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भगवान श्रीकृष्ण की पीतांबरी से भरतपुर रियासत ने अपनाया था पीला रंग, अब बन गया पहचान
ब्रज क्षेत्र यानि भगवान श्रीकृष्ण की जन्म और क्रीडा स्थली। भगवान श्रीकृष्ण हर समय हमारे रोम-रोम में बसे रहें, इसलिए भरतपुर रियासत ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाने के लिए उनकी पीतांबरी से पीला रंग लिया। चूंकि स्थापना भी बसंत पंचमी के दिन हुई इसलिए भरतपुर रियासत के ध्वज में अधिकांश पीला रंग और बार्डर आसमानी रखा गया। भरतपुर में सरसों का एरिया और तेल का कारोबार बड़े स्तर पर होने और बृज में टेसू के पीले फूलों के रंग से होली खेली जाती है, इसलिए भी हमारे लिए इस रंग का खास महत्व है। बल्कि यूं कहें कि यह रंग अब भरतपुर की पहचान बन गया है।
राजघराने के सदस्य काका रघुराजसिंह ने बताया कि ध्वज के उसके ऊपर खेडापति के रूप में हनुमानजी का फोटो लगता था। यह ध्वज किले पर रहता था, जबकि राजघराने के ध्वज दूसरे रंग का होता था। पीले रंग का भरतपुर रियायत में खास स्थान रखता है। क्योंकि बसंत पंचमी के दिन ही भरतपुर की स्थापना हुई। बसंत पंचमी पर पीले रंग का आभा मंडल होता है। इसलिए बसंत पंचमी के दिन लगने वाले दरबार में महाराजा पीले रंग का साफा पहनते थे। इसके अलावा दरबारी इस दिन पीले रंग की अचकन और पायजामा पहना जाता था।
हमारा पीला सोना सरसों, पैदावार और तेल में देश में अव्वल
सरसों तेल ने जिले को देश भर में पहचान दी है। समृद्धि का प्रतीक है। इसलिए यह हमारे लिए पीले सोने के समान है। सरसों उत्पादन में भरतपुर ने पिछले पांच साल में उत्तरोत्तर प्रगति की है। पांच साल में सरसों उत्पादन में हम सवा गुना हो गए हैं। इसलिए भरतपुर को सरसों की बेल्ट कहा जाता है। सरकार ने भी भरतपुर में राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केंद्र स्थापित किया है। सरसों में अब प्रति हैक्टेयर उत्पादन 20 क्विंटल तक उत्पादन हो गया है, जबकि पांच साल पहले का औसत 14 क्विंटल था। इसी प्रकार बुवाई भी 1.97 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 2.10 लाख हैक्टेयर हो गई है। इस साल करीब 17 अरब की फसल होने की संभावना है। इस कारण बिहार, बंगला, उड़ीसा, झारखंड, आसाम में भरतपुर के तेल की सप्लाई बढ़ी है।
सरसों रकबा उत्पादन
वर्ष क्षेत्र उत्पादन
2015 1.97 1391
2016 2.03 1531
2017 2.01 1939
2018 2.00 1921
2019 2.10 2000
नोट: क्षेत्र लाख हैक्टेयर में हैं तथा उत्पादन प्रति हैक्टेयर किलोग्राम में है।