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एक फैसले से बर्बाद होती जमीन और जिंदगी, 2200 बीघा भूमि अवाप्त, न पट्टे मिले न ही फसल हो सकी

एक वर्ष पहले
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नरेंद्रसिंह (बदला हुआ नाम) की कहानी बड़ी दर्द भरी है। वह कैंसर जैसे गंभीर रोग से पीड़ित है। लेकिन, इलाज नहीं करवा पा रहा है। क्योंकि उसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं है। जमीन तो है, लेकिन उसे बेच नहीं सकते। क्योंकि उस पर नगर विकास न्यास का कब्जा है। इस जमीन को सेक्टर-13 आवासीय योजना के लिए अधिग्रहित किया गया है। लेकिन, उसके बदले में पट्टा अभी तक नहीं मिला है। इस तरह बीते 6 साल में वह किसान से मजदूर बन गया है।

ऐसे ये अकेले किसान नहीं हैं, बल्कि अनाह, श्रीनगर, झीलरा, तेरहियां, रामपुरा, माढौनी, चक नंबर एक समेत कई गांवों के करीब 700 किसान अलग-अलग तरह की परेशानियों से गुजर रहे हैं। इन किसानों की करीब 2200 बीघा जमीन यूआईटी ने अधिग्रहित की है। इसमें से कुछ पर कोर्ट स्टे है। लगभग 2 हजार बीघा से ज्यादा जमीन पर यूआईटी ने 3 सितंबर 2014 को कब्जा ले लिया। इसके बदले में किसानों को 25 प्रतिशत भूमि दी जानी थी, किंतु अभी तक ज्यादातर किसानों को पट्टे नहीं मिले हैं और आवासीय प्लान भी लागू नहीं हुआ है। उनींदे से अफसर बिना किसी की परवाह के निर्णय ले रहे हैं। मसलन, 2 अक्टूबर 2018 में स्कीम बिना सोचे-समझे लांच कर दी गई और 8 महीने बाद निरस्त भी। क्योंकि नेशनल बोर्ड आफ वाइल्ड लाइफ से एनओसी नहीं मिली थी। करीब 8200 आवेदक अब अपने पैसे लिए भटक रहे हैं। उन्हें सिर्फ अमानत राशि लौटाई जा रही है। रजिस्ट्रेशन और फार्म शुल्क की राशि करीब 1500 रुपए जब्त कर ली है, जबकि दोष यूआईटी का है। कुछ ऐसा ही धोखा किसानों के साथ भी हो रहा है। किसानों को मुआवजा भी नहीं मिला और खेती भी नहीं कर पा रहे। अगर 2000 बीघा में भी किसान खेती करते तो उन्हें इन 6 सालों में करीब 24 करोड़ रुपए की उपज से वंचित होना पड़ा है। कृषि विभाग का मानना है कि अगर दो फसल भी लें तो करीब 20 हजार रुपए सालाना उपज हो जाती है। एक बीघा में सरसों से करीब 12 हजार और बाजरे में करीब 8 हजार रुपए की उपज हो जाती है।

भास्कर ने जाना किसानों का दर्द...

टालनी पड़ी बहन की शादी

गांव श्रीनगर के उम्मेदसिंह की 12 बीघा जमीन यूआईटी ने एक्वायर की, लेकिन पट्टा नहीं दिया। आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है। अब बहन की शादी टालनी पड़ी है। पहले जनवरी में शादी तय थी। लेकिन यूआईटी से पट्टा नहीं मिला। सोच रहा था कुछ जमीन बेच देंगे। लेकिन हाथ में कुछ नहीं है। इसलिए शादी की नई डेट निकलवा कर रिश्तेदारों से मदद लेंगे।

बड़ी बाधा... एनबीवीएल से मिलनी है मंजूरी, कब मिलेगी पता नहीं

{सेक्टर-13 में 6 साल बाद भी किसानों को पट्टे क्यों नहीं मिले हैं।

- अधिकांश को आरक्षण पत्र दे दिए गए हैं। कुछ को पट्टे भी दिए हैं। शेष को भी देने की प्रक्रिया में है।

{किसान अपनी ही जमीन पर खेती नहीं कर पा रहे हैं।

- अधिगृहीत जमीन पर कोई कैसे खेती कर सकता है। मुआवजे के तौर पर विकसित जमीन देंगे।

{इस लेटलतीफी के लिए कौन जिम्मेदार है।

- सभी प्रयास कर रहे हैं। नेशनल बोर्ड आफ वाइल्ड लाइफ से मंजूरी मिलते ही सब ठीक को जाएगा। मंजूरी जल्द मिलने की उम्मीद है।

{बिना सोचे-समझे आवेदन मांगे और अब सिर्फ अमानत राशि ही लौटा रहे हैं।

- मेरे आने से पहले यह स्कीम लांच हुई थी। तत्कालीन कलेक्टर और यूआईटी अध्यक्ष ने लॉटरी निरस्त की थी। इस पर मैं कुछ नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में आवेदक को अमानत राशि ही लौटाने का प्रावधान है।

ऐतिहासिक सफलता के 23 वर्ष

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3600 भूखंडों का ड्रीम प्रोजेक्ट, जो अब सपने जैसा: यूआईटी ने आगरा-जयपुर हाईवे पर 10 साल पहले संभाग की सबसे बड़ी आवासीय कॉलोनी विकसित करने का प्लान बनाया। ताकि शहर की आवासीय आवश्यकता अगले 15 से 20 साल तक के लिए समाप्त हो जाए। इसलिए यह शहर का सबसे बड़ा ड्रीम प्रोजेक्ट था। लेकिन अधिकारियों की उदासीनता के कारण सपने जैसा होता जा रहा है। वर्ष 2011 को यूआईटी ने अवार्ड जारी किया। 3 सितंबर 2014 को 2200 बीघा भूमि अधिगृहीत की। करीब 5 करोड़ से 7 किमी लंबी अप्रोच रोड बनाई जा चुकी है। यह कॉलोनी मलाह मोड से सेवर रोड तक का दाएं क्षेत्र, सेवर रोड से हीरादास और काली की बगीची तिराहे तक का अंदरूनी हिस्सा शामिल है।

 
उम्मेदीलाल मीणा, यूआईटी सचिव**

आरक्षण पत्र मिला, पट्टा नहीं

बरसों का नगला निवासी रामभरोसी की चार बीघा जमीन नगर विकास न्यास ने अधिग्रहित की है। मंगल सिंह कहते हैं कि पहले जमीन के मालिक थे और खेती कर लेते थे। लेकिन अब तो मजदूर बन कर गए हैं। पट्टा मिल जाता तो कुछ खुद के लिए रख लेते और कुछ बेचकर मकान बना लेते। साथ ही जरूरी काम कर लेते। लेकिन कब पट्टे मिलेंगे। कोई कुछ बताता भी नहीं है।

बच्चों की पढ़ाई प्रभावित

किशोरी लाल कहते हैं कि हमारे भी सपने थे कि बच्चों को अच्छे से पढ़ाएं। लेकिन, 11 बीघा जमीन यूआईटी ने कब्जे में ले रखी है। ना तो खेती कर पा रहे हैं और ना ही पट्टा मिला। ऐसे में किसान से मजदूर हो गए हैं। बच्चों को कोटा और जयपुर पढ़ाने की इच्छा दफन हो गई है। अब तो जैसे-तैसे गुजर-बसर करनी पड़ रही है। लेकिन अधिकारियों को कोई फ्रिक नहीं है।

आवेदन लेने के 8 महीने बाद 2 अक्टूबर 2018 को रद्द की थी आवासीय योजना, 8200 आवेदकों को नहीं लौटाए रजिस्ट्रेशन फार्म के 1500 रुपए

भास्कर
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