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साध्वी ने समझाया भाव साधना का सार व महत्व

भास्कर संवाददाता | चित्तौड़गढ़ जीवन में साधना का बड़ा महत्व है। जो मुक्ति का द्वार खोल देती है। साधना में शुद्धि...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 03, 2018, 02:35 AM IST

भास्कर संवाददाता | चित्तौड़गढ़

जीवन में साधना का बड़ा महत्व है। जो मुक्ति का द्वार खोल देती है। साधना में शुद्धि का बड़ा महत्व है। मुख्य रूप से द्रव्य, क्षेत्र, काल एवं भाव शुद्धि पूर्वक साधना करनी चाहिए। द्रव्य, क्षेत्र एवं काल बाह्य शुद्धि के रूप है। भाव शुद्धि का महत्व सबसे ज्यादा है। मन की एकाग्रता के साथ कर्म निर्जरा एवं मोक्ष प्राप्ति के एकमेव लक्ष्य से विनय व विवेक पूर्वक साधना करना भाव शुद्धि है।

यह विचार साध्वी श्री अपूर्व प्रज्ञा ने बुधवार सुबह सेंती स्थित दिवाकर स्वाध्याय भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भूतकाल के संचित पापों के कारण वर्तमान भव में धर्माचरण करते हुए भी व्यक्ति द़ुख भोगता है। क्योंकि उसका पुण्य का खजाना खाली पड़ा है। जो विगत भव में पुण्यशाली है। अभी धर्माचरण से पुण्य में और अभिवृद्धि हो रही है।

वह व्यक्ति सुख भोग रहा है। दूसरों को भी परोपकार से सुखी कर रहा है। उन्होंने कहा कि पीड़ित मानवता एवं राष्ट्र रक्षा के लिए पुण्य से अर्जित धन का उपयोग शुद्ध भावों के से करेंगे तो दोनों लोक सुधरने वाले हैं।

प्रवचन आज और कल भी होंगे...संघ अध्यक्ष लक्ष्मी लाल चंडालिया ने बताया कि जैन धर्म दिवाकर श्री धर्ममुनि की सुशिष्या साध्वी अपूर्व प्रज्ञा मसा की प्रेरणा से कई श्रावक, श्राविकाओं ने जमीकंद सेवन के प्रत्याख्यान लिए। तीन व चार मई को भी सुबह 8.30 से 9.30 बजे तक प्रवचन दिवाकर स्वाध्याय भवन में होंगे।

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