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हिन्दी पुस्तकालय में हुई काव्य गोष्ठी, कवियों ने होली के परिदृश्य में बिखेरा सामाजिक रंग

एक वर्ष पहले
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हिन्दी पुस्तकालय समिति सभागार में वरिष्ठ साहित्यकार दाऊदयाल बेधड़क की अध्यक्षता में आयोजित हुई काव्य गोष्ठी में कवियों ने ब्रजभाषा के साथ होली के परिदृश्य में सामाजिक रंग बिखेरा। काव्य गोष्ठी का शुभारंभ गिर्राज मधुर की सरस्वती वन्दना ‘मां शारदे वर दीजिए हम पर कृपा निज कीजिए‘ से हुआ। कवि प्रकाश चन्द पाराशर ने ‘कहा भयौ इन लोगन कूं सब प्रीति बिसार भए बजमारे‘ चन्द्रभान चंचल ने ‘है आज ब्रज में होली आई रसियन की टोली‘ अनिल अगन ने ‘गालन लाल गुलाल मलौ‘ सुनील सरल ने ‘नांय रहयौ अब नेह भरौ रंग, नांय रहे अब बे हुरियारे‘ सुनाकर मानव के दौहरे चरित्र पर प्रकाश डाला। राजेन्द्र गुर्जर ने ‘प्रीति घटी मन दूर भयौ‘ गोविन्द गग्गा ने ‘घोर रहे रस में विष वे बस‘ कवि मनोज मनु ने ‘हाथ कमोरी पिचकारा गल बैजंती माल, मोहन होरी खेलते देखौ उडत गुलाल‘ सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। व्यंगकार सुरेन्द्र सार्थक ने ‘हरितिमा का जो उपदेश देते हंै, अंधेरांे में दरख्तांे को काट देते हंै‘ सुनाकर एक संदेश दिया। कार्यक्रम का संचालन सहित्यकार मनोज मनु के साथ आभार समिति सभापति मानसिंह यादव ने किया।

डीग. काव्य पाठ करते कवि।
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