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महान नदियों की धारा भी 370 की तरह चलती रही...!

2 वर्ष पहले
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एक था कश्मीर। 370 वाला कश्मीर। ये कश्मीर इसलिए था कि हमारी महान नदियाँ रावी, चिनाब और झेलम यहाँ से गुज़रकर पाकिस्तान जा सकें। देश पानी की किल्लत भोगता रहा, पर इनकी धारा किसी ने नहीं मोड़ी। समझौतों पर समझौते होते गए। वर्षों बीत गए। हमारे पानी से पाकिस्तान सरसब्ज होता रहा। पढ़िए इन नदियों और इनकी धारा को...

पहले बात रावी की। रावी को ऋग्वेद में इरावती या परुष्णि कहा गया। इस पर गुलज़ार साहब ने एक किताब लिखी जिसका नाम है ‘रावी पार’। इसमें छोटी- छोटी कहानियाँ हैं विभाजन के आसपास की। मुख्य कहानी बहुत छोटी है। लिखने जाएँ तो दो - तीन लाइनों में समा जाए, लेकिन उतनी ही ज्यादा भावुक भी। जैसे - एक माँ अपने दो जुड़वाँ दुधमुँहे बच्चों के साथ हिंदुस्तान से पाकिस्तान जाने के लिए ट्रेन की छत पर बैठती है। मारे ठंड के एक बच्चा ठंडा हो जाता है। आसपास बैठे लोग कहते हैं - मुयी, इसे कहाँ ले जाएगी? यहीं ठंडा कर दे रावी में। वो माँ ऐसा ही करती है। पाकिस्तान जाकर उसे पता चलता है कि ज़िंदा बच्चा तो रावी में बहा आई और मरे हुए को छाती से चिपकाकर यहाँ चली आई...!

अब आते हैं चिनाब पर। ऋग्वेद में इसे असिक्नी या इस्कामती कहा गया। महाभारत में इसका जिक्र चंद्रभागा के रूप में है। चिनाब का भी विभाजन से गहरा नाता है। अमृता प्रीतम ने लाहौर से अमृतसर के अपने सफ़र में एक कविता लिखी - अज्ज आँखां वारिस शाह नूं, कित्थों क़ब्रां विच्चो बोल... हिंदी में कुछ ऐसी है -

‘आज वारिस शाह से कहती हूँ, अपनी कब्र में से बोलो,

इश्क़ की किताब का कोई नया पृष्ठ खोलो।

पंजाब की एक बेटी रोई थी, तुमने लंबी दास्तान लिखी,

आज लाखों बेटियाँ रो रही हैं, वारिस शाह तुमसे कह रही हैं।

उठ दर्दमंदों के दोस्त, उठ देख अपना पंजाब,

वन लाशों से अटे पड़े हैं, चिनाब लहू से भर गया है।’

विभाजन के वक्त लोग इस कविता को पढ़ते और जेल में ठूँस दिए जाते। जेल से निकलते। जेब में से कविता निकालते। पढ़ते। फिर जेल भेज दिए जाते!

अब आते हैं झेलम पर। सप्त सिंधु में से एक कही जानी वाली झेलम का ऋग्वेद में नाम है ‘वितस्ता’। 370 वाले कश्मीर में झेलम का नाम राजनीतिक रूप से काफ़ी प्रचलित हुआ। कहते हैं कांग्रेस की कश्मीर नीति हमेशा एक ही रही- ‘नेकी कर और झेलम में डाल’...। करोड़ों रुपए ख़र्च किए पर अब्दुल्ला परिवार से कभी इसका हिसाब नहीं माँगा। हिसाब - किताब देखने एक बार आयकर वाले श्रीनगर पहुँच गए थे। भाई लोगों ने उन्हें इस तरह घेरकर मारा जैसे चौके में घुस आए कुत्ते को मारते हों। यही वो परिवार है जिसके दबाव में धारा 370 के तहत कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया। अस्थाई था, लेकिन इसे लगभग स्थाई रूप ही दे दिया गया था। ऐसी भ्रांति बनाए रखी कि यह विशेष दर्जा हटाया तो कश्मीर ही देश से अलग हो जाएगा! सत्तर साल से बाक़ी देश इस असमानता को झेल रहा था। भाजपा ने 370 को शिथिल करने का ऐतिहासिक काम कर दिया लेकिन विडंबना देखिए कि कांग्रेस इस पर प्रतिक्रिया की तैयारी भी नहीं कर पायी। उसके कई बड़े नेता सरकार के क़दम के साथ हैं और कई विरोध में। ग़ुलाम नबी आज़ाद सरकार का भारी विरोध कर रहे हैं और उन्हें कोई रोकता-टोकता नहीं। सही है, भाजपा इसमें चुनावी राजनीति देख रही होगी, लेकिन कांग्रेस क्यों नहीं देखती? जब राजनीति ही करनी है और चुनाव ही अंतिम लक्ष्य है तो कांग्रेस को किसने रोक रखा है? हो सकता है विरोध में ग़ुलाम नबी के अपने हित होंगे, लेकिन पार्टी का हित कौन देखेगा? दस, जनपथ के खास कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य अब सरकार के क़दम को सही बता रहे हैं और ग़ुलाम नबी धमकी दे रहे हैं कि सरकार समर्थक कांग्रेसियों को कश्मीर और कांग्रेस पार्टी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। कहीं कोई एक स्वर नहीं है। जैसे पार्टी, पार्टी न रही, कबीलों में बँट चुकी हो!

नवनीत गुर्जर

नेशनल एडिटर, डीबी डिजिटल

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