व्यक्ति की जैसी श्रद्धा रहेगी वैसा ही फल मिलेगा : चंचल कंवरजी

Beawar News - आचार्य रामेश की शिष्या शासन दीपिका चंचलजी म.सा. ने समता भवन में प्रवचन के दौरान कहा कि यदि हमें वीतरागी बनना है तो...

Oct 13, 2019, 07:20 AM IST
आचार्य रामेश की शिष्या शासन दीपिका चंचलजी म.सा. ने समता भवन में प्रवचन के दौरान कहा कि यदि हमें वीतरागी बनना है तो हमें अपने चार कषायों को त्यागना पड़ेगा। वह कषाय है राग-द्वेष, माया-लोभ।

हमने अपने जीवन को खूब कषाय करने में उलझाए रखा है। यह कषाय तन को सताते हैं मन को अशांत बनाते हैं। मन का सोचा हुआ नहीं होता तो क्रोध आ जाता है व धारा हुआ पूरा हो जाता है तो अभिमान आ जाता है। मन में भावना उत्पन्न होती है तो ये चारकषाय हर समय पीछे लगे रहते हैं। हम अभी भी लोभ, मान, माया से जकड़े हुए हैं। अब हमारे भीतर यह भाव बनाएं कि अंतर की चेतना जाग्रत हो तभी हम कषायों से बच पाएंगे। उन्होंनेे कहा कि जब भगवान महावीर की आंखों से आंसू बहने बहने लगे तो लोगों ने पूछा आपने इतना कष्ट सहन करने पर भी आंसू नहीं आए तो अब क्यों आ रहे हैं? इस पर भगवान महावीर ने बताया कि जिसने मेरे कानों में कीलें ठोकी उसको कितना कष्ट सहना करना पड़ेगा। यह सोचकर आ रहे हैं। हमें सभी कषायों को छोड़कर कर वीतरागी बनना है। आचार्य नानेश शताब्दी महोत्सव के दौरान आचार्य नानेश के बारे में कहा कि उनकी श्रद्धा अटूट थी। उनके प्रति श्रद्धा रखनी मतलब भगवान के प्रति रखने के समान है। नोखा मंडी में वर्षावास का अनूठा ठाठ लग रहा है। वहां के श्रावक जीवराज ने विनती की कि आचार्य उनके घर पधारे जहां उनकी माताजी वर्षों से बीमारी की वजह से चल-फिर व देख नहीं सकती। तब आचार्य नानेश ने उनके घर जाकर मांगलिक के साथ कई प्रत्याख्यान दिलाए व उसी पल से बीमार माताजी को धीरे-धीरे नजर आने के साथ वह चलने भी लगी। यह सब श्रद्धा के कारण हुआ। हम जैसी श्रद्धा रखेंगे वैसा ही फल पाएंगे। साध्वी उमंग श्रीजी ने कहा कि जो लोग नवपद मन, वचन, काया से कर लेते हैं तो उनको मन वांछित फल मिलता है। देव गुरु की आराधना के साथ सुपात्रदान करने पर आत्मा सफल हो जाती है।

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