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किसान खेती में नई तकनीक के इस्तेमाल व वैज्ञानिकों की सलाह से बढ़ा सकते हैं उत्पादन

सबसे पहले मिट‌्टी की जांच कराएं और कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से खाद एवं सूक्ष्म पोषक तत्व डालें ललित शर्मा |...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 06:45 AM IST

किसान खेती में नई तकनीक के इस्तेमाल व वैज्ञानिकों की सलाह से बढ़ा सकते हैं उत्पादन
सबसे पहले मिट‌्टी की जांच कराएं और कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से खाद एवं सूक्ष्म पोषक तत्व डालें

ललित शर्मा | जयपुर

किसान खेती की परंपरागत विधियों में नई तकनीक का इस्तेमाल कर उत्पादन बढ़ा सकते हैं। इससे उत्पादकता भी ज्यादा हो सकती है। इसके लिए किसानों को कृषि वैज्ञानिकों या कृषि अधिकारियों की सलाह पर अमल करना चाहिए। कंप्यूटर और मोबाइल के जरिए खेती के नए तरीके जानने के इच्छुक किसानों को भी लगातार इनसे संपर्क में रहना चाहिए। इससे काम करने के तरीकों में गुणात्मक सुधार आने के साथ अच्छी और ज्यादा फसल ले सकते हैं। हालांकि जैविक खेती से फसल की गुणवत्ता में अत्यधिक सुधार होता है, लेकिन उत्पादकता पर असर आता है, क्योंकि मृदा में कई पोषक तत्व कम होते हैं, जिनका असर उत्पादकता पर पड़ता है।

हार्वेस्टिंग : फसल कटाई में नई तकनीक से युक्त हार्वेस्टर्स का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके बाद थ्रेसर का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे समय और श्रम की बचत होगी। वैसे बाजरे की हार्वेस्टिंग हाथों से करना अच्छा माना जाता है।

पुष्कर से नींबू के 250 पौधे लाकर लगाए हर साल दो लाख रुपए आय की उम्मीद

8 लाख कलम दो महीने बाद ही पौध के रूप में लहलहाने लगी

जोधराज टेलर | चिकारड़ा (चित्तौड़गढ़)

यहां के किसानों का पारंपरिक खेती के साथ स्थाई आमदनी के स्रोत फलोद्यान व बागवानी के प्रति रुझान बढ़ रहा है। कस्बे के मदनलाल खंडेलवाल ने डूंगला मार्ग पर बस्ती के पिछवाड़े अपनी 4 बीघा कृषि भूमि पर बागवानी विशेषज्ञों की सलाह पर पुष्कर से नींबू के 250 पौधे लाकर करीब 4 साल पहले रोपे थे। इनमें तीसरे साल फल आने शुरू हो गए। अब चौथे साल में ये पौधे फूल और फलों से लकदक हो रहे हैं। किसान खंडेलवाल ने बताया कि मई-जून में इन नींबू के पौधों से करीब एक लाख रुपए की आय होने की उम्मीद है। पौधों में साल में दो बार नींबू लगेंगे। पौधे बारहमासी फलदार होने से दूसरे दौर में भी एक लाख रुपए की आमदनी होने की संभावना है। खंडेलवाल ने इन पौधों को सींचने के लिए एक किलोमीटर दूर स्थित जल स्रोत से बगीचे तक पाइप लाइन बिछाई है।

मृदा जांच : यहां दुर्गापुरा स्थित राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (रारी) में सहायक प्रोफेसर डॉ. श्वेता गुप्ता का कहना है कि खेती में नई तकनीक की इस्तेमाल करना है तो सबसे पहले मिट्‌टी की जांच करवानी चाहिए। सरकार की ओर से इसकी व्यवस्था है। मृदा का हर 3 साल में परीक्षण करवाना लाभदायक होता है। जांच कराने से मृदा में पोषक तत्वों की अनुलब्धता या कमी का पता चल जाता है। मृदा में पोषक तत्वों की कमी की पूर्ति हर फसल के लिए अलग-अलग होती है। मृदा जांच के बाद कृषि वैज्ञानिक कमी के अनुसार खेत में खाद या फर्टिलाइजर डालने की सलाह देते हैं।

फसल के ज्यादा उत्पादन के लिए खरपतवार पर नियंत्रण करना जरूरी

खेती में फसल को अधिक उपजाऊ बनाने के लिए जरूरी है कि खरपतवार को नियंत्रित किया जाए। इसमें नई तकनीक और वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं तो फसल की मात्रा बढ़ सकती है। इसके लिए ये तरीके अपनाए जा सकते हैं।

(अ) गहरी जुताई : खरपतवार नहीं पनपे, इसके लिए सबसे पहले खेत को गर्मी के दौरान गहरी जुताई कर छोड़ दें। इससे कीड़े और सूक्षकृमियों के मरने के साथ ही वनस्पति के कई बीज स्वत: ही खत्म हो जाते हैं।

(ब) खुरपी से : खुरपी से खरपतवार हटाना परंपरागत तरीका है। बुआई के 20 से 30 दिन बाद खुरपी से खुदाई कर या खुरचकर खरपतवार हटाई जाती है। किसान स्वयं या श्रमिकों की मदद से इसे हटा सकते हैं।

(स) हर्बीसाइड का इस्तेमाल : खरपतवार हटाने के लिए श्रमिकों की कमी होने पर किसान हर्बीसाइड का इस्तेमाल कर सकते हैं। डॉ. श्वेता गुप्ता का कहना है कि हर खरपतवार के लिए अलग-अलग नाशक होता है। कुछ के लिए बुआई के दो दिन बाद नाशक मिट्‌टी के नमी रहते डालें। कुछ के लिए 20-25 दिन बाद खड़ी फसल में डालना चाहिए।

पौध सरंक्षण : कीट या रोग होने की स्थिति में हर 15 दिन के अंतराल से मेंकोजेब या कारबेंडाजेम से स्प्रे कर सकते हैं। चूसक कीड़े लगने पर एमिडा क्लोरपिड का छिड़काव करना चाहिए। स्प्रे कटाई से एक से डेढ़ माह पहले ही करना चाहिए।

रेत के धोरों में किन्नू की बहार

भरतपुर| झुंझुनूं जिले की चिड़ावा तहसील के किठाणा गांव के सत्यवीर सिंह की पहचान किन्नू उत्पादक किसान के रूप में बन गई है। उन्होंने अपने बगीचे में किन्नू के 500 पौधे लगा रखे हैं। इनसे इस वर्ष करीब एक लाख रुपए की आमदनी प्राप्त की है, जो आगामी वर्षों में बढ़कर 3 लाख रु. तक हो जाएगी। किसान सत्यवीरसिंह पहले गांव के अन्य किसानों की तरह परंपरागत खेती कर जीवनयापन करते थे। उसके मन में नए कार्य करने की तमन्ना जरूर थी, लेकिन सही जानकारी नहीं मिलने से वह अधिक कुछ नहीं कर पा रहा था। करीब 7 साल पहले वह रामकृष्ण जयदयाल डालमिया सेवा संस्थान से जुड़ा। उसे परंपरागत खेती के बजाय नई कृषि क्रियाओं, बगीचा लगाने और पशुपालन के लिए उन्नत नस्ल के पशु खरीदने की सलाह दी गई और इस कार्य में मार्गदर्शन भी किया। सत्यवीरसिंह को संस्थान ने अनुदान पर किन्नू के 500 और मौसमी के 40 पौधों के अलावा नींबू, आम, खजूर व अमरूद के पौधे मुहैया कराए। इन पौधों के रोपण एवं अन्य कृषि क्रियाओं की जानकारी समय-समय पर दी गई। कीटनाशक दवाएं भी अनुदान पर मुहैया कराई गईं। कुछ पौधों में जब किन्नू के फल आने शुरू हुए तो परंपरागत फलों के मुकाबले इनका रंग-रूप अधिक चमकीला और वजन भी ज्यादा था। इससे बाजार में इनकी कीमत अधिक मिलने लगी। आगामी वर्षों में जब सभी पौधों में फल आने लगेंगे तो उसे केवल किन्नू के पौधों से 5 लाख रुपए तक प्रतिवर्ष मिलने लगेंगे। सत्यवीर सिंह ने सिंचाई के लिए फव्वारा के बजाय बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली लगा रखी है, जिससे पानी की बचत हो रही है। सत्यवीर ने आय में वृद्धि के लिए फलों के बगीचे में गेंदा व विभिन्न सब्जियों की बुआई भी कर रखी है। इससे उसे प्रतिवर्ष करीब एक लाख रुपए की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। वह अपने खेतों में खरीफ की फसल में बाजरा, मूंग, चौला व ग्वार की बुआई करता है। इससे भी उसे प्रतिवर्ष आसानी से एक लाख रुपए तक मिल जाते हैं। वह बाजरे की देसी किस्म की बुआई करता है। इसका उपयोग वह अपने खाने में करता है। किसान सत्यवीर सिंह खेती के अलावा उन्नत नस्ल के दुधारू पशु भी पालता है। इनसे उत्पादित करीब 50 लीटर दूध वह प्रतिदिन बाजार में बेचता है। जैविक खाद के लिए उसने वर्मी कम्पोस्ट यूनिट लगा रखी है। हरी खाद भी तैयार कर लेता है। रामचरण धाकड़

बाॅयो फर्टिलाइजर्स : डॉ. गुप्ता का मानना है कि कृषि वैज्ञानिक एन पी के के सूत्र के अनुसार सलाह देते हैं। एन अर्थात नाइट्रोजन की कमी को यूरिया डालकर पूरा किया जा सकता है। पी यानी फास्फोरस की कमी पर डीएपी और के मतलब पोटेशियम की कमी पर न्यूरोटा ए पोटेश खेत में डालने की सलाह दी जाती है। वैसे न्यूरोटा के पोटेश को पोटशियम की कमी होने पर ही डालना चाहिए अन्यथा नहीं। इसके साथ ही माइक्रो न्यूट्रेंट (सूक्ष्म पोषक तत्व) जिंक, सल्फर और आयरन की कमी के अनुसार सूक्ष्म पोषक तत्व डाले जा सकते हैं। इन सूक्ष्म पोषक तत्वों को फर्टिलाइजर्स के साथ डालने से फायदा होता है। इससे बुआई से पहले से पोषक तत्वों के मौजूद रहने से फसल की पौध तक जल्द पहुंच सकते हैं। सूक्ष्म पोषक तत्व सॉलिड और लिक्विड दोनों रूप में उपलब्ध हैं। कई किसान लिक्विड पोषक तत्वों का इस्तेमाल करते हैं, हालाकि अभी तक सरकार की ओर से इस तरह की कोई सलाह जारी नहीं की गई है। इस पर शोध चल रहा है, अब तक के परिणाम सकारात्मक रहे हैं।

भीलवाड़ा, मंगलवार 17 अप्रैल, 2018 | 14

जोधपुर में ‘ग्राम’ का आयोजन 23 मई से, मसालों के विकास पर रहेगा फोकस

जयपुर| ग्लोबल राजस्थान एग्रीमीट (ग्राम) का अगला आयोजन जोधपुर में 23 से 25 मई तक होगा। इसमें मसाला संवर्धन और विकास पर फोकस किया जाएगा। इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के ट्रेडर्स के साथ मसाला उत्पादन बढ़ाने पर चर्चा के लिए विशेषज्ञ वैज्ञानिकों को भी बुलाया जा रहा है। कृषि मंत्री डॉ. प्रभुलाल सैनी ने भास्कर को बताया कि पश्चिमी राजस्थान में जीरा, मेथी, ईसबगोल, सौंफ और सावा का उत्पादन देश में सर्वाधिक होता है। इन फसलों को अतंरराष्ट्रीय मार्केट उपलब्ध कराने और विश्व स्तर की ख्याति दिलाने के लिए ग्लोबल ट्रेडर्स को बुलाया जा रहा है। डॉ. सैनी ने बताया कि ग्राम में पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर, जालोर, सिरोही, पाली, बाड़मेर व जैसलमेर से 45 से 50 हजार किसानों को शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। इन किसानों को सामान्य खेती की नवीनतम तकनीक के साथ मसाला उत्पादन में गुणवत्ता लाने व उत्पादकता बढ़ाने की जानकारी दी जाएगी। बाड़मेर में शुगरफ्री पोटाटो, थार के अनार व अन्य उत्पादों की जानकारी दी जाएगी।

भिंडी की फसल में एनपीके एवं सूक्ष्म तत्वों का उपयोग करना होता है लाभकारी

भिंडी की फसल में टेढ़ी-मेढ़ी भिंडी लग रही हैं। इससे उत्पादन पर प्रभाव पड़ रहा है। क्या उपाय करें? -कृष्ण मुरारी गोस्वामी, पाटन, बूंदी

किसान भिंडी की फसल में एनपीके एवं सूक्ष्म तत्वों का उपयोग करें। इससे सही एवं अधिक उत्पादन होगा।

इमली का 40 वर्ष पुराना पेड़ है। फूल आते हैं, पर फल नहीं लगते। उपाय बताएं।

-कुलदीप सिंह शेखावत, जुलियासर, सीकर

इमली के पौधे की तने के भाग को छोड़कर गहरी गुड़ाई करें और उस मिट्टी में एफवाइएम सहित 25 किलो गोबर की सड़ी खाद मिलाकर सिंचाई करें। इससे फल लगना प्रारंभ हो जाएंगे।

बैंगन के पौधे में फल नहीं लग रहे। उपाय बताएं? -जोगेंद्र जांगिड़, गजवारा, मनोहरथाना

-कृषि पर्यवेक्षक के मार्गदर्शन में सूक्ष्म तत्व व दवा का उपयोग करें।

एक्सपर्ट मुकेश कुमार चौधरी, कृषि अधिकारी, उद्यान विभाग, अलवर

किसान हैल्पलाइन नंबर

18001801551, 18001806127

(सुबह 10 से शाम 5 बजे तक, टोल फ्री)

राज्य स्तरीय हैल्प डेस्क (0141-5102578)

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