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पीएचसी-सीएचसी पर लगा दिए 113 संविदा कार्मिक, 2 साल से 1 करोड़ का मानदेय बकाया

मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना के तहत लगे संविदा कार्मिकों को विभागीय लापरवाही का खामियाजा मानदेय से वंचित रहकर...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 02, 2018, 06:10 AM IST

मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना के तहत लगे संविदा कार्मिकों को विभागीय लापरवाही का खामियाजा मानदेय से वंचित रहकर भुगतना पड़ रहा है। 2016 में आरएमआरएस के तहत चिकित्सा विभाग ने जिले की पीएचसी-सीएचसी पर अलग-अलग आदेशों से 113 संविदा कार्मिकों को लगा दिया, लेकिन इनमें से 47 कार्मिकों का ही बजट विभाग मुहैया करवा रहा है।

वजह, जब इन संविदा कार्मिकों को लगाया तो 47 पदों की डिमांड जिला स्तर से भेजी गई। दो साल से डिमांड नहीं भेजने से शेष पदों के लिए बजट नहीं आ रहा है। इस लापरवाही पर पर्दा डालने के लिए अब स्थानीय स्तर पर 113 कार्मिकों को 47 जनों का मानदेय वितरित किया जा रहा है। इससे लगभग सभी कार्मिकों का 6 से 12 माह का तक का वेतन बकाया चल रहा है। इसको लेकर संविदा कार्मिकों ने जिला कलेक्टर से लेकर चिकित्सा मंत्री को अवगत करवाया, मगर उनकी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है। सीएमएचओ ने इस गलती को स्वीकार किया और उनका कहना है कि शेष पदों की स्वीकृति व बजट को लेकर विभाग को अवगत करवाकर गलती को दुरुस्त करवा लिया गया है।

सूचना सहायकों की भर्ती हुई तो हटाया

वर्ष 2013 में सूचना सहायकों की भर्ती हुई, तब विभाग ने आदेश निकालकर सभी डाटा एंट्री ऑपरेटर को हटा दिया। इस पर अलग-अलग कर ये कार्मिक कोर्ट में चले गए। कोर्ट से स्टे मिलने पर वर्ष 2015 तक 96 कार्मिकों ने काम किया। लेकिन दिसंबर 2015 में कोर्ट का फैसला आ गया, जो इनके विरुद्ध रहा। इससे इन्हें हटना पड़ा। लेकिन जनवरी 2016 में सूचना सहायकों का विभाग बदल दिया गया।

सीएमएचओ ने मानी गलती

भास्कर संवाददाता | बाड़मेर

मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना के तहत लगे संविदा कार्मिकों को विभागीय लापरवाही का खामियाजा मानदेय से वंचित रहकर भुगतना पड़ रहा है। 2016 में आरएमआरएस के तहत चिकित्सा विभाग ने जिले की पीएचसी-सीएचसी पर अलग-अलग आदेशों से 113 संविदा कार्मिकों को लगा दिया, लेकिन इनमें से 47 कार्मिकों का ही बजट विभाग मुहैया करवा रहा है।

वजह, जब इन संविदा कार्मिकों को लगाया तो 47 पदों की डिमांड जिला स्तर से भेजी गई। दो साल से डिमांड नहीं भेजने से शेष पदों के लिए बजट नहीं आ रहा है। इस लापरवाही पर पर्दा डालने के लिए अब स्थानीय स्तर पर 113 कार्मिकों को 47 जनों का मानदेय वितरित किया जा रहा है। इससे लगभग सभी कार्मिकों का 6 से 12 माह का तक का वेतन बकाया चल रहा है। इसको लेकर संविदा कार्मिकों ने जिला कलेक्टर से लेकर चिकित्सा मंत्री को अवगत करवाया, मगर उनकी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है। सीएमएचओ ने इस गलती को स्वीकार किया और उनका कहना है कि शेष पदों की स्वीकृति व बजट को लेकर विभाग को अवगत करवाकर गलती को दुरुस्त करवा लिया गया है।

निदेशालय के आदेश पर फिर लगाया : जैसे ही सूचना सहायकों का मेडिकल से आईटी सेल हुआ तो निदेशालय ने आदेश जारी किया कि जो डाटा एंट्री ऑपरेटर पूर्व में लगे थे, उन्हें प्राथमिकता देते हुए वापिस लगाया जाए। इस दौरान 31 कार्मिकों का कोर्ट से फैसला आ रखा था, जिस पर उन्हें वापिस लगा दिया गया। वहीं जो 16 नई पीएचसी व सीएचसी सृजित हुई थी, वहां पर डाटा एंट्री ऑपरेटर काम कर रहे थे। ऐसे में स्थानीय स्तर से इन 47 पदों के लिए ही डिमांड निदेशालय को भेजी, जिसकी स्वीकृति आई और इसके बाद से अब तक 47 पदों के लिए ही बजट आ रहा है। जबकि सितंबर 2016 में शेष पदों पर भी डाटा एंट्री ऑपरेटर लगा दिए गए, जो पद आज तक स्वीकृत नहीं है।

गलती तो हुई है, जिसकी वजह से मानदेय अटका हुआ है। अब हमने अन्य पदों की स्वीकृत व मानदेय की डिमांड करने के साथ गलती को दुरुस्त करवा लिया है। -डॉ. कमलेश चौधरी, सीएमएचओ

113 में बांट रहे 47 का मानदेय

निदेशालय से 47 पदों के लिए बजट दिया जा रहा है। जबकि स्थानीय स्तर पर इनका मानदेय 113 कार्मिकों में बांटा जा रहा है। स्थिति यह बन गई है कि स्वीकृत व अस्वीकृत दोनों पदों पर काम कर रहे कार्मिकों का 6 से 12 और इससे ज्यादा महीनों का मानदेय बकाया पड़ा है। कार्मिकों का कहना है कि विभाग की लापरवाही के चलते उन्हें घर खर्च चलाना भी भारी पड़ रहा है। आज की महंगाई में उन्हें कई आर्थिक परेशानियों से रूबरू होना पड़ रहा है।

गलती तो हुई है, जिसकी वजह से मानदेय अटका हुआ है। अब हमने अन्य पदों की स्वीकृत व मानदेय की डिमांड करने के साथ गलती को दुरुस्त करवा लिया है। -डॉ. कमलेश चौधरी, सीएमएचओ

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