चंद्रमा 16 कलाओं से होगा पूर्ण, ठाकुरजी को लगेगा भोग

Baran News - हिंदू पंचांग के अनुसार अाश्विन माह की शुरुआत से कार्तिक महीने के अंत तक शरद ऋतु रहती है। शरद ऋतु में दो पूर्णिमा...

Oct 13, 2019, 07:10 AM IST
हिंदू पंचांग के अनुसार अाश्विन माह की शुरुआत से कार्तिक महीने के अंत तक शरद ऋतु रहती है। शरद ऋतु में दो पूर्णिमा पड़ती है। इनमें अश्विन माह की पूर्णिमा महत्वपूर्ण मानी जाती है।

इसी पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार 13 अक्टूबर को आने वाली शरद पूर्णिमा को जगार पूर्णिमा भी कहते हैं। इसके अलावा जागृति पूर्णिमा या कुमार पूर्णिमा के नाम से भी इसे जाना जाता है।

पुराणों के अनुसार कुछ रातों का बड़ा महत्व है। इनमें नवरात्र, शिवरात्रि और शरद पूर्णिमा भी शामिल हैं।

वैज्ञानिक शोध: चांदी के बर्तन में खीर का सेवन करना लाभप्रद

एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार इस दिन दूध से बने उत्पाद का चांदी के पात्र में सेवन करना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। इस दिन बनने वाला वातावरण दमा के रोगियों के लिए विशेषकर लाभकारी माना गया है।

कई जगह होंगे आयोजन

शरद पूर्णिमा पर जिलेभर में कई धार्मिक आयोजन होंगे। इनकी तैयारियों पूरी कर ली हैं। मंदिरों की समितियों के पदाधिकारी और अन्य संगठनों की ओर से आयोजन किए जा जाएंगे। मंदिरों में इस मौके पर भजन कार्यक्रम भी आयोजित होगा।

अमृत समान: इसलिए बनाई जाती है खीर

वैज्ञानिकों के अनुसार दूध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और भी आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है और इस खीर का सेवन सेहत के लिए महत्वपूर्ण बताया है। इससे पुनर्योवन शक्ति और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

श्रीमद्‌भागवत : चंद्रमा औषधि के देवता

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार चंद्रमा को औषधि का देवता माना जाता है। चांद अपनी 16 कलाओं से पूरा होकर अमृत की वर्षा करता है। मान्यताओं से अलग वैज्ञानिकों ने भी इस पूर्णिमा को खास बताया है, जिसके पीछे कई सैद्धांतिक और वैज्ञानिक तथ्य छिपे हुए हैं। इस पूर्णिमा पर चावल और दूध से बनी खीर को चांदनी रात में रखकर सेवन किया जाता है। इससे रोग खत्म हो जाते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

रावण रश्मियों को दर्पण से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था

एक अध्ययन के अनुसार शरद पूर्णिमा पर औषधियों की स्पंदन क्षमता अधिक होती है। यानी औषधियों का प्रभाव बढ़ जाता है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। लंकाधिपति रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी।

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