पितृ पक्ष अाज सुबह 8:41 बजे से, पितृ विसर्जन 28 को

Barmer News - हिंदू धर्म में जातक के गर्भधारण से लेकर मृत्यु के उपरांत तक कई संस्कार होते हैं। अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना...

Bhaskar News Network

Sep 14, 2019, 07:22 AM IST
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हिंदू धर्म में जातक के गर्भधारण से लेकर मृत्यु के उपरांत तक कई संस्कार होते हैं। अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। अंत्येष्टि के पश्चात भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है। लेकिन, भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन की अमावस्या तक पूरे पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। पंडितों के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा शनिवार सुबह 8:41 के बाद से पितृपक्ष आरंभ हो जाएगा। सपैतृक अमावस्या पितृ विसर्जन 28 सितंबर शनिवार को होगा। जिसे महालया पर्व के रूप में संपन्न किया जाता है।

भारतीय संस्कृति में जीवित रहने पर भी होते हैं श्राद्ध कर्म

देवपूजा से पहले जातक को अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिए। कहा जाता है कि पितरों के प्रसन्न होने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जीवित रहते हुए घर के बड़े- बुजुर्गों का सम्मान और मृत्यु के उपरांत श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। इसके पीछे यह मान्यता भी है कि यदि विधि-विधान के अनुसार पितरों का तर्पण न किया जाए तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्युलोक में भटकती रहती है। पितरों को महाविष्णु के रूप में मान्य करते हुए उनकी प्रसन्नता के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराकर वस्त्र आदि से उनका सम्मान करने से परिवार में सुख शांति व प्रसन्नता बनी रहती है तथा वंश वृद्धि भी होती है। पंडितों का कहना है कि यह वर्ष भर का सबसे पवित्र कार्य माना जाता है । तर्पण तिल,जल और कुश से किया जाता है। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितृ को पिंडदान करने वाला हर व्यक्ति दीर्घायु, पुत्र पौत्राद,यश स्वर्ग, लक्ष्मी, सुख-साधन और धन-धान्य को प्राप्त करता है।

जिस तिथि को निधन, उसी तिथि को करें श्राद्ध

पंडिताें के अनुसार जिस तिथि को पिता, माता या दोनों का निधन हुआ है, पितृपक्ष में उसी तिथि को श्राद्ध करना चाहिए। इस दौरान पूर्वज अपने परिजनों के समीप विभिन्न रूपों में आते हैं और मोक्ष की कामना करते हैं तथा परिजन से संतुष्ट होने पर पूर्वज आशीर्वाद देते हैं। अति व्यस्तता के कारण यदि कोई श्राद्ध करने से वंचित रहा जाता है,तो वह व्यक्ति पितृ विसर्जनीय अमावस्या को अपने पितरों के प्रति तर्पण कर सकता है। उस दिन सुबह स्नान करन के बाद गायत्री मंत्र का जाप करते हुए सूर्य को जल चढ़ाना चाहिए। इसके बाद घर में बने भोजन में से पांच ग्रास निकाल लेना चाहिए। यह पांच ग्रास गाय,कुत्ता, कौवा,अतिथि और चींटियों के लिए निकालकर उन्हें खिलाया जाता है।

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