सक्सेना ने सांप्रदायिकता पर फरिश्ता, उसका मरना, देश बदल रहा है कहानियां भी लिखी हैं

Bharatpur News - आपने कहानी कार सदा अत हसन मंटो का नाम तो सुना ही होगा। उन्होंने 1947 में हुए बंटवारे को लेकर टोबा टेकसिंह कहानी लिखी।...

Bhaskar News Network

Aug 15, 2019, 11:55 AM IST
Bharatpur News - rajasthan news saxena has also written stories of an angel on communalism her dying changing the country
आपने कहानी कार सदा अत हसन मंटो का नाम तो सुना ही होगा। उन्होंने 1947 में हुए बंटवारे को लेकर टोबा टेकसिंह कहानी लिखी। जो काफी सराही गई। कुछ ऐसा ही दर्द भरतपुर के लेखक अशोक सक्सेना की कहानी अब्बू में है। आजादी के बाद बंटवारे के दर्द को भरतपुर के कहानीकार अशोक सक्सेना ने अपनी कहानी अब्बू के जरिए बखूबी बयां किया है। इस कहानी में महसूस किया जा सकता है कि सांप्रदायिकता की आग से दोस्ती के रिश्ते कैसे झुलसते हैं। इसका प्लाट दिल्ली के चांदनी चौक की गली बता शान का है। जहां बहुत सारे परिवारों के बीच दो परिवारों में भाईचारे का जज्बाती रिश्ता है। दोनों अलग धर्म से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन इंसानियत खान साहब और मास्टर राधाकिशन के बीच रग-रग में बसी है। खान साहब बड़े कारोबारी हैं, गलीचे बनाने के कारखाने हैं। दो बेटे हैं एक म्युजिक में रुचि रखता है और दूसरा बिजनेस में। इधर, मास्टर राधाकिशन भी हरमोनियम बजाने में माहिर है, लेकिन रोजी-रोटी के लिए ट्रक ड्राइवरी करते हैं। खासकर ढाका के रूट पर चलते हैं। दोनों परिवारों में अमीरी-गरीबी की गहरी खाई होने के बाद भी मोहल्लाई प्रेम की गांठ इतनी मजबूत है कि खान साहब वक्त जरूरत पर राधाकिशन की मदद करते रहते हैं। सब कुछ सामान्य चल रहा होता है तभी देश के बंटवारे की खबर से दोनों परिवार सहम जाते हैं, क्योंकि दंगाई सक्रिय हो गए थे। लूटपाट और मारकाट का शोर फिज़ां में नफरत घोल रहा था। हरदम और हमदम रहने वाले गली बता शान के लोग एक-दूसरे को शक की निगाह से देखने लगते हैं। खान साहब के दोनों बेटे पाकिस्तान जाने का निर्णय करते हैं। खान साहब को भी साथ चलने के लिए कहते हैं। लेकिन वे कहते हैं ये मेरा वतन है, यहां की आबोहवा में पला-बढ़ा हूं। ये सब मेरे अपने लोग हैं। आधे से ज्यादा मेरे सामने पले-बढ़े हैं। सब मुझे खान चाचा कहते हैं। कोई कुछ नहीं कहेगा। इस हवेली और मोहल्ले में मेरी रूह बसती है। मैं कहीं नहीं जाऊंगा। हार कर खान साहब की बीबी अपने दोनों बेटों और बहू-बच्चों के साथ पाकिस्तान चली जाती है। बंटवारे के दंगों की धधक एक दिन गली बता शान तक पहुंच ही जाती है। दंगाई खान साहब की हवेली और कारखाने पर हमला करते हैं। आग लगा देते हैं। लूटपाट करते हैं। खान साहब के साथ मारपीट करते हैं। इसमें उनका चश्मा टूट जाता है। पता चलने पर फौरन मास्टर राधाकिशन पहुंचते हैं और खान साहब को बचाकर घर ले आते हैं। कहते हैं कि वो घर भी आपका है। वहां महफूज रहेंगे। घर पहुंच कर खान साहब थोड़ा सुकून महसूस करते हैं। लेकिन, एक आवाज और धुंधली तस्वीर उन्हें बेचैन कर देती है। वे राधाकिशन की बीबी से चश्मा ठीक करा कर लाने की बात कहकर घर से निकलते हैं और कभी वापस नहीं लौटते। खान साहब का उसके बाद कोई अता-पता नहीं चलता। दरअसल, वह आवाज और धुंधली तस्वीर जो उन्होंने पहचानी थी वह ऐसे युवक की थी, जिसे उन्होंने गोद में खिलाया था। लेकिन नफरत की आंधी में वह दंगाइयों में शामिल हो गया था और यह राधाकिशन का बड़ा बेटा था। लेखक अशोक सक्सेना कहते हैं कि इस कहानी के जरिए मैंने बताने की कोशिश की है कि सांप्रदायिक सौहार्द जब बिगड़ता है तो कैसे इंसानियत के रिश्ते तार-तार हो जाते हैं। यह कहानी वर्ष 2012 में हंस में प्रकाशित हुई थी। इसे कहानी संग्रह अब्बू में पढ़ा जा सकता हैं। इसके अलावा उन्होंने सांप्रदायिकता पर फरिश्ता, उसका मरना, देश बदल रहा है और बिल्लू चुप है.... कहानी लिखीं हैं, जो कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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