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हाेली पर गांव छाेड़ पूर्व दिशा में इकट्ठे हाेते हैं भिवाड़ी गांव के लाेग, गायन कर सुनाते हैं महाभारत के प्रसंग

एक वर्ष पहले
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रंग गुलाल अाैर अबीर उड़ने लगे ताे लगने लगता है कि रंगाें का त्याैहार हाेली अा गया, लेकिन औद्योगिक नगरी भिवाड़ी में ताे अजब-गजब परंपरा है, यहां ताे ग्रामीण गांव से बाहर निकलते हैं तब लगता है कि हाेली है। सैकड़ाें साल से गांव छाेड़ने की परंपरा अभी भी जीवित है। जिसमें गांव के बच्चे, जवान अाैर बुजुर्ग सभी शामिल हाेते हैं अाैर पूर्व दिशा में शाम के समय एकत्रित हाेते हैं। हालांिक क्याें हाेते हैं इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं रहती। पूर्णिमा वाले दिन भिवाड़ी गांव के सभी ग्रामीण चाैपाल पर एकत्रित हाेकर दाेपहर 12 से शाम काे 5 बजे तक हाेली गायन करते हैं। पूर्व प्रधान घनश्याम तंवर बताते हैं कि हाेली गायन में भी यहां सिर्फ महाभारत के प्रसंग गाए जाते हैं। हाेली गायन शाम काे पांच बजे तक चलता है। इस दाैरान गांव का खाती अपने घर में पूजा करता रहता है। हाेली गायन में से कुछ लाेग खाती के घर जाते हैं अाैर उसे लेकर अाते हैं। खाती काे हनुमान का भक्त माना जाता है। खाती अाता है अाैर हाेली गायन मंडली के बीच में दाेनाें हाथ ऊपर कर देता है, इस इशारे के बाद हाेली गायन समाप्त हाे जाता है। इसके बाद सभी ग्रामीण दौड़ते हुए पूर्व दिशा की अाेर जाते हैं। इस बार साेमवार काे पूर्णिमा है। साेमवार काे पूर्व दिशा में दिशा शूल रहता है, इसलिए दक्षिण में हाेते हुए पूर्व में एकत्रित हाेंगे। पहले समय गांव से बाहर निकलकर लाेग घुड़दाैड अाैर ऊंटदाैड़ करते थे, ये परंपरा अभी भी कायम है अाैर लाेग अब स्टेडियम स्थल पर घुड़दाैड़ करते हैं। सतीश तंवर मुकदम बताते हैं कि खेल प्रतियाेगिता के बाद खेजड़ी जांट के पेड़ पर फायरिंग करने की परंपरा थी, जिसे गत वर्ष से बंद कर दिया गया है। अब फायरिंग की जगह पटाखे चलाए जाते हैं। इसके बाद शुभ मुहुर्त में हाेली दहन हाेती है। पूर्णिमा काे घर में सुबह ग्राम देवता भंइया काे चावल-बूरा, चूरमा अाैर खीर से भाेग लगाया जाता है। दूसरे दिन धुलंड़ी काे 12 बजे तक हाेली खेलते हैं, दाेपहर में अाशियाना विलेज के पीछे ठाकर द्वारा गांव के पंड़िताें की समाध पर भाेग लगाने जाते हैं। प्रसाद बांटते हैं। एेसा माना जाता है कि वहां ठाकुरजी का निवास है। वहां ठाकुरजी के पुजारियाें की समाधि है।

हाेली पर हाेनी वाली खेल प्रतियाेगिता में घुड़दाैड़ काे देखते ग्रामीण।
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