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परदेसी की हास्य कविताएं सजाती हैं महफिलें, हजारों प्रशंसक, फिर भी रोजगार का संकट

Barmer News - बॉर्डर से कुछ ही किलोमीटर दूर पर रहने वाले भोजाराम मेघवाल हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बने हुए हैं। उन्हें बॉर्डर...

Nov 25, 2019, 07:42 AM IST
बॉर्डर से कुछ ही किलोमीटर दूर पर रहने वाले भोजाराम मेघवाल हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बने हुए हैं। उन्हें बॉर्डर क्षेत्र के गांवों में शादी व समारोह में सभी लोग कविता पाठ के लिए सम्मान के साथ बुलाते हैं। सरूपे का तला निवासी भोजाराम मेघवाल उर्फ कवि भोजराज परदेसी सीमावर्ती गांवों में कविताओं व दोहों से लोगों के चहेते बने हुए हैं। वे सभी लोगों की शादी की महफिलों में जाकर हास्य रस की कविताएं व दोहों से चार चांद लगाते हैं।


1971 में पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए थे भारत, चौहटन उपखंड के सरूपे का तला गांव में बनाया आशियाना, सिंधी व ढाटी मारवाड़ी भाषाओं में कविताओं से मिली शौहरत

भोजाराम मेघवाल का जन्म पाकिस्तान में हुआ था। वर्ष 1971 में पाकिस्तान से भारत आए तथा चौहटन उपखंड के सरूपे का तला गांव में आकर बसे तथा इस गांव को अपनी कर्मस्थली बनाया। यहां आकर सिंधी व ढाटी मारवाड़ी भाषाओं में कविताएं बनानी शुरू की। भोजराज ने अब तक सैकड़ों कविताएं स्थानीय व क्षेत्रीय भाषाओं में लिखी हैं, तथा उनका सैकड़ों बार वाचन किया है। उनकी वाचन शैली व कविताएं लोगों को बहुत पसंद आती हैं। भोजराज परदेशी ने अब तक जितनी भी कविताएं लिखी हैं, वे सब सिंधी भाषा में लिखी हैं। उन्हें सिर्फ सिंधी भाषा ही लिखना आता है पर उनकी कविताएं विभिन्न भाषाओं में हैं। उन्होंने पशु पक्षी, पेड़-पौधे, राजनीति, टिड्डियों व राजनीति सहित विभिन्न विषयों व मुद्दों पर कविताएं लिखी हैं। उनकी ज्यादातर कविताएं हास्य रस की हंै।

भोजराज परदेसी

उस पार भी भोजराज के प्रशंसक

भोजराज परदेसी पाकिस्तान से भारत आकर बसे तथा कविताओं का सिलसिला जारी रखा। टेप रिकॉर्डर के जमाने में सीमावर्ती गांवों के हर गांव में भोजराज की कविताओं की कैसेट हुआ करती थी। अब टेप रिकॉर्डर की जगह मोबाइल ने ले ली है, लेकिन हजारों लोग आज भी उनकी कविताओं के मुरीद हं। भारत ही नहीं सीमा के उस पार पाकिस्तान में भोजराज की कविताओं को सुना जाता है।

मार्गदर्शन और प्रोत्साहन की रही कमी अखर रही

भोजराज ने स्थानीय क्षेत्रीय भाषाओं में कविताएं लिखकर लोगों को खूब हंसाया तथा महफिलों को सजाया, लेकिन उन्हें मार्गदर्शन व प्रोत्साहन नहीं मिला। इससे वे बड़े मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन नहीं कर पाए। वे बताते हैं कि गांवों के लोगों ने उनकी कविताओं को खूब सराहा, लेकिन सही मार्गदर्शन व प्रोत्साहन न मिलने के कारण उन्हें बड़ा मंच नहीं मिल पाया। परदेसी ने खेती बाड़ी को आजीविका का साधन बनाया। खेती-बाड़ी ठीक नही होने तथा कोई सरकारी लाभ न मिलने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। अब वे आजीविका के लिए मजदूरी पर ध्यान दे रहे हैं। मन से वह कवि हैं, लेकिन परिस्थितियों के कारण इस कला से दूरी बढ़ रही है।

हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्म के लोगों ने दिया पूरा सम्मान


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