आठ फिरंगी नौ गोरा, लड़ें जाट के दो छोरा...

Bharatpur News - भरतपुर के लोगों में आजादी का स्वभाव जन्म से ही है। मुगलों के अत्याचारों से बगावत हो या 1805 में अंग्रेज सेना से युद्ध।...

Aug 15, 2019, 11:50 AM IST
भरतपुर के लोगों में आजादी का स्वभाव जन्म से ही है। मुगलों के अत्याचारों से बगावत हो या 1805 में अंग्रेज सेना से युद्ध। हर मैदान को भरतपुर ने जज्बे से जीता है। तत्कालीन गीतकारों ने इसे अपने शब्दों में भी ढाला। इस भूमि के कण-कण में शूरता, वीरता और पराक्रम को लेकर ब्रज भाषा के सुपरिचित कवि वियोगी हरि ने लिखा था...यही भरतपुर दुर्ग है, दुजय, दीह भयकार, जहैं जट्टन क छोहरे, दिए सुभट्ट पछार...। भरतपुर की मर्दानगी की कहानी अंग्रेजों को अच्छी तरह मालूम थी। वर्ष 1805 में जसवंत राव होलकर का पीछा करते हुए लार्ड लेक भरतपुर आया तो महाराजा रणजीतसिंह ने होलकर को सौंपने के बजाए युद्ध करना बेहतर समझा। शरणागत की रक्षा में हुए इस युद्ध ने भरतपुर को ख्याति दिलाई, क्योंकि इसमें अंग्रेज सेना को भारी हानि उठानी पड़ी थी। करीब दो महीने चले इस युद्ध में अंग्रेज सेना के 3 हजार 203 सैनिक मारे गए और करीब 8 हजार सैनिक घायल हुए थे। कर्नल निकलसन ने अपनी पुस्तक नेटिव स्टेट आफ इंडिया में लिखा है कि जो नीति भरतपुर के राजा ने अपनाई उससे उनको माली घाटा तो बहुत हुआ। लेकिन, जाटों को कीर्ति, प्रसिद्ध और गौरव मिला। इसीलिए राजपूताने में किवदंती मशहूर हुई थी...आठ फिरंगी नौ गौरा, लड़ें जाट के दो छोरा...। वर्ष 1940 के दशक में आजादी का आंदोलन जब चरम पर था उस समय भी कवियों और गीतकारों ने अपनी रचनाओं से लोगों के जनमानस को झिंझोड़ा और देश के लिए मर मिटने को प्रेरित किया। इनमें जन कवि गिरेंद्रसिंह गिरीश की रचना बहुत लोकप्रिय हुई थी, जिसे लोग बार-बार सुनना चाहते थे। इसके बोल थे...धन्य क्रांति के अग्रदूत, सिंहनाद उचारा है, दिल्ली चलो जयहिंद हमारा कौमी नारा है...। जब करो या मरो आंदोलन शुरू हुआ तो उन्होंने लिखा...अब नौजवान हिंद को आजाद बनाओ, कब तक रहोगे गुलाम यह बताओ, कहती है शहीदों की रूह भूल न जाना, जालिम को उसके जुल्म का कुछ फल तो चखाओ, धिक्कार नौजवान तुमको, तुम्हारा वतन गुलाम, किस काम फिर आएगी जवानी यह तो बताओ...। कुम्हेर के नानक चंद ने सरदार भगतसिंह की शहादत पर लिखा सतजल की पार पै रोबे भगतसिंह तेरी बहन...। जिसे सुनकर श्रोताओं की अश्रुधारा बह उठती थी। प्रजा परिषद से जुड़े प्रेमशंकर के दो गीत देशभक्ति की ज्वाला को दहकाते थे। उनका लिखा गीत..सर बांध कफनियां हो शहीदों की टोली निकली....। इस गीत को जब वे गाते थे तो युवाओं की भुजाएं फड़कने लगती थी। भारत छोड़ो आंदोलन के दिनों में उन्होंने लिखा कुछ करो या मरो आज, यह बापू का आदेश मिला, भारत छोड़ो के नारों से पल भर में ब्रह्मांड हिला..। स्वतंत्रता सेनानी मुंशी आले मोहम्मद आजाद हिंद की शाखाओं में गाया करते थे कि...आजाद हिंद का तू फरतरा उड़ाए जा, हिंदोस्तां के नाम का डंका बजाए जा, हिंदू जो शीर हो तो मुसलमान हो शकर, आपस में इत्तफाक का रिश्ता बढ़ाए जा, गुलामी और रूसबाईयों से भर चुकी तारीख, इज्जत के चार चांद तू इसमें लगाए जा, भारत से अब उठा लो बिस्तर भारत वर्ष हमारा है, ऋषियों की इस पुण्यभूमि पर क्या अधिकार तुम्हारा है...।

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