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विनय ही धर्म का मूल

ब्यावर | प्रवृति शुभ भी होती है और अशुभ भी। सावद्य क्रियाओं से रहित, हिंसादि पापों से रहित है तो वह शुभ योग की...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 24, 2018, 03:35 AM IST

ब्यावर | प्रवृति शुभ भी होती है और अशुभ भी। सावद्य क्रियाओं से रहित, हिंसादि पापों से रहित है तो वह शुभ योग की प्रवृति कहलाती है। यह निवृति प्रधान होती है, ऐसी प्रवृति से पुण्यानुबंधी पुण्य का उपार्जन करता हुआ साधक पाप कर्मो की निर्जरा करता है। यह कहना था प्रवचन प्रभावक पदमचंद म.सा. का जो श्री अखिल भारतीय श्वेताम्बर स्थानकवासी जयमल जैन श्रावक संघ की ओर से चल रहे संस्कार शिविर में प्रवचन दे रहे थे। मुनि ने कहा कि अशुभ योग की प्रवृतियां केवल इन्द्रिय जनित व मनोजनित सुख ही दे सकती है। साधक का ध्येय होता है आत्मा का सुख। आत्मिक सुख अशुभ योग प्रवृति में नहीं, उसे तो चित्र का निरोध कर ही प्राप्त किया जा सकता है।

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