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बिजली, पानी, सड़क पहुंची तो 22 साल बाद राजघाट से निकली बरात

Dainik Bhaskar

May 01, 2018, 07:10 AM IST

Bhilwara News - शहर की चमचमाती सड़कें जहां दम तोड़ देती हैं वहीं से बीहड़ के टेढ़े-मेढ़े रास्तों वाले धौलपुर के राजघाट गांव की...

बिजली, पानी, सड़क पहुंची तो 22 साल बाद राजघाट से निकली बरात
शहर की चमचमाती सड़कें जहां दम तोड़ देती हैं वहीं से बीहड़ के टेढ़े-मेढ़े रास्तों वाले धौलपुर के राजघाट गांव की सीमा शुरू होती है। राजघाट इसलिए भी खास है क्योंकि यहां से 22 साल बाद कोई बरात निकली है। गांव में सिर्फ कच्चे घर हैं। दुल्हा बने पवन के चेहरे पर कोई इतिहास रच देने जैसी मुस्कान है। गरीबी है, इसीलिए घोड़ी पर निकासी नहीं निकाल पाया। गांव में विकास के नाम पर महज एक प्राइमरी स्कूल है और एक हैंडपंप जिसमें से खारा पानी आ रहा है। पवन की बरात रविवार को मध्यप्रदेश के कुसैत गांव के लिए रवाना हुई। इससे पहले इस गांव में 1996 में लड़के की शादी हुई थी। इतने साल तक दुल्हन नहीं आने की वजह थी गांव में मूलभूत सुविधाओं का नहीं होना।

धौलपुर के रहने वाले और जयपुर में एसएमएस मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस कर रहे अश्वनी पाराशर और उनके कुछ दोस्तों की जिद ने 3 साल में इस गांव की तस्वीर ही बदल दी। इनकी ओर से चलाए गए सेव राजघाट कैंपेन की वजह से यहां सोलर बिजली, आरओ वाटर प्लांट, शौचालय और गांव तक आने के लिए कच्ची सड़क बन गई है। इसीलिए अब लोग यहां अपनी बेटियां भी ब्याहने लगे हैं। इससे पहले गांव में कोई सुविधा नहीं होने के कारण दूसरे गांवों के लोग अपनी बेटियां देने से कतराते थे, लेकिन जैसे ही मूलभूत सुविधाएं पहुंची तो अब यहां शादियों पर लगे बैन भी हटने लगे हैं। पवन की शादी के बाद मई में दो और लड़कों की भी शादी होने वाली है।

दुर्गम रास्तों से पहुंचना पड़ता था गांव, अश्वनी ने टीम बनाकर सुधारी हालत


दूल्हा पवन।

राजघाट गांव धौलपुर नगर परिषद से 6 किमी दूर ग्वालियर रोड पर चंबल के किनारे बसा है। इस गांव में न तो बिजली है और न साफ पीने के पानी की व्यवस्था। गांव तक आने के लिए बीहड़ के दुर्गम रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। विकास के नाम पर गांव में महज एक प्राइमरी स्कूल और एक हैंडपंप है। 2015 की दिवाली पर धौलपुर के ही रहने वाले और जयपुर एसएमएस मेडिकल कॉलेज के स्टूडेंट अश्वनी पाराशर यहां पहुंचे और गांव वालों को मिठाई बांटी। इसके बाद जब उन्होंने गांव वालों से बात की तो कुछ ऐसी हकीकतें सामने आईं जो सरकारों के विकास के दावों की पोल खोलती थीं। अश्वनी और उनकी टीम के प्रहलाद, लोकेन्द्र, प्रणव, चौबसिंह और सौरभ ने मिलकर इस गांव के लिए लड़ाई लड़ना शुरू किया।

हाईकोर्ट में दाखिल की पीआईएल, तीन साल में मिली क्राउड फंडिंग : अश्वनी ने जयपुर हाईकोर्ट में सरकार के खिलाफ मानवाधिकारों का उल्लंघन करने के लिए पीआईएल दाखिल की तो 3 साल में क्राउड फंडिंग और कई एनजीओ की मदद से यहां आरओ वाटर प्लांट, हर घर में सोलर लाइट, शौचालय और कच्ची सड़क बनवा दी। कोर्ट में अभी सुनवाई जारी है। बदलाव की यह बयार सामाजिक कुप्रथाओं के खात्मे के लिए भी जारी रही। गांव वालों ने शपथ लेकर शराब छोड़ी और अपने गांव का विकास करवाने की कसम भी खाई। अश्वनी और उनकी टीम की मेहनत का नतीजा यह हुआ कि अब पूरा गांव शराबमुक्त है और बच्चे रात को भी अपनी झोंपड़ी में पढ़ रहे हैं। लोगों को पीने के पानी के लिए चंबल से लाशें हटाकर पानी नहीं लाना पड़ता और लोग रात में सोलर लैंप की मदद से बाहर भी निकल जाते हैं। पवन की शादी में भी लाइट के लिए इन सोलर लैप्स का ही इस्तेमाल हुआ।

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