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तीर्थंकर भगवान पारसनाथ का किया अिभषेक विश्व शांति के लिए शांतिधारा कर अर्द्ध चढ़ाया

एक वर्ष पहले
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श्री चन्द्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर पुरानी डीग में गुरूवार को जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पारसनाथ का ज्ञान कल्याण दिवस बड़े ही धूमधाम के साथ भक्ति भाव से मनाया गया। कार्यक्रम में सुबह मंदिर में भगवान का प्रासुक जल से अभिषेक कर विश्व शांति के लिए शांतिधारा कर भगवान को अर्द्ध चढ़ाया गया। जैन श्रावक राजेन्द्र भगत ने बताया कि लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व पौष कृष्ण एकादशी के दिन जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पारसनाथ का जन्म वाराणसी में राजा अश्वसेन व माता वामा देवी के घर हुआ। जैन पुराणों के अनुसार तीर्थंकर बनने के लिए पारसनाथ को पूरे नौ जन्म लेने पड़े थे। पूर्व जन्म के संचित पुण्यों और दसवें जन्म के तप के फलतः ही वे 23वें तीर्थंकर बने।

16 वर्ष की आयु में जब वो वन भ्रमण कर रहे थे तभी उनकी दृष्टि एक तपस्वी पर पडी, जो कुल्हाड़ी से एक वृक्ष पर प्रहार कर रहा था। यह दृश्य देखकर पारसनाथ सहज ही चीख उठे और बोले ठहरो। उन निरीह जीवों को मत मारो। वह धर्म किसी काम का नही जिसमें दया ना हो। जिस पर साधु बोला कि मैं तो तप के लिए लकडी काट रहा हूं, तो पारसनाथ ने कहा कि लक्कड में नाग-नागिन का जोडा है। तपस्वी के बार से वृक्ष के चिर तने से छटपटाया रक्त से नहाया हुआ नाग-नागिन का एक जोडा बाहर निकला। तभी पारसनाथ ने नाग-नागिन को णमोकार मंत्र सुनाकर उनकी मृत्यु की पीडा को शांत किया। अगले जन्म में वे नाग जाति के इन्द्र-इन्द्राणी, धनेन्द्र और पद्मावती बने। इस मौके पर भारतभूषण, गोपीचन्द, हरीसिंह, परसुनाज, वंशु, सियाराम, शकुंतला, रेखा, लक्ष्मी, चेताली, पुष्पा आदि सहित बडी संख्या में जैन श्रावक
मौजूद थे।

डीग. भगवान पारसनाथ।
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