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बुराइयों से बचने के लिए गुरु की शरण जरूरी, दीक्षा से मन पर नियंत्रण : शास्त्री

भास्कर संवाददाता | भीखोड़ाई क्षेत्र के प्रभुपुरा गांव में चल रही भागवत कथा के छठे दिन मंगलवार को कंस वध की कथा का...

Dainik Bhaskar

Feb 02, 2018, 02:00 AM IST
भास्कर संवाददाता | भीखोड़ाई

क्षेत्र के प्रभुपुरा गांव में चल रही भागवत कथा के छठे दिन मंगलवार को कंस वध की कथा का वर्णन किया गया। कथावाचक रामस्नेही संत राममनोहर शास्त्री एवं उनके गुरु जगदीशराम महाराज ने कहा कि यहां कंस मन का प्रतीक है। आज भी वह प्रत्येक मानव को बुराइयों की ओर ले जा रहा है। इसका प्रमाण है, हमारा समाज आज समाज में बढ़ता हुआ पाप और भ्रष्टाचार मानव मन की देन है। प्रत्येक मानव अपने स्वार्थ की पूर्ति करना चाहता है फिर वो मार्ग पाप का ही क्यों न हो। आज इसी मन का नियंत्रित करने के लिए मानव कभी शिक्षाओं का सहारा लेता है तो कभी कानून की मोटी जंजीरों का। फिर भी वह अपने मन को नियंत्रित नहीं कर पाया है। संतों ने कहा है कि मन शिक्षा से नहीं दीक्षा से नियंत्रित होता है। दीक्षा जिसका अर्थ है दिखा देना जब तक मनुष्य वास्तविक धर्म से नहीं जुड़ जाता तब तक उसका मन परिवर्तित नहीं हो सकता है। मनुष्य की मन व बुद्धि के अनुसार धर्म की कई परिभाषाएं है, पर यह परिभाषाएं भी मानव मन को बदलने में असमर्थ है। इसलिए आवश्यकता है श्रीकृष्ण जैसे गुरु की शरण में जाने की वहीं इस मथुरा रुपी देह में ईश्वर का प्रगटीकरण करते हैं और तभी मन रुपी कंस की समाप्ति होगी। दुष्ट कंस के वध हो जाने के पश्चात उग्रसेन को मथुरा के राज सिंहासन पर बैठाया गया और भगवान कृष्ण सांदीपनी ऋषि के आश्रम में 64 दिनों में ही संपूर्ण शिक्षा को अर्जित कर लिया एवं गुरू दक्षिणा में अपने गुरु के मृत पुत्र को जीवित लाकर दिया। कालयवन का मुचकुंद के देखते ही भस्म हो जाने एवं जरासंध की सेना को सतरह बार हराने के पश्चात भगवान श्री कृष्ण ने समस्त यदुवंशियों को अपनी ही योग शक्ति से समुंदर के बीच सोने की द्वारिका नगरी में स्थापित कर देने की कथा को सुनाया गया। कथा में भगवान द्वारकाधीश ने अपने प्रिय उद्धव को ज्ञान से अधिक प्रेम का पाठ पढ़ाने के लिए एवं अपना संदेश सुनाने के लिए वृन्दावन भेजने को बहुत सुंदर एवं रोचक तरीके से श्रोताओं को समझाया। विदर्भ के राजा भीष्म की पुत्री रुक्मणी द्वारा द्वारकाधीश को पत्र लिखने तथा भगवान श्री कृष्ण द्वारा रुक्मणी हरण एवं विवाह के प्रसंग को विस्तार से सुनाया गया। उन्होंने द्वारकाधीश के साथ कालिंदी, मित्र बिन्दा, सत्या, भद्रा तथा लक्ष्मणा नाम की पटरानियों से विवाह एवं भौमासुर द्वारा कैद की हुई सोलह हजार एक सौ राज कन्याओं को कैद से मुक्त कराकर उनसे विवाह के प्रसंग तथा भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर की पुत्री उषा के विवाह प्रसंग को सुनाया। उन्होंने बताया गया कि एक बार की हुई वस्तु का दान पुन: नहीं किया जाना चाहिए। नृगोपाख्यान सुनाते हुए बताया गया कि राजा नृग द्वारा एक गाय को दो बार दान में देने के कारण गिरगिट की यौनी में जन्म लेना पड़ा। संत शास्त्री ने बताया कि नारद ने द्वारिका जाकर भगवान के दाम्पत्य जीवन की लीला के दर्शन तथा भगवान द्वारा पौंड्रक के वध तथा बलराम के हाथों द्रविद वानर के मरने की कथा एवं धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ में द्वारिकाधीश को निमंत्रण देने की कथा को सुनाया। भगवान का भक्त गरीब हो सकता है परन्तु स्वार्थी नहीं होता है। वह अपने सुख की प्राप्ति के लिए ईश्वर को कभी कष्ट नहीं पहुंचाता है। सुदामा चरित्र के कथा प्रसंग को समझाते हुए बताया गया कि सुदामा ने द्वारिका जाकर भी द्वारिकाधीश के सामने अपनी गरीबी का दुखड़ा नहीं सुनाया परन्तु द्वारिकाधीश ने सुदामा को बिना बताए ही उसके सारे कष्टों का निवारण कर दिया।

भीखोड़ाई. प्रभुपुरा में चल रही हे भागवत कथा में उपस्थित श्रद्धालु

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