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भास्कर के पाठकों के लिए विनम्र प्रयास

फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष शुरू होते ही शहर के बावड़ी चौक में खंभ रोप के साथ होली की छपाई शुरू होती थी। इसे बेर की...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 03:20 AM IST

भास्कर के पाठकों के लिए विनम्र प्रयास
फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष शुरू होते ही शहर के बावड़ी चौक में खंभ रोप के साथ होली की छपाई शुरू होती थी। इसे बेर की झाड़ की सूखी कंटीली झाड़ियों से छापा जाता था। बीच में प्रहलाद स्वरूप खंभा होता था। पुराने बाड़मेर की मुख्य होली बावड़ी के पास रावळी होली होती थी। जहां पर सबसे पहले होलिका दहन होता था। इसके बाद अन्य जगहों पर बनाई होलिका का दहन किया जाता था। सब समाजों के लोग एकत्रित होकर होलिका दहन पर एकत्रित होते थे। इस दौरान बाड़मेर रावल होलिका का दहन करवाते थे। इसके बाद दूसरे दिन धुलंडी पर बड़े कड़ाह पानी से भरे जाते थे। कड़ाह हनुमान मंदिर, सुनारों का वास सहित करीब 11 जगहों पर रखे जाते थे। इस दौरान महिलाएं व पुरुष साथ में लठमार होली खेलते थे। रंगों का प्रयोग बिलकुल नहीं होता था। महिलाएं कपड़े का लठनुमा कोड़ा बनाकर लाती थी तथा कड़ाहों के पानी में भिगोकर उन्हें भिगोने वाले पुरुषों को मारती थी। दिनभर लठमार होली खेली जाती थी। इस दौरान रेत से भी होली खेली जाती थी।

173 साल पुरानी एशियाड गेम्स में दमखम दिखा चुकी सनावड़ा की गेर आज भी पहली पसंद

देव आराधना

पहलो नाम ले जो रे चूंडाले देव गणपत रो-2

दूजो नाम ले जो रे भवानी माता रो कि देवी तूठे ला.. हां रहे देवी तूठे ला

झगड़े में देवी हाजर होवे रे कि देवी तूठे ला...

चंदा थारे चांदणे तारों रो तेज मोळो ओ-2

अरे सीताजी री पोळ माथे पहरो हड़मत रो कि ढलती रात रो.... हों रे ढलती रात रो..

अरे फोज्यां रो दल बादल ले ने हड़ुमोन चढ़या ओ-2

जाय ने लंका रे बाहर घेरो दीनों ओ कि रावण मारियों.. अरे हां रे रावण मारियो...

बजरंगी थारो हूनर भारी ओ कि रावण मारियो...

रतनलाल सोनी, 89 साल

परंपरा को जीवित रखने की जिद...

एशिया की प्रसिद्ध गेर सनावड़ा हर साल होली के दूसरे दिन चोहटे में होती है। गेर का इतिहास 173 साल पुराना है।परंपरा को जीवित रखने के लिए 1972-73 में मेले का आयोजन नेहरू युवा केंद्र, मरुधर लोक कला केंद्र के सहयोग से स्थानीय युवा मंडल एवं ग्राम पंचायत ने इसकी शुरूआत समारोह पूर्वक की। विभिन्न जाति-धर्म संप्रदाय के लोग इस गेर महोत्सव से जुड़ने लगे। इसके बाद 1982 व 1994 में गेर नृत्य ने एशियाड में प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन किया। पदमश्री स्व: मगराज जैन ने पहल की और खींयाराम जाखड़ के सहयोग एवं प्रयासों से गेर लोकप्रिय ही नहीं बल्कि 173 साल पुरानी परंपरा आज भी जीवित है।

रावळी होली के दूसरे दिन शहर के 11 स्थानों पर भरते थे पानी के कड़ाह, खेलते थे लठमार होली

वर्ष-1970

श्रृंगार

सोने रो माद ळियो देवी जोगमाया बांधे हो...2

आभा भरणो मोळियो पाबूजी बांधे हो...कि पाबू परणीजे.. हां रे पाबू परणीजे....

अरे सोने की छड़ियों सूं तोरण बांधे हो कि पाबू परणीजे...

अरे हाथी रे हौदे सूं तोरण बांधे हो कि पाबू परणीजे...

खेजड़ली री देवी माता नाहर ने सिणगारे हो...2

नाहर ने सिणगार देवी हाकळ मारे हो कि सुणजो सिरदारों.. अरे हां रे सुणजो सिरदारों..

अरे झगड़े में थोंरी जीत व्हेला ओ कि सुणजो सिरदारों.. हां रे सुणजो सिरदारों..

अरे झगड़े में देवी भेळी रे ला रे कि सुणजो सिरदारों...

सोने रो माद ळियो देवी जोगमाया बांधे हो...2

आभा भरणो मोळियो पाबूजी बांधे हो...कि पाबू परणीजे.. हां रे पाबू परणीजे....

अरे सोने की छड़ियों सूं तोरण बांधे हो कि पाबू परणीजे...

अरे हाथी रे हौदे सूं तोरण बांधे हो कि पाबू परणीजे...

खेजड़ली री देवी माता नाहर ने सिणगारे हो...2

नाहर ने सिणगार देवी हाकळ मारे हो कि सुणजो सिरदारों.. अरे हां रे सुणजो सिरदारों..

अरे झगड़े में थोंरी जीत व्हेला ओ कि सुणजो सिरदारों.. हां रे सुणजो सिरदारों..

अरे झगड़े में देवी भेळी रे ला रे कि सुणजो सिरदारों...

सोने रो माद ळियो देवी जोगमाया बांधे हो...2

आभा भरणो मोळियो पाबूजी बांधे हो...कि पाबू परणीजे.. हां रे पाबू परणीजे....

अरे सोने की छड़ियों सूं तोरण बांधे हो कि पाबू परणीजे...

अरे हाथी रे हौदे सूं तोरण बांधे हो कि पाबू परणीजे...

खेजड़ली री देवी माता नाहर ने सिणगारे हो...2

नाहर ने सिणगार देवी हाकळ मारे हो कि सुणजो सिरदारों.. अरे हां रे सुणजो सिरदारों..

अरे झगड़े में थोंरी जीत व्हेला ओ कि सुणजो सिरदारों.. हां रे सुणजो सिरदारों..

अरे झगड़े में देवी भेळी रे ला रे कि सुणजो सिरदारों...

बाबूसिंह रावणा राजपूत, 69 साल

बाबूसिंह रावणा राजपूत, 69 साल

बाबूसिंह रावणा राजपूत, 69 साल

कर्मशीलता

व्यंग्य

हाेली माता आवरी, तेरे तेवटियों घड़ लाऊ रे।

तेवटियों कतौर कर, डोकरिये साथे जाऊ रे।

डोकरियों डिग जासी, राबड़ली कुण पासी रे।

राबड़ली पिलासी म्हारो भाई ने भतीजा, ल्योढ़ी कर ने परणासी रे।

होली माता आवरी तेरे टसरक टीलों कड्यो रे।

कांई करे वाभस गौरी रे, कांई करे वाभस काली रे।

गौरकी महिड़ों बिलौवे कालकी पुत्र रमावे रे।

कांई वीरो गोरों रे, कांई करे वीरो कालो रे।

गेरियां तो रात जगावे कालियों पुत्र रमावे रे।

होली माता आवरी तेरे टसरक टीलों काढ़ो रे।

हाेली माता आवरी, तेरे तेवटियों घड़ लाऊ रे।

तेवटियों कतौर कर, डोकरिये साथे जाऊ रे।

डोकरियों डिग जासी, राबड़ली कुण पासी रे।

राबड़ली पिलासी म्हारो भाई ने भतीजा, ल्योढ़ी कर ने परणासी रे।

होली माता आवरी तेरे टसरक टीलों कड्यो रे।

कांई करे वाभस गौरी रे, कांई करे वाभस काली रे।

गौरकी महिड़ों बिलौवे कालकी पुत्र रमावे रे।

कांई वीरो गोरों रे, कांई करे वीरो कालो रे।

गेरियां तो रात जगावे कालियों पुत्र रमावे रे।

होली माता आवरी तेरे टसरक टीलों काढ़ो रे।

बाली देवी, महिला

बाली देवी, महिला

कृष्ण भक्ति

वर्ष-2017

प्रशंसा

आळा रे लीला होली रा थाम्ब रे।

बारहे महिणो री होली पांवणी रे लाल।

चोहटो तो भरियो होळी रे गेरियों सूं रे..

बारहे महिणों री होली पांवणी रे लाल।

बिच में तो सुरंगाळो म्हारोड़ो बीर रे..

बारहे महिणों री होली पांवणी रे लाल।

चोहटे में गेरियों री लागी रमझोळ रे...।

बारहे महिणों री होळी पावणी रे लाल।

चोहटो तो भरियो होळी रे सिणगारयों सूं..

बीच में चुड़लाळी म्हारी भाभिसा रे...

बारहे महिणा होळी पांवणी रे लाल।

आळा रे लीला होली रा थाम्ब रे।

बारहे महिणो री होली पांवणी रे लाल।

चोहटो तो भरियो होळी रे गेरियों सूं रे..

बारहे महिणों री होली पांवणी रे लाल।

बिच में तो सुरंगाळो म्हारोड़ो बीर रे..

बारहे महिणों री होली पांवणी रे लाल।

चोहटे में गेरियों री लागी रमझोळ रे...।

बारहे महिणों री होळी पावणी रे लाल।

चोहटो तो भरियो होळी रे सिणगारयों सूं..

बीच में चुड़लाळी म्हारी भाभिसा रे...

बारहे महिणा होळी पांवणी रे लाल।

समदा देवी, 65 वर्ष

समदा देवी, 65 वर्ष

ढूंढ़ का गीत

ऐसे खेला जाता है गेर

सनावड़ा का गेर मेला अन्य गेर नृत्य से अलग और अनोखा है। ढोल की थाप, थाली की टंकार पर गेर नृतक हाथों में पतली डांडिया लिए नृत्य करते है और आजू-बाजू के नर्तकों से अपनी डांडियों को टकराते हैं। गेर नृतक सफेद और लाल आंगी पहने अपनी प्रस्तुति देते है। गेर आंगी-बांगी, घाघरा घेर नुमा होता है। कमर पर कड़बंदा, हाथों में घूंघरे, विभिन्न रंगों के लाल, पीला साफा पहने कलाकार होते है। साफों में कलंगी लगाए, गले में कांच कसीदाकारी की हुई पेशी पहनी होती है।-खींयाराम जाखड़, संरक्षक, गेर नृत्य सनावड़ा

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Web Title: भास्कर के पाठकों के लिए विनम्र प्रयास
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