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9 वर्षीय मासूम डिप्थीरिया से पीड़ित, उपचार के लिए गुजरात रेफर, शहर में पहला मामला

Barmer News - डिप्थीरिया यानि गलघोंटू नामक बीमारी डीपीटी का टीका नहीं लगाने के कारण होती है। समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण यह...

Nov 10, 2019, 07:15 AM IST
डिप्थीरिया यानि गलघोंटू नामक बीमारी डीपीटी का टीका नहीं लगाने के कारण होती है। समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण यह बीमारी जानलेवा हो जाती है। इस बीमारी की चपेट में शहर के वार्ड नं 2 की 9 वर्षीय खुशबू पुत्री प्रेम चंद आ गई। गले में सूजन एवं दो दिन बुखार आने पर उसे जिला अस्पताल में चेक कराया गया। यहां से उसे डीसा रेफर कर दिया गया। डीसा में 12 घंटे इलाज के बाद उसे पालनपुर फिर वहां से अहमदाबाद रेफर किया गया। अब उसका अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में इलाज चल रहा है। गले का ऑपरेशन भी हुआ लेकिन तबीयत अभी भी नाजुक बनी हुई है। खुशबू के पिता की करीब चार वर्ष पहले मौत हो गई थी, उसकी माता संतोष लोगों के घर काम कर अपना एवं बच्चों का जीवन निर्वाह करती है। इस बीच संतोष के ऊपर एक बार फिर मुसीबत ने जकड़ लिया है। उसकी बच्ची अहमदाबाद में उपचाराधीन है, इधर बच्चे के भी डिप्थीरिया संभावित होने के कारण वेक्सीनेशन किया गया। स्वास्थ्य विभाग को सूचना मिलने के बाद टीम ने शनिवार को मोहल्ले के 5 वर्ष से कम उम्र के 19 बच्चों, 5-10 वर्ष के 24, 10-15 वर्ष के 18 एवं 4 बुजुर्गों को डीपीटी के टीके, बूस्टर डोज दी गई।

इधर, मासूम के भाई तनसुख 12 वर्ष एवं दो अन्य लोगों के गले मे दर्द व बुखार आने पर महिला संगठन से जुड़ी अनिता सोनी ने अस्पताल में जांच करवाई एवं सीएमएचओ को पूरे मामले की जानकारी दी गई कि एक लड़की को डिप्थीरिया हो गया है, मोहल्ले के अन्य लोग इसकी चपेट में हो सकते हैं। रोकथाम के लिए प्रयास किए जाएं। इसके बाद पब्लिक हैल्थ मैनेजर मूलशंकर एवं स्वास्थ्य विभाग की टीम ने शनिवार को डिप्थीरिया संभावित 65 लोगों के वेक्सीनेशन किया। सीएमएचओ के अनुसार समय पर टीकाकरण करवाकर इस रोग से बचा जा सकता है।

बाड़मेर . वार्ड नंबर 2 मेंं वेक्सीनेशन करती स्वास्थ्य विभाग की टीम।

डिप्थीरिया है उग्र संक्रामक रोग

डाॅक्टरों के अनुसार रोहिणी या डिप्थीरिया उग्र संक्रामक रोग है, जो 2 से लेकर 10 वर्ष तक की आयु के बालकों को अधिक होता है। सभी आयु वालों को यह रोग हो सकता है। यह रोग शुरुआत में गले में होता है और टॉन्सिल भी आक्रांत होते हैं। स्वर यंत्र, नासिका, नेत्र तथा बाह्य जननेंद्रिय भी आक्रांत हो सकती हैं। यह वास्तव में स्थानिक रोग है, किंतु जीवाणु द्वारा उत्पन्न हुए जीव विष के शरीर में व्याप्त होने से रुधिर विषाक्तता के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। बुखार, अरुचि, नाक का बहना, गले में दर्द, सिर तथा शरीर में दर्द आदि लक्षण होते हैं। इनका विशेष हानिकारक प्रभाव हृदय पर पड़ता है। कुछ रोगियों में इनके कारण हृदय रोक से मृत्यु हो जाती है।


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