गोलियों और लाशों के बीच निकल हजारों युवाओं ने की शिलान्यास कारसेवा

Bharatpur News - उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुना कर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में आ रही सभी अड़चनों को दूर कर दिया, लेकिन राम मंदिर...

Nov 11, 2019, 07:15 AM IST
उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुना कर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में आ रही सभी अड़चनों को दूर कर दिया, लेकिन राम मंदिर के निर्माण को लेकर युवा से लेकर प्रौढ़ावस्था तक जोश, जज्बे और श्रद्धा से संघर्ष करने वाले लोगों के सामने मंदिर निर्माण के लिए उस समय चले धार्मिक आंदोलन की स्मृतियां उनके स्मृति पटल पर रह-रह कर उभरने लगी हैं। इस अांदाेलन से करीब 30 साल से जुडे़ विश्व हिंदू परिषद के विभाग अध्यक्ष सतीश भारद्वाज ने भास्कर काे बताया कि उन्हें ही नहीं लाखाें कारसेवकाें काे अब पूरा संतोष है कि उन्होंने राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए जिस आंदोलन में भाग लिया था वह सपना अब सच होने को है। बकाैल सतीश भारद्वाज...

कुर्बानी देकर भी कारसेवा करने को तैयार थे कार्यकर्ता : भारद्वाज

खास बात सतीश भारद्वाज, विहिप विभागाध्यक्ष

भास्कर संवाददाता |भरतपुर

वर्ष 1990 की बात है। हवा में सर्दी की सरसराहट आ गई थी। किंतु वातावरण में गर्मी थी। क्योंकि विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंहल जी ने कारसेवा की ऐसी व्यूह रचना और उत्साह का वातावरण तैयार किया कि कार्यकर्ता कुर्बानी देकर भी कार सेवा करने काम तैयार थे। अयोध्या के लिए राजस्थान के कारसेवकों के लिए मरुधर ऐसी गाड़ी थी, जो लखनऊ तक जाती थी।

गुजरात के कार्यकर्ताओं के लिए यूपी में एंट्री का भरतपुर प्रमुख मार्ग था। इसलिए भरतपुर में कारसेवा समिति का गठन किया गया। मुझे संयोजक की जिम्मेदारी सौंपी गई। पहली कारसेवा 30 अक्टूबर 1990 तय की गई। अक्टूबर मध्य से ही कार्यकर्ताओं का अयोध्या पहुंचने का सिलसिला प्रारंभ हो गया। जिम्मेदार कार्यकर्ताओं को अंतिम समय में पहुंचना था। हम लोग 25 अक्टूबर को लखनऊ पहुंच गए थे। 50 हजार से ज्यादा कार्यकर्ताओं को तत्कालीन मुलायमसिंह यादव सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था और एक स्टेडियम में नजरबंद कर लिया था। कार्यकर्ता एक दिन बंद रहे और शाम को गुप्त योजना बनी कि सभी कार्यकर्ता एक साथ फाटक तोड़ कर बाहर निकलेंगे और रेलवे पटरी के सहारे अयोध्या की ओर से आगे बढेंग़े। बीच-बीच में कार्यकर्ताओं को जिलावार अलग-अलग गांवों के रास्तों से आगे बढ़ना है। गांवों में कार्यकर्ताओं का नेटवर्क था। इससे ज्यादा गांव वालों का समर्थन और उत्साह था। कारसेवकों के आवास और भोजन व्यवस्था के लिए महिला, बच्चे, बुजुर्ग तत्पर थे। पुलिस के खुफिया तंत्र को ग्रामीणों के उत्साह ने धता बता दी थी। गांव वाले हम विश्वास दिलाते हैं और आप चलो हम आते हैं... जयघोष के साथ आगे बढऩे को प्रेरित करते थे। तीन रात और दो दिन लगातार पैदल चल कर अयोध्या पहुंचे। करीब 200 किलोमीटर पैदल चलें। जहां कारसेवकों को रोकने के लिए पुलिस ने फायरिंग की, जिसमें 40 से ज्यादा कार्यकर्ता शहीद हुए। उनमें ही भरतपुर के डॉ. महेंद्रनाथ अरोड़ा थे। अरोड़ा जी जोधपुर के कार्यकर्ताओं के साथ थे। इसके बाद भी कार्यकर्ताओं को उत्साह थमने का नाम नहीं ले रहा था और फायरिंग, आंसू गैस के गोले और लाठी चार्ज के बीच कार्यकर्ता आगे बढ़ रहे थे। हनुमान गढ़ी से पहले लाल कोठी के पास कारसेवकों की लाशें देखीं, लेकिन आगे बढ़ते रहे। तभी सूचना आई कि महंत रामचंद्र परमहंस और उनके साथ के कारसेवकों ने शिलान्यास स्थल पर कारसेवा स्वरूप राम शिलाएं रख दीं। इसके बाद संगठन का संदेश था कि शनै-शनै वापस लौटें।

1992 मेंं मंदिर तक पहुंच गए थे भरतपुर के कार्यकर्ता

वर्ष 1992 में 6 दिसंबर को हुई कारसेवा के लिए उत्साह दो साल पहले के मुकाबले अधिक था। ट्रेन की ट्रेन भर कर कार्यकर्ता अयोध्या पहुंचे। राजस्थान से अयोध्या जा रहे कार्यकर्ताओं के भोजन की व्यवस्था भरतपुर में थी। भरतपुर के कार्यकर्ता चार व पांच दिसंबर को रवाना हुए। इनमें कई कार्यकर्ता राममंदिर स्थल तक पहुंचे और कारसेवा के बाद स्मृति स्वरूप मिट्टी और सरयू नदी का जल लेकर आए। अयोध्या मामले में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

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