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मंडियों में माल्ट कंपनियों की दस्तक, किसानों को मिल सकते हैं जौ के अच्छे भाव

Bari News - एक सप्ताह में 75 रुपए क्विंटल तक बढ़े भाव, पैदावार घटने की वजह से बढ़ रही है मांग, कारोबारियों को अभी और तेजी की...

Dainik Bhaskar

Apr 03, 2018, 03:30 AM IST
मंडियों में माल्ट कंपनियों की दस्तक, किसानों को मिल सकते हैं जौ के अच्छे भाव
एक सप्ताह में 75 रुपए क्विंटल तक बढ़े भाव, पैदावार घटने की वजह से बढ़ रही है मांग, कारोबारियों को अभी और तेजी की उम्मीद

सुरेन्द्र चिराना | सीकर

जौ के कारोबार से जुड़ी माल्ट कंपनियां मार्केट में किसानों के लिए राहत की खबर लेकर आई हैं। महज एक पखवाड़े पहले सीकर सहित प्रदेश की बड़ी मंडियों में 1150 से 1225 रुपए क्विंटल तक बिके जौ के थोक भाव अब माल्ट कंपनियों की दस्तक पर 25 से 75 रुपए की तेजी के साथ 1300 रुपए क्विंटल तक पहुंच गए हैं। कारोबारियों के अनुसार सीकर, श्रीमाधोपुर, चौमूं, जयपुर, गंगानगर सहित प्रदेश की डेढ़ दर्जन मंडियों में जौ का बड़े स्तर पर कारोबार चल रहा है। सीकर में सबसे ज्यादा जौ का कारोबार श्रीमाधोपुर मंडी में प्रतिदिन 13000 बोरी पहुंच गया है। वहीं सीकर व लोसल मंडी में जौ का कारोबार 4500 बोरी प्रतिदिन हो रहा है। कृषि विभाग के प्रारंभिक आंकलन के अनुसार मौसम की मार से सीकर, बीकानेर, जालोर, उदयपुर व जोधपुर इलाके में जौ की पैदावार ज्यादा प्रभावित मानी जा रही है। इन इलाकों में बुआई रकबा घटने के साथ प्रति हैक्टेयर उत्पादकता भी दो से तीन क्विंटल कम रही है।

किसानों के लिए झींगा मछली पालन फायदे का सौदा, बारां में शुरुआत

मीठे पानी में किया सफल प्रयोग, अन्य किसानों को प्रेरित करने के लिए बीज उपलब्ध कराने को तैयार, पर्यटन स्थलों पर है ज्यादा मांग

ललित शर्मा | जयपुर

प्रदेश के बांधों के मीठे पानी में झींगा मछली का पालन और उत्पादन संभव है। मुंबई निवासी सैयद अर्सलान ने बारां जिले में छीपाबड़ौद के लहासी बांध में झींगा मछली का बखूबी पालन कर यह संभव कर दिखाया है। वे इसे व्यावसायिक रूप दे चुके हैं। पर्यटन स्थलों पर झींगा की बढ़ती मांग किसानों के लिए शुभ संकेत हो सकते हैं। राज्य के किसान झींगा पालन व उत्पादन कर अच्छी राशि कमा सकते हैं। इसके लिए मछली पालक किसानों को सैयद अर्सलान तकनीकी सहयोग और प्रशिक्षण देने को तैयार हैं।

झींगा मैन के नाम से विख्यात अर्सलान ने विशेष बातचीत में बताया कि किसान सामान्य मछली पालन से डेढ़ साल में रिकवरी या व्यावसायिक उत्पादन का लाभ पाता है। वहीं, झींगा मछली पालन से 6 से 8 माह में ही आमदनी शुरू हो जाती है। प्रदेश के अलावा आसपास के राज्यों और निर्यातकों में भी इसकी अच्छी मांग है।

झींगा मछली अमेरिका और खाड़ी देशों में निर्यात हो रही है। वैसे तो वे राजस्थान में 2012 से मछली पालन के क्षेत्र में हैं, लेकिन झींगा पालन को लेकर पिछले 3 साल से प्रयासरत हैं। लहासा बांध में अक्टूबर 2017 में डाले सीड के बाद उन्हें सफलता मिली है। पहले वे महाराष्ट्र में कई जगह मीठे पानी में झींगा पालन व उत्पादन कर चुके हैं।

मात्र 10 लाख रुपए से शुरुआत

उन्होंने बताया कि 200 से 300 हैक्टेयर क्षेत्र वाले बांध में इसका उत्पादन सफल रहता है। दस लाख रुपए की पूंजी से शुरुआत की जा सकती है। इसके भोजन के लिए भी ज्यादा खर्च नहीं करना होता। ये पानी में जमने वाली काईं और कीड़े खाकर अपना काम चला सकती है। वैसे इनके भोजन के लिए नागली डाली जाती है। इनके लिए तापमान सामान्य होना जरूरी है।

कैसे करें पालन

उन्होंने बताया कि झींगा मछली पालन के इच्छुक किसान प्रदेश के मीठे पानी के बांध में इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसके लिए वे इच्छुक किसानों को झींगा का सीड उपलब्ध करा सकते हैं। यह सीड मीठे पानी के लिए अनुकूल है और इनकी दर परिवहन सहित ढाई रुपए से 5 रुपए तक प्रति सीड हो सकती है।

स्वयं तैयार किए सीड

उन्होंने बताया कि खारे और मीठे पानी वाले मिश्रण में वे ब्रिडर नर और मादा में ब्रिडिंग कराते हैं। यह प्रक्रिया कई बार होती है। इसके बाद नए सीड को मीठे पानी में छोड़ देते हैं, जहां ये पलने लग जाती है और इनका परिवार बढ़ता जाता है।

सरकार से अाग्रह

उन्होंने सरकार से झींगा पालन के इच्छुक किसानों को अनुदान, तकनीक सहयोग, सीड बैंक की स्थापना और मार्केट उपलब्ध कराने का आग्रह किया है। इससे किसानों की आय दोगुना करने के सरकार के संकल्प को गति मिल सकेगी।

इस माह पहले पखवाड़े में 1500 रुपए तक बिक सकता है जौ

कारोबारियों की मानें तो अप्रैल के प्रथम पखवाड़े तक जौ के थोक भावों में 150 से 200 रुपए प्रतिक्विंटल की तेजी की उम्मीद है। माल्ट कारोबारी महेश जैन लालास के अनुसार मार्केट में स्टॉकिस्ट सक्रिय रहे तो 10 अप्रैल तक प्रदेश की मंडियों में जौ के थोक भाव 1450 से 1500 रुपए क्विंटल तक पहुंचने की संभावना है। इसकी बड़ी वजह 20 से 25 फीसदी तक जौ की पैदावार कम रहना तथा माल्ट कंपनियों की मार्केट में सक्रियता मानी जा रही है।

दो कंपनी कर रही हैं किसानों से खुले ऑक्सन पर जौ की खरीद

कारोबारियों के अनुसार, प्रदेशभर की कृषि उपज मंडियों में दो बड़ी माल्ट कंपनी किसानों से जौ की बड़े स्तर पर खरीद कर रही हैं। ये हैं बार माल्ट व यूनाइटेड ब्रीवरेज। जौ की खरीद के लिए दोनों कंपनियों के प्रतिनिधि सीकर, लोसल, लक्ष्मणगढ़, श्रीमाधोपुर, चौमूं, जयपुर, गंगानगर समेत प्रदेश के विभिन्न जिलों की मंडियों में पहुंच रहे हैं। माना जा रहा है इन प्रतिनिधियों के साथ ट्रांसपोर्ट कारोबार से जुड़े व्यापारियों द्वारा प्रतिदिन प्रदेश की मंडियों से 50 हजार से एक लाख बोरी तक जौ की खरीद की जा रही है।

कम पानी की फसल है अलसी, नागौर में पहली बार 115 हेक्टेयर में हुई बुआई

रामनिवास कुमावत | कुचामन सिटी (नागौर)

कुचामन सहित आसपास के क्षेत्र में पहली बार किसानों ने अलसी की बुआई की है। अब यदि अलसी की फसल को समेटने में किसी प्रकार की प्राकृतिक बाधा नहीं आई, तो यह फसल किसानों के लिए वरदान साबित होगी। इस फसल में कृषि विभाग का भी अहम योगदान रहा है। कृषि अधिकारी किसानों को जागरुक कर बीज वितरित करने एवं फसल की बुआई और देखरेख सहित सभी तरह की जानकारी देकर किसानों को उन्नत फसलों की तरफ ले जा रहे हैं। कुचामन कृषि कार्यालय के अधीन क्षेत्रों में पहली बार 115 हेक्टेयर में अलसी फसल की बुआई हुई है। इसमें अकेले कुचामन तहसील में करीब 43 हेक्टेयर में किसानों ने अलसी बोई है।

कहां कितनी बुआई

कुचामन 43 हेक्टेयर

डीडवाना 35 हेक्टेयर

परबतसर 12 हेक्टयेर

नावां 8 हेक्टेयर

मकराना 7 हेक्टेयर

लाडनूं 10 हेक्टेयर

नागौर. कुचामन सिटी के पास एक खेत में अलसी की फसल।

अलसी के पौधे के हर भाग का उपयोग

अलसी बहुमूल्य औद्योगिक तिलहन फसल है। ऐसे में अलसी का तना, बीज, पत्ते, दाने को अलग-अलग कार्यों में काम लिया जाता है। अलसी के बीज से निकलने वाला तेल खाने के ही नहीं बल्कि दवाओं में भी काम लिया जाता है। अलसी का तेल पेंट्स, वार्निश व स्नेहक बनाने के साथ प्रिंटिंग प्रेस की स्याही तैयार करने में भी काम आता है। इसका बीज फोड़े-फुंसी मिटाने के काम आता है। अलसी के तने से रेसा बनता है। अलसी के पौधे के छोटे-छोटे भाग कर कागज भी बनाया जाता है।

लागत कम व मुनाफा ज्यादा : पूरे प्रदेश में भूजल गहराता जा रहा है। ऐसे में किसानों का कम पानी से होने वाली फसलों की ओर रुझान बढ़ रहा है। कम पानी में होने वाली फसलों में अलसी भी है। कृषि अधिकारी शिशुपाल ने बताया कि अन्य फसलों में 10 से 12 बार पानी दिया जाता है, जबकि अलसी में मात्र 4 से 5 बार ही पानी से फसल तैयार हो जाती है। इस फसल से मुनाफा भी बहुत ज्यादा है।

भरतपुर(धौलपुर), मंगलवार, 3 अप्रैल, 2018 | 12

मिर्च का पौधरोपण दिसंबर व जनवरी तथा जून व जुलाई में कर सकते हैं किसान


मिर्च का पौधरोपण दिसंबर व जनवरी तथा जून व जुलाई में किया जा सकता है। हाईब्रिड मिर्च की खेती ग्रीनहाउस में कभी भी की जा सकती है।


मनीप्लांट के पौधे को आप गमले या किसी पॉट्स में लगा सकते हैं। पौधा लगाने की विधि की अधिक जानकारी के लिए कृषि पर्यवेक्षक से संपर्क करें।


आप ड़ाइमेथोएट 30-ईसी नामक कीटनाशक 2 एमएल दवा का एक लीटर पानी में घोल तैयार कर भिंडी के पौधों पर स्प्रे करें। इससे कीड़े की रोकथाम हो जाएगी।

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