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पिता व भाई की दुर्घटना में मौत के बाद दमाराम ने गोसेवा को समर्पित किया जीवन, पूरी संपत्ति की गोशाला के नाम

भाई व पिता की दुर्घटना में हुई मौत के बाद दमाराम का मन क्षुब्ध हो गया। मन में विरक्ति जग गई और प|ी के साथ गो सेवा का...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 02, 2018, 03:45 AM IST

भाई व पिता की दुर्घटना में हुई मौत के बाद दमाराम का मन क्षुब्ध हो गया। मन में विरक्ति जग गई और प|ी के साथ गो सेवा का रास्ता अपना लिया। दमाराम ने तारातरा मठ के महंत प्रतापपुरी महाराज से दीक्षा ली और दमाराम से दयालपुरी महाराज बन गए। इन्होंने श्री पाबूजी राठौड़ गोशाला के नाम से संस्था रजिस्टर्ड करवाकर गो सेवा को ही अपना जीवन बना लिया।

दो साल पूर्व हुई दुर्घटना में भाई की मौत के बाद दयालपुरी की पूरी जिंदगी बदल गई। बाड़मेर में विष्णु कॉलोनी स्थित अपने प्लॉट को गो शाला में बदल दिया। शुरू में पांच गाय व बैल थे, जो अब 70 के पार पहुंच गए है। दो साल पूर्व दयालपुरी उर्फ दमाराम निजी बस में ड्राइवर थे। इन्होंने 20 साल नौकरी की। इन्होंने अपने गांव सरनू में पैतृक जमीन करीब आठ बीघा भी गोशाला के नाम कर दी है। पति-प|ी दोनों ही अब दिन रात गोवंश की सेवा करते हैं। इन्होंने बाड़मेर में कई आवारा घूम रहे पशुओं को अपनी गोशाला में शरण दी है।

मंडे पॉजिटिव

बाड़मेर. विष्णु कॉलोनी स्थित गोशाला में गायों की सेवा करते दयालपुरी।

जीवन में निराश हो गए तो प|ी के साथ शुरू कर दी गोसेवा

दमाराम उर्फ दयालपुरी महाराज ने बताया कि दो साल पहले भाई व पिता की दुर्घटना हुई मौत के बाद मन में विरक्ति जाग गई। चारों ओर मुझे निराशा ही निराशा नजर आ रही थी। जीने का कोई सार नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में स्वविवेक से गाय की सेवा करने की मन में धारणा कर ली। इसके बाद संस्था बनाई और खुद की संपत्ति संस्था के नाम कर दी। बाड़मेर में एक प्लॉट खरीद रखा था, उसमें गो सेवा का कार्य शुरू कर दिया। गो वंश को अपनी संतान मानकर उनकी सेवा का कार्य शुरू किया।

गायों की सेवा से बढ़कर कुछ नहीं

दयालपुरी महाराज का कहना है कि गाे सेवा से बढ़कर जीवन में कोई सेवा नहीं है। गाय हमारे लिए माता का दर्जा रखती है। यह हमारी पोषक है, लेकिन वर्तमान में गोवंश का हाल देखकर दर्द होता है। उन्होंने लोगों से गौ वंश को अपना स्वार्थ त्याग कर सेवा करने की अपील की है। उन्होंने वर्तमान में गौ शालाओं की स्थिति के बारे में भी बताते हुए कहा कि गायों की सेवा करने वाली गोशालाएं व्यवसायिक नहीं होती। इनका लक्ष्य मात्र सेवा ही है। ऐसे में गायों से होने वाले उत्पादों को बेच कर गायों की सेवा में ही लगाया जाता है। इसलिए उन्होंने गोशालाओं को प्रोत्साहित करने की अपील की है।

बीस साल की ड्राइवर की नौकरी, अब पति-प|ी दोनों करते हैं गायों की सेवा

गायों के नाम करते है चंदा इकट्ठा

दयालपुरी महाराज ने बताया कि गो सेवा के लिए रोजाना बसों में गोशाला संस्था के नाम की पेटी लेकर सफर करते हैं तथा चंदा इकट्ठा करते हैं। बाड़मेर से विभिन्न मार्गों पर चलने वाली निजी व रोडवेज बसों में रोजाना चंदा लेने के लिए जाते हैं। ड्राइवरों से जान पहचान होने के कारण इस काम में उनकी मदद हो जाती है। कई लोग चलाकर गायों के नाम अच्छा चंदा देते हैं। कई दानदाता ऐसे भी है जो गुप्त दान करते हैं तथा चारे की गाड़ी भी डलवा देते हैं।

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