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अन्नदाता का एेसा कलेवा; पर्ची में ताे गुड़ और सब्जी मिलती है पानी जैसी दाल अाैर सूखी-कच्ची चपातियां

Bhilwara News - भास्कर संवाददाता | भीलवाड़ा मंडी में अाने वाले देश के अन्नदाताअाें यानि किसानाें काे मिलने वाला कलेवा उनके...

Oct 26, 2019, 07:20 AM IST
भास्कर संवाददाता | भीलवाड़ा

मंडी में अाने वाले देश के अन्नदाताअाें यानि किसानाें काे मिलने वाला कलेवा उनके अपमान से कम नहीं है। भीलवाड़ा की कृषि उपज मंडी में किसान कलेवा याेजना में अनुदान पर मिलने वाला खाना खाने लायक नहीं है। जिंस तुलने तक किसान इसे मजबूरी में खाता है। कई किसान ताे मंडी के बाहर हाेटलाें पर खाना खाते हैं। यह महंगा पड़ता है।

फसल बेचने कृषि उपज मंडियाें में अाने वाले किसानाें, पल्लेदाराें, वाहन चालकाें व अन्य श्रमिकाें काे मंडी में ही अच्छा अाैर सस्ता खाना देने के लिए राज्य सरकार ने किसान कलेवा याेजना चला रखी है। याेजना में किसानाें व अन्य से टाेकन मनी के रूप में 5 रुपए लिए जाते हैं। प्रत्येक थाली पर 35 रुपए का अनुदान है जाे कृषि विभाग वहन करता है। खाने की थाली में करीब 200 ग्राम अाटे की 6 चपातियां, दाल, माैसम के अनुरूप सब्जी, अक्टूबर से मार्च तक 25 ग्राम गुड़ अाैर अप्रैल से सितंबर तक 200 मिलीलीटर छाछ देने का नियम है। इस भाेजन से सामान्य व्यक्ति संतुष्ट हाे सकता है। लेकिन भीलवाड़ा में मिलने वाला खाना बेहद घटिया हाेता है। छह राेटियां जरूर मिलती हैं लेकिन वे बेहद पतली, सूखी अाैर अध कच्ची या जली हुई हाेती हैं। दाल काफी पतली अाैर बेस्वाद हाेती है। सब्जी अाैर गुड़ ताे इससे गायब ही है। काेटड़ी ब्लाॅक के गेगा का खेड़ा के हीरालाल शर्मा, उदयलाल मेवाड़ा, गाेपाल पंचाेली, जगन्नाथ गाडरी, प्रेमबाई गाडरी अादि किसान यहां से मंगलवार काे मक्का लेकर अाए थे। गुरुवार तक भी मक्का की नीलामी नहीं हुई थी। हीरालाल का कहना था कि सस्ता भाेजन उपलब्ध कराने की याेजना के नाम पर मजाक किया जा रहा है। याेजना का उद्देश्य ताे घर से दूर अाए किसानाें काे घर जैसा खाना उपलब्ध कराने का है लेकिन यहां जाे खाना मिल रहा है उसे खाने से ताे उल्टी हाेती है। जगन्नाथ गाडरी का कहना है कि यह खाना खाकर ताे बीमार हाे जाते हैं। त्याेहार से पहले किसान अपनी उपज बेचना चाहता है ताकि पैसा अाए अाैर घर-परिवार के लिए कुछ ले जा सके। इसलिए भीड़ है। न जाने कब उपज तुलेगी। तब तक एेसा खाकर ही भूख मिटानी पड़ेगी। बाहर हाेटल पर खा लें, इतना पैसा कहां? पहले ही अतिवृष्टि में अाधी से ज्यादा फसल बर्बाद हाे चुकी है।

बरामदे पर व्यापारियाें का अतिक्रमण, सड़क पर खराब होती है किसानों की उपज

कृषि उपज मंडी परिसर में बरामदे बने हुए हैं जाे किसान अपना माल रख सके। बरामदाें में व्यापारियाें का कब्जा है। नीलामी के बाद बाेरियाें में भरा माल बरामदाें रखा है। जबकि यह माल व्यापारियाें के गाेदाम में हाेना चाहिए। गाेदाम में जगह कम हाेती है या किराया लगता है इसलिए व्यापारी यहीं पर माल रखवा देते हैं। एेसे में किसानाें का माल खुले में सड़क पर फैला हाेता है। पक्षी, मवेशी खराब करते हैं। वाहनाें के अाने-जाने से भी काफी माल खराब हाे जाता है।

मंडी में बने बरामदाें में रखा व्यापारियाें का माल।

भास्कर संवाददाता | भीलवाड़ा

मंडी में अाने वाले देश के अन्नदाताअाें यानि किसानाें काे मिलने वाला कलेवा उनके अपमान से कम नहीं है। भीलवाड़ा की कृषि उपज मंडी में किसान कलेवा याेजना में अनुदान पर मिलने वाला खाना खाने लायक नहीं है। जिंस तुलने तक किसान इसे मजबूरी में खाता है। कई किसान ताे मंडी के बाहर हाेटलाें पर खाना खाते हैं। यह महंगा पड़ता है।

फसल बेचने कृषि उपज मंडियाें में अाने वाले किसानाें, पल्लेदाराें, वाहन चालकाें व अन्य श्रमिकाें काे मंडी में ही अच्छा अाैर सस्ता खाना देने के लिए राज्य सरकार ने किसान कलेवा याेजना चला रखी है। याेजना में किसानाें व अन्य से टाेकन मनी के रूप में 5 रुपए लिए जाते हैं। प्रत्येक थाली पर 35 रुपए का अनुदान है जाे कृषि विभाग वहन करता है। खाने की थाली में करीब 200 ग्राम अाटे की 6 चपातियां, दाल, माैसम के अनुरूप सब्जी, अक्टूबर से मार्च तक 25 ग्राम गुड़ अाैर अप्रैल से सितंबर तक 200 मिलीलीटर छाछ देने का नियम है। इस भाेजन से सामान्य व्यक्ति संतुष्ट हाे सकता है। लेकिन भीलवाड़ा में मिलने वाला खाना बेहद घटिया हाेता है। छह राेटियां जरूर मिलती हैं लेकिन वे बेहद पतली, सूखी अाैर अध कच्ची या जली हुई हाेती हैं। दाल काफी पतली अाैर बेस्वाद हाेती है। सब्जी अाैर गुड़ ताे इससे गायब ही है। काेटड़ी ब्लाॅक के गेगा का खेड़ा के हीरालाल शर्मा, उदयलाल मेवाड़ा, गाेपाल पंचाेली, जगन्नाथ गाडरी, प्रेमबाई गाडरी अादि किसान यहां से मंगलवार काे मक्का लेकर अाए थे। गुरुवार तक भी मक्का की नीलामी नहीं हुई थी। हीरालाल का कहना था कि सस्ता भाेजन उपलब्ध कराने की याेजना के नाम पर मजाक किया जा रहा है। याेजना का उद्देश्य ताे घर से दूर अाए किसानाें काे घर जैसा खाना उपलब्ध कराने का है लेकिन यहां जाे खाना मिल रहा है उसे खाने से ताे उल्टी हाेती है। जगन्नाथ गाडरी का कहना है कि यह खाना खाकर ताे बीमार हाे जाते हैं। त्याेहार से पहले किसान अपनी उपज बेचना चाहता है ताकि पैसा अाए अाैर घर-परिवार के लिए कुछ ले जा सके। इसलिए भीड़ है। न जाने कब उपज तुलेगी। तब तक एेसा खाकर ही भूख मिटानी पड़ेगी। बाहर हाेटल पर खा लें, इतना पैसा कहां? पहले ही अतिवृष्टि में अाधी से ज्यादा फसल बर्बाद हाे चुकी है।

ठेकेदार काे महंगा पड़ रहा, मंडी प्रशासन को ठेका छाेड़ने का किया अावेदन

कृषि उपज मंडी के सचिव महिपालसिंह ने कहा कि किसान कलेवा याेजना के कैंटीन संचालक काे 40 रुपए में खाना देना महंगा पड़ रहा है। किसान ताे सीजन पर ही मंडी में अाते हैं। बाकि दिनाें में कैंटीन ज्यादा नहीं चलती। उसने ठेका छाेड़ने के लिए अावेदन दे दिया है। हमने दूसरे नंबर के बाेलीदाता से संपर्क किया है।

समर्थन मूल्य पर खरीद अब तक शुरू नहीं हुई

खरीफ फसल की समर्थन मूल्य पर खरीफ अब तक शुरू नहीं हुई। दलहनी उपज व मूंगफली काे समर्थन मूल्य पर बेचने के लिए अाॅनलाइन पंजीयन 15 अक्टूबर से शुरू हाे चुका है। दलहन की 1 नवंबर से व मूंगफली की 7 नवंबर से खरीद हाेगी। किसानाें इन दिनाें माल मंडी में ला रहे हैं ताकि पैसा अाए ताे त्याेहार मना सके। त्याेहार के ठीक बाद रबी की बुअाई के लिए भी पैसा चाहिए। मक्का का समर्थन मूल्य अाैर खरीद की तारीख अभी घाेषित नहीं किया है।

भीलवाड़ा | मंडी में अाए काेटड़ी ब्लाॅक के गेगा का खेड़ा के किसान सड़क पर माल रखकर नीलामी के इंतजार में। (दाएं) कलेवा याेजना की पर्ची, जिसमें मीनू लिखा है लेकिन मिलती हैं केवल पतली दाल अाैर सूखी राेटियां।

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