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घना से परदेसी परिंदों की वतन वापसी शुरू, छोड़ गए मीठी यादें

3 वर्ष पहले
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भरतपुर। वतन के लिए उड़ान भरते ग्रेलेग गूज।

भास्कर संवाददाता| भरतपुर

भारत-पाकिस्तान सीमा पर बने तनावपूर्ण हालात के बीच फिल्म रिफ्यूजी में जावेद अख्तर की लिखे गीत की ये पंक्तियां.. पंछी, नदियां, पवन के झोंके, कोई सरहद इन्हें ना रोके, सरहदें तो इंसानों के लिए हैं। सोचो, क्या पाया तुमने और मैंने इंसान होके....इन दिनों केलवादेव नेशनल घना अभयारण्य में साकार होती दिखाई दे रही हैं। क्योंकि परेदसी परिंदों की वतन वापसी शुरू हो गई है। मुस्लिम देशों कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, मंगोलिया, ईरान, इराक, साइबेरिया और चीन से आने वाले ये पाकिस्तान में अल्प प्रवास करते हुए भरतपुर में आते हैं। यहां करीब 3-4 महीने तक स्थानीय पक्षियों के साथ सामंजस्य बिठाते हुए प्रवास करते हैं और जाते वक्त सैलानियों के लिए मीठी यादें छोड़ जाते हैं। खानपान और आवास को लेकर स्थानीय परिंदों के साथ इनका कभी कोई विवाद नहीं होता। इसलिए दशकों से प्रवास की परंपरा बनी हुई है। प्रवास नवंबर से फरवरी तक रहता है। यह क्रम मार्च तक चलेगा। घना अभयारण्य के सूत्र बताते हैं कि पिन टेल, ग्रे लेग गूज और पोचार्ड के अधिकांश समूह अपने देशों के लिए रवाना हो गए हैं। जबकि, कामन टील, गेड बाल, साबलर, कूट की रवानगी का क्रम जारी है। वारहेडेड गूज और ब्रह्मानी डक मार्च के अंतिम सप्ताह में जाएंगे। ज्ञात रहे कि केवलादेव घना में हर साल 10 से अधिक प्रजाति के परिंदे सर्दी के मौसम में प्रवास के लिए आते हैं। इस साल करीब 56 हजार की संख्या में ये परिंदे आए थे।

बर्फबारी से बचने के लिए करते हैं प्रवास

साइबेरिया और सेंट्रल एशिया क्षेत्र में सर्दी के मौसम में भारी बर्फबारी होती है। इससे वहां भोजन और आवास का संकट हो जाता है। ऐसे में परिदें केवलादेव घना सहित उत्तर भारत की झीलों में प्रवास के लिए आते हैं। अधिकांश शाकाहारी होते हैं। गर्मी को मौसम प्रारंभ होते ही मार्च में अपने वतन काे लौट जाते हैं। 4 से 6 हजार किलोमीटर के सफर के दौरान ये पक्षी पाकिस्तान में भी अल्प प्रवास करते हैं।

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