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हजारों साल पुरानी खेडा सभ्यता के रहस्यों से पुरातत्व विभाग 150 साल बाद भी नहीं उठा पाया पर्दा

Bharatpur News - टोंक जिले का मिनी पुष्कर कहे जाने वाले नगरफोर्ट क्षेत्र में हजारों साल से आज भी धरती के गर्भ में दफन है प्राचीन एक...

Jan 24, 2020, 09:46 AM IST
Nagar News - rajasthan news the archeology department could not lift the curtain from the secrets of thousands of years old kheda civilization even after 150 years
टोंक जिले का मिनी पुष्कर कहे जाने वाले नगरफोर्ट क्षेत्र में हजारों साल से आज भी धरती के गर्भ में दफन है प्राचीन एक अमीर शहर। जहां सोने-चांदी के सिक्के मिलने के साथ ही कई प्राचीन अवशेष कई बार प्राप्त हो चुके हैं। लेकिन 150 साल बाद भी पुरातत्व विभाग नहीं खोज पाया, प्राचीन शहर का रहस्य। जिसे कई शोधकर्ता सिंधु घाटी सभ्यता से पहले का भी बताते हैं। इसकी सर्वप्रथम खोज ब्रिटिश काल के पुरातत्व विशेषज्ञ कार्लाइल ने 1871-72 में की थी। लेकिन उसके बाद से अब तक इस सभ्यता के कई रहस्य आज तक भी रहस्य ही बने हुए हैं। पुरातत्व विभाग ने कार्लाइल की रिपोर्ट के आधार पर 2008-09 में खुदाई की थी, खुदाई में ईंटों की दीवार एवं कई अवशेष मिले। लेकिन उसके बाद से ही पुरातत्व विभाग ने वहां पर एक कर्मचारी तैनात करके, सभी रहस्यों को रहस्य ही बना छोड़ दिया। मान्यताओं के अनुसार यहां पर राजा मुचुकुंद का राज रहा, आज भी वहां प्राचीन मंदिर मौजूद है।

पुरातत्व विभाग ने कार्लाइल की रिपोर्ट को आधार मानते हुए खेडा सभ्यता को उजागर करने के लिए 1942, 1950 में खुदाई करवाई। उसके बाद 2008-09 में भी खुदाई कराई गई। इसके तहत सिक्के, आभूषण सहित कई अवशेष मिले तथा क्षेत्र को चिह्नित कर तारबंदी भी कराई गई। यहां पर एक चौकीदार नियुक्त कर इतिश्री कर ली गई।

खेडा सभ्यता का वो क्षेत्र जहां मिट्टी के टीलों के नीचे आज भी दफन है एक प्राचीन शहर

खुदाई आदि में निकली ईंटों से लोगों ने बना लिए घर, प्राचीनकाल में यहां टकसाल के भी संकेत

जानकार कहते हैं कि लोगों ने सभ्यता की खुदाई आदि में निकली ईंटों आदि से अपने घर एवं मंदिर आदि भी बना लिए। यहां पर खुदाई में सोने, चांदी एवं कई अन्य धातुओं के सिक्के, मूर्तियां एवं कई प्राचीन अवशेष मिले, जिसके आधार पर यह भी कहा जाता है कि यहां पर टकसाल होने के साथ ही जौहरी बाजार, माणक चौक आदि भी हुआ करते थे। पुरातत्व विभाग के अधिकारी आदि समय-समय पर इसकी पुरातत्व की दृष्टि से महत्व को स्वीकार तो करते रहे हैं। लेकिन बरती जा रही उदासीनता को लेकर संतोषप्रद जवाब नहीं दे पा रहे हैं। कई कहते हैं कि खोज कार्य वो नहीं कर सकते हैं, इसके लिए केंद्रीय पुरातत्व विभाग ही कुछ कर सकता है।

क्या कहते हैं शोधकर्ता

टोंक के प्राचीन शिव मंदिर का कलात्मक अध्ययन विषय पर अपने एक आलेख में डॉ. रामावतार मीणा ने लिखा है कि “नैनवा देवली मार्ग पर स्थित मुचकुंदेश्वर महादेव जी का प्रसिद्ध मंदिर है। जो सभ्यता 2000 वर्ष पूर्व की मानी जाती है। इसी प्रकार डा. रेणू वर्मा, डा. रिफ्अत अख्तर व अन्य कई शोधकर्ताओं ने इसको श्री कृष्ण के काल से जोड़कर देखा तो, कई ने यहां पर एक नहीं तीन सभ्यताओं के होने की बात कहीं। सिंधु घाटी की सभ्यता से पहले की सभ्यता बताने का भी प्रयास किया गया।

टोंक | पुरात्त्व विभाग की खुदाई में निकले अवशेष एवं ईंट का मकान देखरेख के अभाव में हो रहे हैं बेकार।

अलग-अलग दावे : िबजली गिरने, ज्वालामुखी से नष्ट हुआ शहर

ज्वालामुखी, बिजली गिरने सहित कई प्राकृतिक आपदा के कारण एकदम ये शहर नष्ट होने के भी संकेत मिलते हैं। कार्लाइल की रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि नगर एक किलेदार प्राचीन शहर रहा है। ये शहर ईसाई युग से 50 या सौ साल पहले का भी हो सकता है। हालांकि उनका अधिक फोकस नागा जाति का निवास बताने पर रहा। लेकिन कार्लाइल गौतम बुद्ध एवं विक्रमादित्य के समय एवं उनके प्रभाव का भी संकेत देते हैं। हर्षवर्धन के काल से भी इसको जोड़ने का प्रयास किया।

4 किमी में की खोज : कार्लाइल को मिले प्राचीन अवशेष

कार्लाइल ने 4 वर्ग किलोमीटर के घेराव में इस क्षेत्र का परिवेक्षण किया और उन्होंने यहां से छह हजार तांबे के सिक्के प्राप्त किए। इससे ये अनुमान लगाया जा सकता है कि नगरफोर्ट खेड़ा में मालव गणराज्य की टकसाल रही होगी। उनमें से 110 मुद्राएं इंडियन म्यूजियम कलकत्ता में संग्रहित की गई थी। उस समय इन मुद्राओं का अध्ययन विन्सेट स्मिथ ने किया था। डा. स्मिथ का विचार था कि इन सिक्कों में से 35 सिक्के ऐसे थे, जो बाहर से लाए गए आैर शेष 75 सिक्के नगर में ही ढाले गए थे। कार्लाइल ने इस सिक्कों का अध्ययन करके 40 मुख्य नामों की पहचान की थी, उनमें से 20 तो मालवगण प्रमुखों के नाम है। इन मुद्राओं पर ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया था। और उनका निर्माण काल मुद्रा शास्त्रियों ने िद्वतीय शताब्दी ईपू. से चतुर्थ ई. के मध्य माना। कुछ सिक्कों पर ब्राह्मी वर्ण इस प्रकार लिखे गए हैं कि उनको बांय से दाएं पढ़ना पड़ता है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर महिषासुर मर्दिनी की प्रतिकृति, पाटरी जार, कामदेव व इंद्र की मृण मूर्तियां, शंख के चूड़े, व मनके भी प्राप्त हुए हैं। यहां ये भी गौरतलब है कि यहां कई बार सोने-चांदी के सिक्के मिले तथा अशरफियां आदि भी मिली। कई मामले संबंधित थानों तक गए तथा कई लोगों से सिक्के एवं अशर्फियां बरामद भी हुई।

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