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हमने झेला बाल मन पर विवाह का बोझ, कोई और न झेले

बाल विवाह कानूनन ही नहीं बल्कि सामाजिक अपराध भी है। इसकी वजह से जहां बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है, वहीं उनके...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 06:45 AM IST

हमने झेला बाल मन पर विवाह का बोझ, कोई और न झेले
बाल विवाह कानूनन ही नहीं बल्कि सामाजिक अपराध भी है। इसकी वजह से जहां बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है, वहीं उनके स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसकी गंभीरता इससे भी पता चलती है कि महिला एवं बाल विकास मंत्री अनीता भदेल ने इसे रुकवाने के लिए जनप्रतिनिधियों को 74 हजार पत्र लिखे हैं। धौलपुर के साथ-साथ भरतपुर में भी बाल विवाहों के कई मामले हर साल सामने आते हैं। भरतपुर में पिछले साल 13 बाल विवाह प्रशासन द्वारा रुकवाए गए। दैनिक भास्कर ने उन लोगों को तलाशा जिनके कभी बाल विवाह हुए थे। उनकी आप बीती पहली बार आप भी जानिए...

कम उम्र में मां बनी, पहले बच्चे की हुई मौत

ओमप्रकाश परमार ने बताया कि बाल विवाह के बाद हम दोनों नासमझ थे। ऐसे में हम जब शैतानियां करते थे तो प|ी मां से शिकायत करती थी और जब मुझे डांट पड़ती तो वह खुश होती थी। ओमप्रकाश का कहना है कि बाल विवाह होने से उन दोनों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। जिसमें सबसे ज्यादा प|ी कलावती को दिक्कतें हुई। प|ी का शारीरिक विकास नहीं हो पाया। इसके कारण हमारे पहले बच्चे की मौत हो गई।

15 दिन भी नहीं जी सकीं जुड़वां बेटियां

धूलकोट निवासी लक्ष्मीदेवी प|ी स्व.रामचरण की शादी 12 साल की उम्र में हो गई थी। वे बताती है कि जब शादी हुई तब साड़ी भी ठीक से पहनना नहीं आता था। कम उम्र में दो जुड़वा बेटियों की मां बनी, लेकिन दोनों का शरीर विकसित नहीं होने से वे 15 दिन भी नहीं जी सकीं। इसके बाद एक बेटा हुआ तो वह भी एक महीने में ही मर गया। उन्होंने कहा कि बाल विवाह होने के बाद बच्चों को शिक्षित करना एक चुनौती है। इसी कारण उनकी 3 बेटियों अशिक्षित हैं। लक्ष्मीदेवी ने बताया कि उनके 6 बेटियां और 6 बेटे हुए थे। इनमें दो बेटियां और दो बेटे शुरू में ही मर गए थे।

पढ़ाई छूूूटने से नहीं मिली अच्छी नौकरी

तोर गांव निवासी श्रीभगवान त्यागी की शादी 1996 में तब हुई, जब वे करीब 16 वर्ष की उम्र के थे। वहीं उनकी प|ी रीता त्यागी की उम्र 14 वर्ष के करीब थी। श्रीभगवान कहते है कि कम उम्र में शादी हुई तो शादी के बाद पढ़ाई छूट गई। इसके बाद कहीं भी नौकरी के लिए जाते थे तो अच्छी जॉब के लिए ग्रेजुएशन मांगते थे। इसके बाद जब समझ आई तो लगा कि अगर कम उम्र में शादी न होती तो शायद वह भी अच्छी शिक्षा ग्रहण कर अच्छी नौकरी पा सकते थे।

मतलब भी नहीं पता था तब हो गई शादी

महदपुरा की शारदा देवी प|ी स्व.मूलचंद की शादी भी 12 साल की उम्र में उस समय हुई, जब वे भी शादी का मतलब ठीक से नहीं समझती थी। शारदा देवी ने बताया कि कम उम्र जब उनकी शादी हुई तो तब तक उन्हें शिक्षा के बारे में नहीं ज्यादा नहीं पता था, लेकिन जब समझदारी आई तो अहसास हुआ कि पढ़ा लिखा होना कितना जरूरी है। इसके बाद यह ठान लिया कि वह अपने बच्चों को पूरी शिक्षा दिलाएंगी और उनकी शादी भी बालिग होने पर ही करेंगी। शारदा देवी ने बताया कि उनके 8 बच्चे हैं, 6 बच्चों की शादी बालिग होने के बाद ही की। एक बेटा और एक बेटी अभी भी पढ़ाई कर रहे हैं।

अब तो बंद करो बच्चों के जीवन से खिलवाड़

अक्षय तृतीया (आखातीज)। यानी फिर बाल विवाह के रूप में बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़। जरा ठंडे दिमाग से सोचिए। दो अपरिपक्व (नासमझ) बच्चे। जो आपस एक-दूसरे को पहचानते भी नहीं। शादी की जिम्मेदारियां क्या होती हैं, ये जानते भी नहीं। जब खेलने-कूदने,पढ़ने की उम्र और जिंदगी में तरक्की के असंख्य अवसर होते हैं। तब हम उन्हें हमेशा के लिए शादी के बंधन में बांध देते हैं। सिर्फ अपने थोड़े से स्वार्थ के कारण। इसलिए कि हमारे सिर से बेटी को बोझ उतर जाएगा। एक साथ दो-तीन बच्चों की शादी करने से चंद पैसे बच जाएंगे। लेकिन क्या कभी सोचा है कि फसल को पकने पर ही क्यों काटते हैं। उससे पहले क्यों नहीं। कच्ची फसल को काटने के क्या नुकसान और फायदे हैं ग्रामीण क्षेत्र का किसान तो कम से कम यह बात अच्छी तरह से समझता है। फिर इतनी सी बात हमारे समझ में क्यों नहीं आती। कभी डॉक्टर से बात करके तो देखिए। कम उम्र में शादी करने से बच्चियों पर क्या-क्या शारीरिक और मानसिक दुष्प्रभाव पड़ता है। उनके अंगों का ठीक से विकास नहीं हो पाता। उनकी होने वाली संतान विकृत होने की आशंका रहती है। आगे की पीढिय़ां खराब हो सकती हैं। डिलीवरी के समय मां- बच्चे की जिंदगी खतरे में रहती है। मानसिक दबाव इतना बढ़ जाता है कि बात तलाक अथवा मृत्यु तक पहुंच जाती है। भारत में बाल विवाह जैसी कुरीति आज से नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही है। लेकिन, तब लोगों की मजबूरियां थीं। क्योंकि विदेशी आक्रांताओं और मुगलों का शासन था। वे हमारी छोटी-छोटी बच्चियों पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार करते थे। फूल सी बच्चियां वहशी दरिंदों के हवाले करने के लिए मां-बाप को मजबूर कर दिया जाता था। इसी से बचने के लिए बाल विवाह होने लगे। लेकिन, तब भी राजा राम मोहन राय और केशवचंद्र सेन सरीखे महापुरुषों ने इस कुरीति का इतना विरोध किया कि अंग्रेज शासकों से इसके लिए कानून तक बनवा लिया था। कानून तो अब भी हैं, लेकिन हम उन्हें मानने को तैयार नहीं है। एक सभ्य समाज के नाते अपने लिए न सही, अपने मासूम बच्चों की खातिर। आज संकल्प ले ही लीजिए। न तो हम बाल विवाह करेंगे और न ही आसपास कहीं होने देंगे।

भास्कर विचार

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Web Title: हमने झेला बाल मन पर विवाह का बोझ, कोई और न झेले
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