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जब पदाकांक्षा की अंधी दौड़ रहेगी तो फिर धृतराष्ट्र के राज्य के साथ जो हुआ, वही हमारे राष्ट्र में होगा: आचार्य
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने के साथ मध्यप्रदेश में सरकार पर आए संकट के बाद अलग अलग नेताओं के साथ ही विचारक, लेखक अपने बात रख रहे हैं। वहीं इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बांसवाड़ा में प्रवासरत राष्ट्रीय संत आचार्य पुलक सागरजी ने भास्कर से साझा किए अपने विचार। आचार्य ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए कहा कि राजनीति में पाला बदलना अाैर सरकार गिरना गलत।
जनता पार्टी देखकर वोट देती है, नेता पाला बदल लेते हैं तो यह जनता के साथ ही विश्वासघात है, चुनाव का औचित्य नहीं रहेगा
भास्कर: सिंधिया बीजेपी में गए हैं, पाला बदलने वाले पर क्या कहेंगे?
आचार्य: लोकतांत्रिक देश है, जिसमें अपने अपने विचार के साथ जीने का अधिकार है। लेकिन इतने समय तक पार्टी में रहे और कोई इतना बड़ा कदम उठाता है तो जरूर कोई उपेक्षा हुई हो। कभी कभी स्वाभिमान पर गहरी चोट लग जाया करती है। कभी हमारे सीनियर भी योग्यता का ध्यान नहीं रख पाते हैं। इसलिए इस तरह के कदम उठा लिए जाते हैं। लेकिन यह निश्चित है कि पार्टियां बदले से छवि तो बिगड़ती है। अब जो नए पार्टी में जा रहे हो तो क्या भरोसा रहेगा कि उसमें रहोगे या नहीं रहोगे। सिंधिया की कोई मजबूरी रहेगी होगी।
{जोड़-तोड़ के लिए सरकार बनाना क्या उचित है?
- देश के लिए तो अहित है ही, जनता को भी इससे कोई फायदा होना वाला नहीं है। लोकतंत्र का मजाक बनता है। एक पार्टी के लिए निष्ठा होनी चाहिए। जिसके लिए जीवन समर्पित किया है। हर जगह यह प्रचलन हो जाएगा। फिर तो चुनावों का कोई औचित्य ही नहीं रह जाएगा। जनता पार्टी देखकर वोट डालती है फिर नेता पाला बदल लेते हैं यह तो जनता के साथ ही विश्वासघात है। जनता ने तो आपको उस टिकट पर वोट दिया है। जब पदाकांक्षा की अंधी दौड़ रहेगी तो फिर हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र के राज्य के साथ हुआ, वही हमारे राष्ट्र के जीवन में हाेगा।
{मध्यप्रदेश में सरकार को तोड़ना कितना उचित है?
-सिंधिया ने पार्टी बदली है चलो मान ले ठीक है। लेकिन बनी हुई सरकार को साजिश के तहत संकट में ला देना, गिरा देना यह अच्छी बात नहीं है। इससे देश में मैसेज सही नहीं जाता है।
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{पहले विरोध में चुनाव लड़ना, नतीजों के बाद साथ आना क्या सही है?
-जब कोई व्यक्ति या पार्टी सत्ता की लोभी हो जाती है, सिंहासन की चाहत करती है, कुर्सी की चाहत रखती है। तो फिर इस तरह के कार्य सहज ही उत्पन्न हो जाया करते हैं। लेकिन जिस प्रकार सरकार बनाने के लिए जोड़ तोड़ के लिए मेहनत करते हैं उतनी मेहनत लोगों के उत्थान के लिए भी करना चाहिए। देशहित में सबसे पहले काम होना चाहिए। अगर जोड़तोड़ कर सरकार बना ली, उसके बाद किस तरह उस सरकार ने काम किया है यह तो चुनाव में जाने के बाद जनता अपने आप परिणाम दे देती है।
{राजनीतिक पार्टी या नेताओं को आप क्या संदेश देंगे?
-पार्टी के लिए समर्पित हैं, अच्छी बात है, लेकिन जनता का इसमें कितना हित हो रहा है, प्रदेश के लिए कितना हित हो रहा है इसका ध्यान रखना चाहिए। अगर आपके पाला बदलने से जनता को फायदा हो रहा है तो जनता जरूर आपको माफ कर देगी।
भास्कर एक्सक्लूसिव