टर ने रिचर्ड से कहा था कि तुम बड़े होकर करोड़पति बनोगे। 16 साल की उम्र में एक व्यवसाय में असफल होने के बाद उन्होंने ‘स्टूडेेंट’ नाम से एक मैगजीन लॉन्च की जो उनका पहला सफल काम था। उनकी यह मैगजीन इतनी मशहूर हुई थी कि इसे शुरू करने के केवल तीन साल के अंदर ही उन्होंने लगभग 45 लाख रुपए कमा लिए थे। मैगजीन के व्यवसाय में सफलता हासिल कर वे रिकॉर्डिंग की तरफ बढ़ने लगे थे। उन्होंने सफल होने के लिए बेईमानी का रास्ता भी अपनाया जिस वजह से उन्हें कुछ दिनों के लिए जेल भी जाना पड़ा। लेकिन कुछ ही सालों के अंदर उन्हें इसमें बड़ी असफलता मिली। इसके बाद उन्होंने तय किया कि वे जीवन में दोबारा कभी बेइमानी नहीं करेंगे। अब वे पूरी ईमानदारी के साथ अपने रिकॉर्डिंग के व्यवसाय को आगे ले जाने की कोशिश करने लगे। कई ऐसे बैंड्स जिन्हें कोई भी कंपनी साइन नहीं कर रही थी उन्हें वे अपनी रिकॉर्डिंग कंपनी (वर्जिन रिकॉर्डिंग) में मौका देने लगे। इन बैंड्स के एल्बम इंग्लैंड में खूब मशहूर होने लगे और 1979 में केवल 29 साल की उम्र में सर रिचर्ड ब्रैनसन करोड़ों रुपए कमा चुके थे।

एक आम आदमी से सर रिचर्ड की सोच किस तरह अलग है यह उनके जीवन में घटी इस घटना से पता चलता है। एक दिन पोर्टो रीको आइलैंड पर रिचर्ड को डेट पर जाना था। जब उन्हें पता चला कि उस दिन की सभी फ्लाइट्स कैंसिल कर दी गईं हैं तो वहां से घर लौटने की बजाय उन्होंने एक प्राइवेट प्लेन हायर करने के बारे में सोचा। उस समय उनके पास पैसे कम थे तो पहले उन्होंने प्राइवेट प्लेन का किराया पता किया और फिर वहां पर जितने लोग पोर्टो रीको आइलैंड जाने वाले थे उन्हें टिकट बेचकर प्लेन की सभी सीट्स भर कर वे पोर्टो रीको आइलैंड पहुंच गए। वहीं से शुरुआत हुई थी वर्जिन एअरलाइन्स की।

1992 में इसी एयरलाइन्स के व्यवसाय को जारी रखने के लिए उन्हें अपने सबसे पसंदीदा रिकॉर्डिंग व्यवसाय को बेचना पड़ा था। कॉन्ट्रैक्ट पेपर पर साइन करते वक्त रिचर्ड की आंखों में आंसू थे। लेकिन व्यवसाय में भावनाओं की कोई जगह नहीं होती। जो जरूरी है उसे तो करना ही पड़ता है। चार साल के अंदर ही रिचर्ड ने वी2 रिकॉर्ड्स के नाम से एक नई कंपनी शुरू कर दी थी। धीरे-धीरे उन्होंने टेलिकम्युनिकेशन, ट्रैवल एंड टूरिज्म जैसे कई बिज़नेस शुरू किए। वह एक बिजनेस शुरू करते फिर उसे सफल बनाकर दूसरा बिजनेस शुरू करते। इस तरह 69 की उम्र में आकर आज वे 400 कंपनियों के मालिक बन चुके हैं। इनमें सबसे खास है उनकी स्पेस टूरिज्म कंपनी वर्जिन गैलेक्टिक। यह कंपनी लोगों को स्पेस में घुमाने के मकसद से काम कर रही है। रिचर्ड के नाम पर दो प्राइवेट आइलैंड्स भी हैं। जिनमें से एक में वे खुद रहते हैं। उन्हें प्रकृति के करीब रहना पसंद है। अांत्रप्रेन्यॉरशिप में उनके योगदान के लिए उन्हें इंग्लैंड की क्वीन एलिजाबेथ 2 द्वारा ‘नाइट’ टाइटल मिला है जिस वजह से वे ‘सर रिचर्ड ब्रैनसन’ बन गए हैं।

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फूड फॉर थॉट


 
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ग्रीस के नाटककार और अपने समय के सबसे विद्वान कवि थे। बेहतरीन खिलाड़ी और पेंटर भी थे। ट्रैजडी नाटकों को आम लोगों की पसंद बनाया।

1. सच्चे ज्ञान का सर्वोत्तम जवाब ख़ामोशी है।

2. जितने अधिक प्रयास होंगे, उतनी अधिक समृद्धि आएगी।

3. युवा अवस्था अमीर या गरीब बनने का सबसे अच्छा समय है।

4. ईश्वर जिन्हें नष्ट करना चाहता है, पहले उन्हें क्रोधी बना देता है।

5. निर्णय लेने की स्थिति में दोनों पक्षों को सुने बिना किसी फैसले पर नहीं पंहुचें।

6. पहले यह जान लो कि तुम कौन हो, फिर उस हिसाब से खुद को संवारो, विकसित करो।

7. जो आदमी जवानी में सीखना नहीं चाहता वह अपने अतीत को खो देता है और उसके भविष्य की मौत हो जाती है।

युरिपिडीस

जन्म - 485 | निधन - 406 बीसीई

_photocaption_तस्वीर केन्या के अंबोसेली नेशनल पार्क की है। यहां दो नर हाथियों को अपनी सूंड आपस में उलझाए देख शॉट फोटोग्राफर विलियम थॉम्पसन के कदम थम गए और उन्होंने इस मनमोहक दृश्य को तुरंत ही अपने कैमरे में कैद कर लिया। उन्हें लगा कि दोनों हाथी अपनी सूंड से खेल रहे हैं जबकि बाद में पता चला कि वे दोनों गुस्से में थे और एक दूसरे पर अपना ज़ोर आज़मा रहे थे। *photocaption*

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टाइम मैनेजमेंट


गोल मैनेजमेंट


टीम मैनेजमेंट


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बांसवाड़ा, रविवार, 15 मार्च, 2020
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