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महामारी के एलान में लगे 72 दिन; तब तक पीड़ित 13 गुना और प्रभावित देशों की संख्या 3 गुना बढ़ गई

एक वर्ष पहले
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विशेषज्ञ कहते हैं, अलग-अलग जगह पैसा लगाने से फायदा

कोरोना वायरस के आर्थिक प्रभाव को लेकर उठी आशंकाओं के बीच अमेरिका में ब्याज दरों में बदलाव हो रहा है। फेडरल रिजर्व ने पिछले सप्ताह दरों में और अधिक कटौती कर दी। लिहाजा, विशेषज्ञ लोगों को अपनी बचत योजनाओं पर नए सिरे से गौर करने की सलाह दे रहे हैं। अमेरिका में लाखों निवेशकों को रिटायरमेंट सुरक्षित बनाने के लिए शेयर मार्केट में 60 और सिक्यूरिटी बॉन्ड में 40% पैसा लगाने की सलाह लंबे समय से दी जा रही है। 60/40 नियम के तहत लंबी अवधि के स्टॉक और सुरक्षित बॉन्ड को संतुलन का रास्ता माना जाता है। काम छोड़ने के बाद अपनी बचत से हर साल 4% से अधिक पैसा ना निकालने की सिफारिश भी सामान्य है।

विश्लेषक बताते हैं कि कम ब्याज दरों के बीच भी बॉन्ड ब्याज से एेसी आय सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं जिससे शेयर मार्केट में गिरावट की भरपाई की जा सके। वैसे, कुछ समय से स्टॉक और बॉन्ड से आय गिर ही रही है। मोर्गन स्टेनले ने अभी हाल में 60/40 पोर्टफोलियो पर अगले दशक में 4% सालाना रिटर्न की भविष्यवाणी की है। दूसरी ओर बैंक ऑफ अमेरिका की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यह मिश्रण 2020 में नहीं चल पाएगा।

वेल्स फार्गो इन्वेस्टमेंट इंस्टीट्यूट में प्रमुख रणनीतिकार ट्रेसी मेकमिलन कहते हैं, यदि लोग निश्चित आय के इन्वेस्टमेंट को अलग-अलग निवेश करें तो उन्हें काफी लाभ मिल सकता है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मत है कि 60/40 का नियम उन निवेशकों के लिए ठीक नहीं है जिनके रिटायरमेंट के लिए दस साल या उससे अधिक समय बचा है। बचत का 4% से अधिक पैसा ना खर्च करने का नियम युवा निवेशकों को बताता है कि उन्हें कितना पैसा बचाने की जरूरत है।

अमेरिकन फाइनेंशियल सर्विस कॉलेज में प्रोफेसर वेड फाउ कहते हैं, अब निवेशकों को बचत से 3% से अधिक पैसा नहीं निकालना चाहिए। बैंक ऑफ अमेरिका में इन्वेस्टमेंट ग्रुप के प्रबंध संचालक अनिल सूरी कहते हैं, ‘निवेशकों को निजी निवेश योजना बनाना चाहिए। उसे स्थिति के हिसाब से बदला जाए’।

(टाइम और टाइम लोगो रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं।
इनका उपयोग अनुबंध के तहत किया गया है।)

अमेरिका में श्वेत बहुल स्कूलों को बाकी स्कूलों से 1.70 लाख करोड़ रु. सालाना अधिक मिलते हैं

स्कूलों की सुविधाओं में अंतर को अदालत में चुनौती से कुछ नहीं हुआ

केविन कैरी

अमेरिका में श्वेतों और अश्वेतों के बीच भेदभाव हर स्तर पर है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्थिति बहुत गंभीर है। अश्वेत बहुल और गरीब इलाकों में सैकड़ों स्कूलों की हालत खराब है। दूसरी तरफ श्वेत बहुल क्षेत्रों के स्कूल साधन संपन्न हैं। स्वयंसेवी संगठन एड बिल्ड के अनुसार देश 75% से अधिक श्वेत छात्रों वाले स्कूलों को उन स्कूलों की तुलना में 1.70 लाख करोड़ रुपए हर साल अधिक मिलते हैं जिनमें श्वेत छात्रों की संख्या 25% या उससे कम है। स्कूलों से तुलना करें तो अमीरों और गरीबों का अंतर साफ समझ में आता है।

कुछ राज्यों की स्थिति अन्य राज्यों से बेहतर हैं। वे उन जिलों में अतिरिक्त पैसा भेजते हैं जिनमें गरीबी अधिक है। फिर भी, गरीब जिलों में रहने वाले छात्र ऐसे स्कूलों में पढ़ते हैं जिन्हें सरकारी और अन्य स्रोतों से कम पैसा मिलता है। स्कूलों में अाधुनिक सुविधाएं नहीं हैं। अच्छे शिक्षकों की कमी है। उधर, अमीर छात्रों के स्कूलों में पर्याप्त साधन हैं। अच्छी शिक्षा प्राप्त छात्रों का करिअर भी शानदार रहता है। उनके बच्चे भी अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं। यह चक्र निरंतर चलता है।

अमेरिकी शिक्षा में चल रहे भेदभाव पर नजर डालने के लिए एक उदाहरण पर गौर कीजिए। मिशिगन झील के किनारों पर बसा 10 हजार की आबादी का बेंटन हार्बर शहर किसी समय फलता-फूलता उद्योग केंद्र था। फिर, उसकी अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई। शहर के हाईस्कूल की बिल्डिंग 100 साल पुरानी है। उसके आसपास की सड़कों पर कुछ बड़े घर हैं। कुछ भवन जर्जर हो चुके हैं। कारोबार बंद पड़े हैं। कई दुकानें खाली हैं। सरकारी स्कूलों (पब्लिक स्कूल) में शिक्षा का स्तर निम्न है। उनकी आर्थिक हालत खराब है। पिछले साल मिशिगन के गवर्नर ग्रेचेन ह्विटमेर ने हाईस्कूल बंद करने और छात्रों को नजदीकी जिलों में भेजने का प्रस्ताव रखा था।

नवजात शिशुओं की माताओं से लोगों की अपेक्षा बहुत ज्यादा रहती है

लोरी फ्रेडकिन

बच्चे का जन्म होने के एक माह बाद ही मैं काम पर लौट आई थी। अपने नए बॉस के सामने स्वयं को साबित करने की चुनौती से जूझ रही थी। मैं ऑफिस जाने से पहले बच्चे को दूध पिलाती थी। मुझे दिन और रात में कई बार ऐसा करना पड़ता था। मैं अपने नवजात बच्चे का ख्याल रखने वाली मां बनने की कोशिश कर रही थी। उसकी बड़ी बहन चाहती थी कि मैं कम से कम एक बार तो उसे भी पर्याप्त समय दूं। उसे गोद में उठाऊं। आखिर वह भी तो छोटी बच्ची है।

अश्वेत वोटरों ने बिडेन को मजबूत दावेदार बनाया

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कम ब्याज दरों के दौर में निवेश के फार्मूलों पर संदेह

, भीलवाड़ा, रविवार, 15 मार्च 2020

शिक्षा में भेदभाव: अमीर जिलों के स्कूलों में अपार साधन, अश्वेत और गरीब क्षेत्रों के स्कूल कमजोर

पैरेंटिंग : उनसे घर और ऑफिस में कोई यह तो कहे कि सब ठीक है, चिंता करने की जरूरत नहीं है

मोसी बॉल

इस साल नवंबर में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जो बिडेन के डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने की संभावना के पीछे कई कारण काम कर रहे हैं। कई राज्यों में अश्वेत अमेरिकियों और डेमोक्रेटिक पार्टी के पुराने वोटरों ने बिडेन को तमाम दावेदारों से ऊपर खड़ा कर दिया है। प्रायमरी चुनावों में बिडेन ने पार्टी के सबसे प्रबल दावेदार बर्नी सेंडर्स को पीछे छोड़ दिया। उम्मीदवार की घोषणा जुलाई में पार्टी के सम्मेलन में होगी।

पूर्व उपराष्ट्रपति बिडेन को नरमपंथियों, अफ्रीकी अमेरिकियों और डेमोक्रेटिक नेताओं का व्यापक समर्थन मिल रहा है। दूसरी तरफ बर्नी सेंडर्स डेमोक्रेटिक पार्टी की समाजवादी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। सेना के बीच उनकी गहरी जड़ें हैं। एलिजाबेथ वारेन, माइकल ब्लूमबर्ग, पीट बुटिगिएग सहित बीस से अधिक पार्टी दावेदार मैदान से हट चुके हैं। न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर ब्लूमबर्ग ने तो अपने अभियान पर 3600 करोड़ रुपए खर्च कर दिए थे। फरवरी में बिडेन प्रायमरी चुनावों में चौथे, पांचवें स्थान पर थे। वे एक-दो राज्यों में दूसरे स्थान पर भी आए थे। लेकिन, सुपर ट्यूसडे ने सब कुछ बदल डाला है।

वेंचर केपिटलिस्ट और बिडेन के लिए चंदा जुटाने वाले एलन पेट्रीकॉफ कहते हैं, बिडेन के चुनाव पर अब ज्यादा लोग पैसा लगाने के लिए आगे आ रहे हैं। सर्वेक्षणों से संकेत मिले हैं कि उपनगरों के शिक्षित नरमपंथी भी बिडेन के पक्ष में हैं। बर्नी सेंडर्स कहते हैं, ‘हम दोनों के बीच अब भी कड़ा मुकाबला है’। कई सर्वेक्षण बताते हैं कि 40% लोग पार्टी उम्मीदवार का चयन अंतिम दिनों में करते हैं। इसलिए डेमोक्रेट चिंतित हैं कि नवंबर में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को चुनौती कौन देगा।

(टाइम और टाइम लोगो रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं।
इनका उपयोग अनुबंध के तहत किया गया है।)

बेंटन हार्बर स्कूल को बंद करने के प्रस्ताव का विरोध।

 श्वेत बहुल अमीर इलाकों में स्कूलों का बजट कई अधिक गुना होता है। उनमें अन्य सुविधाएं भी बेहतर हैं।

 श्वेत बहुल इलाकों से ज्यादा टैक्स मिलता है। इसलिए राज्य और स्थानीय संस्थाएं वहां सरकारी स्कूलों के लिए ज्यादा बजट रखते हैं।

 अश्वेत बहुल गरीब इलाकों के स्कूल भवनों की हालत जर्जर। शिक्षक कम हैं। पैसा भी पर्याप्त नहीं मिलता। शिक्षा का स्तर निम्न है।

 अश्वेत इलाकों के स्कूलों से लोग अपने बच्चों को निकालकर सुविधा संपन्न स्कूलों में भर्ती कराते हैं।

1921 में खुले बेंटन हार्बर हाईस्कूल में 1200 सीट का आधुनिक ऑडिटोरियम था। उस समय सुपीरियर स्टील, मिशिगन एलॉयज, अप्टॉन मशीन कंपनी (अब व्हर्लपूल) जैसी कंपनियां थीं। फिर यह इलाका उजड़ गया। कई कंपनियां बंद हो गईं। व्हर्लपूल जैसी कंपनियों ने विदेशों में मैन्युफैक्चरिंग शुरू कर दी। अस्पताल नदी पार चला गया। अखबार का दफ्तर, क्लब, व्यापारिक प्रतिष्ठान सेंट जोसफ जाने लगे। 1960 में बेंटन हार्बर के श्वेत पैरेंट ने श्वेत बहुल इलाकों में नया स्कूल खोल लिया। इस तरह जिले का श्वेत-अश्वेत, अमीर-गरीब को बीच विभाजन हो गया।

1967 में श्वेत अभिभावकों ने स्कूल जिले के विभाजन को अदालत में चुनौती दी। वंचित और अश्वेत छात्रों के लिए बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने वाले संगठन एनएएसीपी ने याचिका का समर्थन किया। 1977 में एक अदालत ने जिले में शिक्षा की अलग-अलग सुविधाओं को भेदभाव पूर्ण और असंवैधानिक करार दिया। लेकिन, 1981 में अपील अदालत ने स्कूल जिले के अंदर दूसरी तरह के पब्लिक स्कूलों (मैग्नेट स्कूल) को एक तरह से मान लिया। इससे शहर का विभाजन हो गया। बेंटन हार्बर में वोटरों ने शिक्षा बजट के लिए पैसा देना बंद कर दिया। बंद कारखानों से टैक्स मिलना बंद हो गया। उधर सेंट जोसफ में स्कूली सुविधाओं और शिक्षकों के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं।

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शहर के दूसरे हिस्से में स्थिति एकदम विपरीत है। सड़क के दूसरे छोर पर चमचमाता काॅर्पोरेट कांप्लेक्स है। 100 मीटर आगे एक पुल पर याट खड़ी हैं। बाईं ओर गोल्फ कोर्स है। नदी के उस पार सेंट जोसफ में रेस्रांओं की कतार लगी है, आभूषण की दुकानें और बुटीक हैं। दोनों इलाके एक-दूसरे से बमुश्किल एक किलोमीटर दूर हैं। दोनों का संसार अलग है। सेंट जोसफ में हर कोई गोरा है। बेंटन हार्बर में लगभग आधे अश्वेत हैं। वे गरीब हैं। अमेरिका में बेंटन हार्बर जैसे सैकड़ों स्कूली जिले हैं। सेंट जोसफ जैसे स्कूली जिलों की भी संख्या सैकड़ों में है।


_photocaption_श्वेत-अश्वेत और अमीर-गरीब में सुविधाओं का अंतर
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मिशिगन झील के किनारों पर बसा 10 हजार की आबादी का बेंटन हार्बर शहर किसी समय फलता-फूलता उद्योग केंद्र था। फिर, उसकी अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई। शहर के हाईस्कूल की बिल्डिंग 100 साल पुरानी है। उसके आसपास की सड़कों पर कुछ बड़े घर हैं। कुछ भवन जर्जर हो चुके हैं। कारोबार बंद पड़े हैं। कई दुकानें खाली हैं। सरकारी स्कूलों (पब्लिक स्कूल) में शिक्षा का स्तर निम्न है। उनकी आर्थिक हालत खराब है। पिछले साल मिशिगन के गवर्नर ग्रेचेन ह्विटमेर ने हाईस्कूल बंद करने और छात्रों को नजदीकी जिलों में भेजने का प्रस्ताव रखा था।


समाज का भी दबाव रहता है। नौकरी या काम पर लौटते ही आपसे सबकुछ ठीक-ठीक करने की अपेक्षा होती है। निश्चित समय पर काम पूरा न करने पर नहीं माना जाता कि बच्चे की देखभाल ने आपके काम पर प्रभाव डाला होगा। लेकिन, इस स्थिति में आपको अपने हिसाब से चलना पड़ता है। एक नए जीवन की देखभाल करते हुए अपने काम निपटाना पड़ते हैं। इस स्थिति में आपको सब ठीक है जैसै शब्द ही बहुत सहारा देते हैं।

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यह भी कि क्या डिलीवरी के बाद उसका शरीर पहले जैसा है? ऐसा सवाल बेहद सतही है। इन बातों पर कम चर्चा होती है कि नव प्रसूता ने क्या ठीक से काम संभाल लिया है। उसका काम कैसा है? शिशु जन्म के बाद महिला के शरीर के हार्मोन्स बदलते हैं। उसकी नींद अस्त-व्यस्त हो जाती है। शिशु के कारण उसे रात में बार-बार जागना पड़ता है। मां की पहली जिम्मेदारी बच्चे की देखभाल करने की होती है। ऐसे समय में भी महिलाओं से अपेक्षा रहती है कि वे जैसी प्रसव से पहले थीं, वैसी ही अब भी रहें।


बच्चे का जन्म होने के एक माह बाद ही मैं काम पर लौट आई थी। अपने नए बॉस के सामने स्वयं को साबित करने की चुनौती से जूझ रही थी। मैं ऑफिस जाने से पहले बच्चे को दूध पिलाती थी। मुझे दिन और रात में कई बार ऐसा करना पड़ता था। मैं अपने नवजात बच्चे का ख्याल रखने वाली मां बनने की कोशिश कर रही थी। उसकी बड़ी बहन चाहती थी कि मैं कम से कम एक बार तो उसे भी पर्याप्त समय दूं। उसे गोद में उठाऊं। आखिर वह भी तो छोटी बच्ची है।

ऐसी स्थिति में कई बार मित्रों और परिजनों के दो शब्द चिंतामुक्त कर देते हैं। मैं एक बार रेस्रां में दोस्तों के साथ बैठी थी। बिल चुकाए बिना बाहर निकल आई। फिर याद आया तो लौटी और क्षमा मांगी। उस समय एक सहेली ने कहा, ‘कोई बात नहीं। दरअसल, उसका चार माह का बच्चा है। वह भूल गई होगी’। इससे मुझे बहुत राहत मिली। एेसे शब्दों को हर मौके पर सुनने का मन करता है।

दरअसल, शिशु को जन्म देने के बाद नौकरी और अन्य जगह लोग दूसरे तरीके से सोचते हैं। यह भी कि क्या डिलीवरी के बाद उसका शरीर पहले जैसा है? ऐसा सवाल बेहद सतही है। इन बातों पर कम चर्चा होती है कि नव प्रसूता ने क्या ठीक से काम संभाल लिया है। उसका काम कैसा है? शिशु जन्म के बाद महिला के शरीर के हार्मोन्स बदलते हैं। उसकी नींद अस्त-व्यस्त हो जाती है। शिशु के कारण उसे रात में बार-बार जागना पड़ता है। मां की पहली जिम्मेदारी बच्चे की देखभाल करने की होती है। ऐसे समय में भी महिलाओं से अपेक्षा रहती है कि वे जैसी प्रसव से पहले थीं, वैसी ही अब भी रहें।

(© 2019 Time Inc.) सर्वाधिकार सुरक्षित। टाइम मैग्जीन से अनुवादित और Time Inc. की अनुमति से प्रकाशित। पूर्व अनुमति के बिना किसी भी भाषा में पूरा या आंशिक रूप में प्रकाशित करना प्रतिबंधित। टाइम मैग्जीन और टाइम मैग्जीन लोगो Time Inc. के रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं। इनका उपयोग अनुमति लेकर किया गया है।

भास्कर न्यूज| नई दिल्ली

चीन के हुबेई प्रांत की राजधानी वुहान से फैले कोरोना वायरस या कोविड-19 से पीड़ितों की संख्या हर दिन बढ़ रही है। अब तक 119 देशों में इस वायरस से संक्रमित लोग पाए जा चुके हैं। इस बीमारी के पहली बार सार्वजनिक होने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) को इसे महामारी घोषित करने में 72 दिन का समय लगा। हालांकि, इस अवधि में इस बीमारी की चपेट में आने वाले 13 गुना हो गए और प्रभावित देशों की संख्या तीन गुना हो गई। अकेले चीन मंे इस बीमारी से करीब चार हजार लोगों की मौत हो गई है। चीन के बाहर सर्वाधिक लोगों की मौत इटली में हुई है। वहां पर शुक्रवार को 250 लोगों की मौत के बाद यह आंकड़ा 1266 हो गया है। इससे पहले 2009 में स्वाइन फ्लू को डब्लूएचओ ने महामारी घोषित किया था। भारत में 83 लोगों के इस वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हो चुकी है। दो लोगों की मौत भी इससे हुई है। पूरे देश में आइसोलेशन वार्ड बनाकर इससे निपटने की तैयारी की गई है। 12 राज्यों में स्कूल व कॉलेजों को भी बंद कर दिया गया है। लोगों को अधिक भीड़ वाली जगहों से दूर रहने की सलाह दी गई है। कई शहरों में सिनेमाहॉल भी बंद कर दिए गए हैं।

इटली में एक ही दिन में 250 मौतों के बाद डब्लूएचओ ने यूरोप को कोविड-19 वायरस का मूल केंद्र घोषित कर दिया है। इस महामारी के दुनिया भर में बेलगाम होने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ब्राजील के राष्ट्रपति बोल्सोनारो से लेकर ब्रिटेन की स्वास्थ्य मंत्री नदीन डॉरिस, ऑस्ट्रेलिया के गृहमंत्री पीटर डटन और हॉलीवुड अभिनेता टॉम हैंक्स व उनकी प|ी रीटा तक इसकी चपेट में हैं। दुनिया भर में आयोजित किए जा रहे लगभग सभी बड़े आयोजन या तो टाले जा रहे हैं या फिर उन्हें निरस्त किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने इससे निपटने के लिए देश में आपातकाल घोषित कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अब तक 119 देशों में कोरोना वायरस के पुष्ट केस मिल चुके हैं। इससे सर्वाधिक प्रभावित दुनिया के 10 देशों में 6 यूरोप के और दो देश एशिया के हैं।

}मच्छर के काटने से भी होता है कोविड-19


}सोशल डिस्टेंसिंग

अभी तक इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि यह वायरस मच्छरों के काटने से भी फैल रहा है। इसके अलावा हैंड ड्रायर के इस्तेमाल से भी इसको नहीं रोका जा सकता, हाथों को बार-बार धोना व अल्कोहल वाले सैनिटाइजर से ही इसे रोका जा सकता है।

कोरोना के फैलने का खतरा भीड़भाड़ वाली जगहों पर ज्यादा है। इसी वजह से दुनियाभर में ऐसे आयोजन टाले जा रहे हैं, जहां भीड़ जुट सकती है। जैसे अमेरिका में राजनीतिक रैलियां रद्द की जा रही हैं। वहीं भारत में आईपीएल को स्थगित किया गया है। मैचों को टाला जा रहा है।

कनाडा के पीएम की प|ी

पीएम जस्टिन ट्रूडो की प|ी सोफी ट्रूडो की भी कोरोना वायरस जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई है।

अभिनेता टॉम हैंक्स और प|ी रीटा

ऑस्ट्रेलिया की यात्रा कर रहे अभिनेता टॉम हैंक्स ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी।

ऑस्ट्रेलिया के गृहमंत्री

गृह मंत्री पीटर डटन ने 13 मार्च को ट्वीट कर बताया की उनकी जांच रिपोर्ट पाॅजिटिव है।

ब्राजील के राष्ट्रपति

ब्राजील के राष्ट्रपति बोल्सोनारो का पहला कोरोना टेस्ट पॉजिटिव पाया गया।

ब्रिटेन की स्वास्थ्य मंत्री

ब्रिटेन की स्वास्थ्य मंत्री नदीन डॉरिस ने खुद उनके कोरोना पाॅजिटिव होने की पुष्टि की।

सेलेब्स. वे बड़े चेहरे जो बीमारी की चपेट में हैं...

चीन ने 31 दिसंबर को कोरोना वायरस के प्रकोप की घोषणा की और 30 जनवरी 2020 को जन स्वास्थ्य आपातकाल लागू कर दिया। डब्ल्यूएचओ ने इसे पैनडेमिक घोषित करने के लिए 72 दिन तक इंतजार किया। इस दौरान यह प्रकोप अधिकांश चीन तक ही सीमित था। ऐसा चीन द्वारा कड़े उपाय करने के चलते हुआ, लेकिन पिछले दो सप्ताह में चीन के बाहर कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या 13 गुना और इससे पीड़ित देशाें की संख्या तीन गुना बढ़ गई। उदाहरण के लिए 29 फरवरी तक इटली में पीड़ितों की संख्या 888 थी जो कि एक सप्ताह में ही बढ़कर 4636 पर पहुंच गई। यूं तो महामारी का बड़ा उदाहरण साल 1918 से 1920 तक फैला स्पैनिश फ्लू है। इससे कई देशों में बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे। अनुमान के मुताबिक 2 से 5 करोड़ लोगों की मौत इससे हो गई थी। डब्ल्यूएचओ द्वारा कोरोना वायरस को महामारी घोषित किए जाने के बाद लगभग सभी देशों को चार काम प्रमुख रूप से करने होंगे। विदेशों से आने वाले लोगों की स्कैनिंग करनी होगी। कोई भी व्यक्ति जो कोरोना वायरस पॉजिटिव पाया जाता है उसे नोटीफाइ करना होगा। इसके साथ ही लोगों पर भी कुछ पाबंदियां लागू होंगी। कोरोना वायरस पीड़ित होने की आशंका होने पर किसी भी व्यक्ति को जांच कराने के लिए कहा जा सकता है इसके लोग मना नहीं कर सकते। संदिग्ध पाए जाने पर लोगों को निगरानी में रखा जा सकता है। यह भी प्रतिबंधात्मक होगा।

डब्ल्यूएचओ ने कोरोना को महामारी क्यों घोषित किया?


} फेसमास्क कारगर नहीं

सौ फीसदी सुरक्षा की गारंटी यह भले ही ना हो। लेकिन कुछ रिसर्च के अनुसार यह बिना मास्क की तुलना में पांच गुना सुरक्षा ज्यादा बढ़ा देता है। अगर आप किसी संक्रमित के साथ हैं तो यह आपका खतरा आधा कर देता है।

} यह मौसमी बुखार से कम खतरनाक है

इसके लक्षण मौसमी बुखार जैसे ही हैं, लेकिन इस बीमारी का पूरा प्रोफाइल और मृत्युदर इसे गंभीर बनाती है। यह माैसमी बुखार की तुलना में 10 गुना अधिक खतरनाक है। अनुमान है कि इससे हर साल 2.9 लाख से 6.5 लाख लोगों की मौत हो सकती है।

} इससे सिर्फ बुजुर्गों की ही मौत होती है

एेसे लोग जिनका स्वास्थ्य ठीक है और वे बुजुर्ग नहीं हैं, उनमें अधिकतर कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार नहीं होंगे। लेकिन, इस बीमारी में सामान्य बुखार की तुलना में सांस की गंभीर दिक्कत हो सकती है। लेकिन, सबसे जरूरी है बीमारी को जल्द से जल्द पहचानना और आइसोलेशन में जाना, ताकि संक्रमण न फैले।

}बीमार के साथ 10 मिनट से अधिक रहने पर ही होता है संक्रमण

कुछ अस्पतालों की गाइडलाइन कहती है कि संक्रमित व्यक्ति की छींक व खांसी के छह फीट के भीतर और 10 मिनट या उससे अधिक वहां पर रहने से संक्रमण हो सकता है। लेकिन, किसी संक्रमित सतह का स्पर्श होने से कम समय में भी संक्रमण हो सकता है।

}वैक्सीन कुछ ही महीनांे में बन सकती है

चीनी रिसर्चरों द्वारा इस बीमारी के जेनेटिक स्वीक्वेंस को जल्द जारी किए जाने से इसकी वैक्सीन पर काम शुरू हो गया है। लेकिन, तमाम परीक्षणों और इसके दुष्प्रभावों के अध्ययन के बाद ही इसके व्यावसायिक निर्माण पर काम शुरू किया जा सकेगा।

} गर्म या बहुत ठंडे इलाके मेें वायरस निष्क्रिय हो जाता है

इस वायरस का विस्तार गर्म व आर्द्र के साथ ही ठंडे इलाकों में देखा गया है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि गर्मी या बहुत ठंड में वायरस मर जाएगा। अभी इसके कोई पुख्ता प्रमाण नहीं हैं।

}पैनडेमिक यानी महामारी

वर्ल्ड हेल्थ आगॅनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) ने महामारी को दो रूपों में माना है। वैश्विक महामारी यानी पैनडेमिक और क्षेत्रीय महामारी यानी एपिडेमिक। काेरोना का पैनडेमिक माना गया है। छह महाद्वीपों और सौ से ज्यादा देशों में फैलने के बाद डब्ल्यूएचओ ने कोरोना काे महामारी घोषित किया है।

}कोविड-19/कोरोना

कोरोना वायरस का तकनीकी नाम सार्स-सीओवी-2 है। इसके कारण होने वाली सांस की बीमारी को कोरोना वायरस डिज़ीज 2019 \\\"यानी कोविड-19\\\' नाम दिया गया है।
CO rona VI rus D-isease 2019

}सेल्फ क्वारंटाइन

सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार अगर आप इटली, चीन, ईरान और साउथ कोरिया जैसे उन देशों से आए हैं, जहां कोरोना तेजी से फैल रहा है। तो आपको 14 दिन अपने घर पर सेल्फ क्वारंटाइन के तौर पर गुजारने चाहिए। यानी खुद घर में रहकर, दूसरों से अलग हो जाना।

}आर-नॉट

आर- नॉट या आरओ किसी वायरस की मूल प्रजनन संख्या होती है। इससे बीमारी या वायरस की गंभीरता का आकलन किया जाता है। अगर यह संख्या एक या उससे ज्यादा होती है, यानी संबंधित बीमारी से ग्रस्त प्रत्येक व्यक्ति किसी एक को संक्रमित कर सकता है। लिहाजा बीमारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है।

}इंक्यूबेशन पीरियड

संक्रमित होने से लेकर लक्षणों के दिखने के समय को इंक्यूबेशन टाइम कहा गया है। कोरोना में यह समय 14 दिन का है। लेकिन कई मामलों में सिर्फ पांच दिनों में भी लक्षण सामने आए हैं। ऐसे में वायरस की तीव्रता भी अलग-अलग है।

}फैटेलिटी रेट

यानी मृत्यु दर। डबल्यूएचओ के अनुसार कोरोना की फैटेलिटी रेट 3.4 फीसदी है। हालांकि, 80 या इससे अधिक उम्र के मरीजों में 20 फीसदी तक मौतें हुई हैं। ईरान जैसे देश, जहां डॉक्टरी सुविधाएं अन्य देशों के मुकाबले थोड़ी कमतर हैं, वहां भी मौतें ज्यादा हुई हैं।

फैक्ट चेक. इस बीमारी से जुड़े वे दावे जिनकी हकीकत आपको पता होना चाहिए...

कोरोना डिक्शनरी. इस वायरस से जुड़े वो शब्द जो इस समय सबसे ज्यादा प्रयोग में हैं...

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2009 में स्वाइन फ्लू बना था महामारी

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