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चींटियों को समर्पित डेढ़ सौ बीघा जमीन प्रतिदिन चार सौ किलो का कीड़ीनगरा

भीनमाल उपखण्ड मुख्यालय से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित निंबावास गांव में एक स्थान ऐसा है जहां चींटियों को दाना...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 16, 2018, 02:30 AM IST

भीनमाल उपखण्ड मुख्यालय से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित निंबावास गांव में एक स्थान ऐसा है जहां चींटियों को दाना डालने के लिए हर पूर्णिमा व अमावस्या को मेले सा माहौल बनता है। यहां चीटियों को दाना डालने के लिए जालोर जिले के अलावा मारवाड़ क्षेत्र से दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते है। लगभग डेढ़ सौ बीघा क्षेत्र में आपको सिर्फ चींटियां ही दिखाई देगी। इस स्थान पर हर रोज करीब चार क्विंटल दाना चींटियों को डाला जाता है। श्रद्धालुओं की आस्था को देखते ग्रामीणों ने कीड़ीनगरा नाम से पहचान बने इस स्थल के चहुंओर तारबंदी भी कर दी है, ताकि किसी प्रकार के अन्य जानवर चींटियों को परेशान न कर सके।

पूर्णिमा व अमावस्या को बनता है मेले सा माहौल : निंबावास गांव में चीटियों के इस स्थल पर हर पूर्णिमा व अमावस्या को मेले सा माहौल रहता है। सुबह से लेकर शाम तक यहां लोग चीटियों को दाना देते नजर आते है।



यहां आने वाले श्रद्धालुओं में महिलाओं की संख्या अधिक रहती है। चीटियों को दान करने के पश्चात महिलाएं भजन-कीर्तन करती है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं में सिरोही, बाड़मेर, पाली जिले भी सम्मिलित है। लोग जैसे ही स्थल के बारे में सुनते है तो यहां पहुंच कर चीटियों के दान के लिए आतुर रहते है।

आस्था ऐसी कि अमावस्या व पूर्णिमा को भरता मेला, 15 दिन का अनाज रहता है स्टॉक में

भीनमाल. कीड़ी नगरा जाने के लिए लगाया बोर्ड व नवनिर्मित पेयजल टंकी।

चींटियों को दाना : रहता है 15 दिनों का स्टॉक

चीटियों को दान करने के लिए लोग अनाज, कूलर इत्यादि कट्टों में भरकर यहां लेकर आते है। भीनमाल के भामाशाह नाहर परिवार, लुकड़ परिवार भी हर 15 दिन में चीटियों के लिए दाना भिजवाते है। यहां दाना एकत्रित करने के लिए गोदाम भी बनाए हुए हैं। इस तरह यहां इतना दान इकट्ठा हो जाता है कि १५ दिनों तक आसानी से चलता है। आगामी पूर्णिमा व अमावस्या पर फिर दान इकट्ठा हो जाता है इस तरह से यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है।

मान्यता : साधारण से काफी बड़े आकार की चींटियां हैं यहां

पिछले 4 सालों में यहां आने वाले श्रद्धालुओं में काफी इजाफा हुआ है। निंबावास गांव के करीब डेढ़ सौ बीघा से अधिक गोचर पर फैली इन चीटियों के स्थल को स्थानीय भाषा में ‘कीड़ी नगरा’ कहा जाता है। इस स्थल की विशेषता यह है कि यह चींटियां आम चीटियों की तुलना में आकार में बड़ी है।

लोगों की मान्यता है कि इनको आहार देने से दुखों का निवारण होने के साथ सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। आस्था के चलते दूर-दराज से लोग यहां अनाज, चूरमा, शक्कर, दलिया, बिस्किट इत्यादि लेकर पहुंचते रहते है।

सहयोग : भामाशाह आ रहे आगे

करीब 150 बीघा जमीन पर फैले चीटियों के इस स्थल पर अब भामाशाहों के सहयोग से पर्याप्त सुविधाएं भी मुहैया करवाई जा रही है। स्थल के चारो तरफ अब तारबंदी कर इसे सुरक्षित किया गया है। यहां पर पेयजल के लिए टंकी व श्रद्धालुओं के बैठने के लिए टीनशेड भी बनाया गया है।

दूर-दूर से पहुंचते है श्रद्धालु

इस गोचर में भारी संख्या में बड़ी चींटियों होने के कारण लोग यहांं दान करने के लिए पहुंचते है। दूर-दूर तक दूसरा ऐसा कोई स्थल नहीं है। यहां पूर्णिमा व अमावस्या को मेले सा माहौल रहता है। पिछले 4 सालों में यहा भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। चीटियों के साथ-साथ गायों को भी चारा दान किया जाता है। -गजेंद्रसिंह राणावत व गुमानसिंह निंबावास

आसपास ऐसी जगह नहीं होने से चींटियों को दाना देने के लिए यहां जालोर जिले सहित पाली, सिरोही जिले से भी लोग पहुंच रहे है। ग्राम पंचायत व भामाशाहों के सहयोग से अब यहां पानी, छाया की सुविधा भी उपलब्ध है। यहां हर रोज चींटियों को अनाज, चूरमा इत्यादि दान किया जाता है। - महेंद्रसिंह राणावत, निंबावास

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