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बेटे की मौत को लेकर 70 वर्षीय लौहरी शिकायत करती रही, पुलिस बार-बार एफआर लगाती रही

2 वर्ष पहले
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मंडी अटल बंध निवासी 27 वर्षीया मधु को ससुराल वालों ने करीब साढ़े 3 साल पहले मारपीट कर घर से निकाल दिया था। मधु का आरोप है कि ससुराल वाले उससे दहेज तो मांग ही रहे थे, लेकिन, उन्होंने उसे बांझ होने का आरोप लगाया। यह कोई साधारण आरोप नहीं, बल्कि ऐसा आरोप लगाकर उन्होंने एक महिला के स्वाभिमान को ललकारा है। इसलिए ऐसे लोगों को सजा दिलाना ही मकसद है। मधु के संघर्ष के कहानी कुछ इस तरह है कि 17 जनवरी, 2010 को उसका विवाह अलवर के ऋषि से हुआ था। दहेज की मांग पूरी नहीं करने पर ससुराल वालों ने उसे मारा-पीटा और बांझ बताकर अगस्त, 2015 में घर से निकाल दिया। इस अन्याय के खिलाफ गुहार लेकर वह पुलिस में गई, लेकिन वहां उसकी एफआईआर तक नहीं लिखी गई। मजबूरन कोर्ट में इस्तगासा किया। कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने उसकी जांच तो की, लेकिन जांच अधिकारी ने फर्जी राजीनामा दिखाकर एफआर लगा दी। इस आधार पर निचली अदालत ने उसके केस को खारिज कर दिया। लेकिन, यहां हार नहीं मानी। मधु ने निचली अदालत के आदेश को एडीजे (महिला उत्पीड़न) कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने पुलिस द्वारा फर्जी राजीनामा दिखाने की उसकी बात को सही माना। निचली अदालत का आदेश निरस्त करते हुए जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए नोटिस जारी करने के आदेश भी दिए। मामला फिर से सुनवाई के लिए निचली अदालत में भेज दिया गया। लेकिन, न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने फिर से अपना पुराना आदेश यथावत रखते हुए 3 नवंबर 2017 को उसकी शिकायत खारिज कर दी। मधु ने फिर निचली अदालत के आदेश को एडीजे में चुनौती दी। कोर्ट ने मुल्जिमों और थाने का रिकॉर्ड 15 मार्च को तलब किया है।

निचली अदालत भी सही मान चुकी है आरोप, अब बोली- मुल्जिमों को सजा दिलाकर ही रहूंगी

भास्कर संवाददाता | भरतपुर

वैर तहसील के गांव सीता निवासी 70 वर्षीय लौहरी देवी अनपढ़ होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से कमजोर भी है। उसे लगता है कि उसके बेटे घनश्याम की 6 साल पहले एक्सीडेंट से मौत नहीं हुई थी, बल्कि साजिशन हत्या की गई थी। इसी बात को लेकर वह बार-बार पुलिस में शिकायत करती रही। लेकिन, पुलिस है कि उसकी बात मानती ही नहीं। तभी तो एक आरपीएस ऑफिसर और 4 थाना प्रभारियों ने एफआर लगाकर हर बार उसकी शिकायत बंद कर दी। भला, लौहरी भी कहां हार मानने वाली थी, सो कोर्ट में इस्तगासा किया। मजिस्ट्रेट ने बयान दर्ज किए, तर्क सुने और साक्ष्य देखी तो लौहरी देवी के आरोपों को सही माना। यहां तक कि मुल्जिमों को गिरफ्तारी वारंट से तलब भी कर लिया था। लेकिन, लौहरी देवी को उस वक्त फिर निराशा हाथ लगी जब एडीजे कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश पलट दिया। लौहरी ने हार नहीं मानी, वह अपने केस को हाईकोर्ट तक ले गई। पिछले 6 साल से लौहरी इसी तरह बेटे की मौत के जिम्मेदारों को सजा दिलाने के लिए इस लड़ाई को लड़ रही है। वह कहती हैं कि मैं अपने बेटे के हत्यारों को सजा दिलाकर ही रहूंगी, भले ही आखिरी सांस तक भी लड़ना पड़े। वह अन्य लोगों के इन आरोपों को भी गलत बताती हैं कि शादी में नहीं बुलाए जाने से नाराज होकर वह मुल्जिमों को संगीन केस में फंसाना चाहती है।

कम पढ़ी लिखी एवं आर्थिक रूप से कमजोर दो महिलाओं के साहस और स्वाभिमान की कहानी
इसलिए है हत्या का शक
लौहरी के मुताबिक बेटे घनश्याम को 30 सितंबर, 2013 को नामजद 13 मुल्जिम दिल्ली में काम दिलवाने के लिए अपने साथ ले गए थे। लेकिन, एक माह बाद यानि 30 अक्टूबर,2013 को उसका शव लेकर गांव लौटे। परिजनों को बिना बताए और विरोध के बाद भी उसका दाह संस्कार कर दिया। दाह-संस्कार से पहले बेटे का मुंह तक नहीं दिखाया। पुलिस ने कोर्ट में इसे एक्सीडेंट बताया।

दहेज नहीं मिला तो बांझ बता घर से निकाला, फर्जी समझौता पेश किया, मधु ने बनाया स्वाभिमान का मुद्दा
एक्सपर्ट व्यू
अधिवक्ता उदयवीर सिंह कहते हैं कि संविधान ने सुरक्षा और सम्मान के लिए कानून बनाए हैं। उन्हें जानने, समझने और संघर्ष करने की जरूरत है। लौहरी और मधु के प्रकरण भी ऐसे ही हैं। दोनों महिलाएं अल्प शिक्षित और आर्थिक रूप से पिछड़ी होने के बाद भी सम्मान की लड़ाई लड़ रही हैं।

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