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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर दैनिक भास्कर का विनम्र प्रयास, वीरांगनाओं का किया सम्मान

3 वर्ष पहले
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आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। इस मौके दैनिक भास्कर ने उन वीरांगनाओं का सम्मान किया है, जिनके पति और बेटों ने शौर्य व पराक्रम के साथ देश की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपनी जान की बाजी लगा दी। भास्कर कार्यालय में गुरुवार को 1965 के शहीद धनसिंह नेवरी,1971 में शहीद दुर्जनसिंह रेडाणा, विशन सिंह भूंका भगतसिंह, मघाराम बायतु पनजी, वाघाराम कोसरिया, देवाराम बायतु पनजी, नारणाराम गिड़ा, मोहन भारती, 1988 के शहीद नाथूसिंह थुंबली, 1996 के मूलाराम बिसारणिया, 1999 के शहीद उगमसिंह ढूंढा, 2006 के खेताराम उण्डू, 2015 के शहीद धर्माराम तारातरा के परिवार का सम्मान किया गया। शहीदों की शहादत और उनके शौर्य-पराक्रम को सलाम किया। पूर्व सैनिक परिषद के अध्यक्ष हीरसिंह भाटी के हाथों शहीदों के परिजनों का सम्मान करवाया।

इस दौरान शहीद सैनिकों की वीरांगनाओं ने दैनिक भास्कर की प्रिटिंग प्रेस का अवलोकन किया। अखबार के न्यूज रूम में खबर तैयार करने से पेज बनाने तक के तरीके को समझा। इसके बाद प्रिटिंग प्लांट का अवलोकन किया। यहां अखबार प्रिंट कैसे होता है, उसे बारीकी से समझा। पहली बार किसी अखबार के प्रिटिंग प्लांट को देख वीरांगनाएं खुश नजर आईं।

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बाड़मेर के शहीदों के परिजनों और अ. भा. पूर्व सैनिक सेवा परिषद के अध्यक्ष कैप्टन हीरसिंह भाटी का आभार, जिन्होंने बाड़मेर में पहली बार समाचार पत्रों में सिर्फ भास्कर कार्यालय आकर अपना समय दिया।

भास्कर न्यूज रूम लाइव
सुबह 11:30 से दोपहर 2:30 बजे तक
पुलवामा हमले के बाद हमारी तरफ से आतंकवाद के खिलाफ की गई कार्रवाई पूरे देश के लिए गर्व की बात है। हमारा आप सभी से निवेदन है कि अब आतंकवाद काे जड़ से खत्म करने की जरूरत है। अब तक हमारे देश के कई जवानों ने शहादत दी है। अब और नहीं। हमारा देश आज विश्व की प्रथम पंक्ति में खड़ा है। यह देशवासियों के लिए गर्व की बात है, लेकिन अब हमारे नाम से आतंक व उसे शह देने वाले देश कांपने चाहिए, कुछ ऐसा कीजिए। अब हमारे जवानों का खून नहीं दुश्मन की धरती पर मातम होना चाहिए। अब हमें शहीद जवानों के हर कतरे का बदला लेना है, ताकि कोई हमारे सैनिक की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं करे। आपसे निवेदन है कि शहीदों की शहादत व देश सुरक्षा पर कोई राजनीति नहीं हो। यह एक ऐसा विषय है, जो हमारे लिए शौर्य, सम्मान और एकता से जुड़ा हुआ है। यदि कोई इस मुद्दे पर राजनीति करने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें। हमारे सैनिकों के हाथों में आधुनिक हथियार होने चाहिए। जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन क्लीन आउट के दौरान जब दुश्मनों को मारा गया तो गर्व होने लगा कि आतंकियों के खात्मे की दिशा में सरकार ने कदम उठाया है, लेकिन यहां तो राजनीति के लिए सेना को भी नहीं छोड़ा जा रहा है। यह शर्मनाक है, ऐसे लोगों से हमारी विनती है कि वे कम से कम सेना को तो राजनीति में न घसीटें, राजनीति के लिए खूब मुद्दे हैं। फौज को अपना काम करने दें। देश की उत्तरोतर प्रगति के लिए हर देशवासी आपके साथ हैं। देश की एकता, अखंडता व सेना के मनोबल की बढ़ोतरी की हमेशा कामना। सादर।

1965 के युद्ध में शहीद हुए धनसिंह की प|ी मोहर कंवर

आदरणीय... अब हमारे जवानों की शहादत नहीं दुश्मन की धरती पर मातम होना चाहिए
आदरणीय प्रधानमंत्री व तीनों सेनाओं के अध्यक्ष महोदय,

1971 में शहीद हुए मोहन भारती की प|ी उगम कंवर

सरहदी बाड़मेर जिले की हम सभी वीरांगनाएं

1971 के युद्ध में शहीद नारणाराम की प|ी थानी देवी

राष्ट्र, सेना व राजनीति पर वीरांगनाआंे ने खुलकर बोली मन की बात
1999 के कारगिल शहीद उगमसिंह की प|ी किरण कंवर

2006 में शहीद हुए खेताराम की प|ी मीरा देवी

2015 में शौर्य चक्र विजेता शहीद धर्माराम की प|ी टीमू देवी

और यह पीड़ा
जवान के शहीद होने के बाद टूटता है पूरा परिवार
वीरांगनाओं ने कहा कि जवान की शहादत के बाद पूरा परिवार टूट जाता है। सरकारें, प्रशासन, पड़ोसी एक-दो माह तो खबर लेते हैं, लेकिन धीरे-धीरे इन परिवारों को भूल जाते हैं। जब एक प|ी अपने पति को देश के लिए खो देती है तो उसके लिए जिंदगी का सफर कितना मुश्किल होता है। सरकारें शहीदों के नाम घोषणाएं तो कर देती हैं, लेकिन कोई उनके घर लौट कर यह देखने कभी नहीं आता कि किस हाल में शहीद की प|ी जीने की हिम्मत जुटाती है।

एक सैनिक की ऐसी होती है जिंदगी...
सैनिक देश के लिए सरहदों पर शहीद हो रहे हैं। सरहदों पर गोली, बारूद के बीच उनके दिल का एक कोना अपनों के लिए भी धड़कता रहता है। वह देश की रक्षा के लिए हंसते हुए जान की बाजी लगाता है। एक तरफ देश की सुरक्षा का जज्बा। दूसरी ओर परिवार के लिए सरोकार। देश की सरहदों पर तैनात रहते हुए जवान चिंता रखते हैं, खैर-खबर लेते हैं, अपने परिवार की, मां-बाप, प|ी और बच्चों की। भाइयों की, गांवों की, खेत और खलिहानों की। परिवार के सामाजिक सरकारों की।

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