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संत वही जो घृणित को महिमावान बना दें: मुनि संबोध

3 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता | भीलवाड़ा

संत वही जो घृणित को महिमा वान बना दे, ठोकर खाते पत्थर को भगवान बना दे। जिसके आने से मन बसंत हो जाए, जो रखे जहां कदम वही पंथ हो जाए, दरअसल वही संत होता है।

लाखों संत, हजारों परिवेश। टीवी के सामने बैठकर रिमोट के बटन दबाते हुए जितनी बार चैनल बदले... हर बार एक संत का नया चेहरा होता है स्क्रीन पर। कुछ सुर्खियों में कुछ गुमनाम। कुछ हिमालय की कंदराओं में तो कुछ आलीशान आश्रमों में, किसी का सफर मर्सिडीज में तो कुछ पदयात्री। एक इकलौता देश है हिंदुस्तान जहां दमियों बोलिया, सैंकड़ों धर्म, हजारों महात्मा और लाखों आस्था के केंद्र हैं, लेकिन सिर्फ कुछ हैं वो जिनके सामने दुनिया सच्चे मन से सर झुकाले। एक संत जिसने अपने संतत्व को समूची मानवता के लिये समर्पित कर दिया, बासठ सालों से जिन्होंने खुद सीखकर पुरी कायनात को सिखाया कि ताकत सब कुछ नहीं होती... प्रेम और सद्भावना उसे पूरा करता है। पांव-पांव की यायावरी में समूचे भारत को पांवों से मापकर अनगिनत लोगों से उनकी बुरी ऐब छीन ली। हजारों विद्यालयों में दस्तक दी और आने वाले कल को उनके सपनों के बीच आने वाले अंधेरों को रोशनी में बदलने का रास्ता दिखाया। हजारों को कर्म से जैनत्व का नाम दिया।

आचार्य तुलसी ने बोरावड़ में मुनि सुरेश कुमार को दी थी जैन दीक्षा ... नागौर जिला नौ कोठी मारवाड़ के एक छोटे मगर रानी बाई की आस्था से लबरेज गांव “हरनावां” में सेठ बुद्धमल व गेकी देवी गेलड़ा के नौ संतानों में छठे र| संपत कुमार गेलड़ा को अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य तुलसी ने बोरावड़ में जैन मुनि दीक्षा देकर आध्यात्मिक नाम दिया मुनि सुरेश कुमार। सीरत से सरल, सहज मुनि सुरेश कुमार ने देखी है तेरापंथ के तीन आचार्यों की अनुशासना और पाया 42 वर्षों तक आगमज्ञ, रहस्य विद मुनि सुमेरमल “सुमन” का साया। प्रगति की मंजिल की ओर रोज एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए हरियाणा में आचार्य महाप्रज्ञ से ग्रुप लीडर का वर्धापन मिला। तो आचार्य महाश्रमण ने जिनशासन और तेरापंथ धर्मसंघ के गौरव को ऊंचा आसमान होने के लिए गोवाहटी (असम) में “शासन श्री “ अलंकरण का सम्मान दिया।

महामुनि ही संतत्व को परिभाषित करते हैं | जब आतंकवाद के निशाने पर पंजाब था। जब जैन श्रावक के अंतिम मनोरथ संथारा को अदालत के कठघरे में घसीट कर राष्ट्रीय मुद्दा बनाया गया तो समता के साधक ने यह भुलकर कि वो किस जैन आम्ताय के संत है। बस अपनी सकारात्मक अदाकारी निभाते रहे। एेसे महामुनि ही संतत्व को परिभाषित करते हैं और संतत्व इन्हें पाकर रोज गौरवान्वित होता है। रात दस बजे सोना और सुबह तीन बजे जागरण, साधना और योग की पिछले 50 सालों की खूबसूरत आदत जीवन के आठवें दशक में भी शिख से बसंत तक आरोग्य की यात्रा, उस युवा पीढ़ी के लिए एक महान प्रेरणा है जो देर रातों तक काम करने, मनोरंजन करने और पढ़ने में निवेश करके अगली सुबह सूरज की पहली किरण को खुद में समेटने के बजाय सुबह 10-11 बजे आंखें खोलते हैं। न जीने की जिजीविषा न मरने का खौफ, न किसी से मोह न किसी का विद्रोह, न कोई अपना, न कोई बेगाना। पूरी सृष्टि को यही संभाव परोसते-परोसते जिन्होंने अपने द्विज के पहले पड़ाव के 77 साल पार कर 78वें वर्ष की देहली पर दस्तक दे रहे हैं, एेसे निष्काम, निर्मोही, विधुर्म ज्योति साधक मुनि सुरेश कुमार के चरण सरोवरों में अंतहीन, असीम मंगलभावना अर्पण।

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