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बीकानेर राज्य में ‘दीवान’ के पद के प्रभावशाली बनने की यात्रा

4 वर्ष पहले
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बीकानेर राज्य की प्रशासनिक-व्यवस्था से जुड़ी बहियों का अध्ययन करने पर हमारी जानकारी में यह तथ्य भी आता है कि, कभी-कभी इस महत्वपूर्ण पद को शासक के “कामदार’ या “प्रधान’ के नाम से भी जाना गया। जब कभी इस पद के लिए प्रधान शब्द या संबोधन का प्रयोग किया गया तब हमें यह स्वीकार करने से ऐतराज नहीं होना चाहिये कि ऐसा जोधपुर-प्रशासन के प्रभाव स्वरूप किया गया होगा। यहां पर हमें इस तथ्य को भुलाना नहीं चाहिये कि बीकानेर राज्य का पितृ-राज्य जोधपुर ही था और बीकानेर राज्य के संस्थापक नरेश राव बीका, जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के पुत्र थे तथा जोधपुर से आकर उन्होंने इस संभाग में बीकानेर नाम नये राज्य की संस्थापना की थी। जोधपुर से आते समय वे अपने साथ जो कुछ लेकर यहां आए थे, उसमें जोधपुर की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रभाव भी निश्चित रूप से शामिल था।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस पद के गौरव, गरिमा तथा सम्मान का सीधा तथा प्रत्यक्ष संबंध शासक के गौरव और सम्मान से जुड़ा रहा था। बीकानेर राज्य की संस्थापना के बाद के प्रारंभिक दौर में इस पद का गौरव, सम्मान तथा गरिमा कोई खास नहीं रही थी। इसका कारण यह रहा कि उस दौर में तो बीकानेर के शासकों को भी अपने राजपद के गौरव तथा सम्मन को हासिल करने के लिए बड़ी ही जद्दोजहद तथा संघर्ष करना पड़ा था।

ज्यों-ज्यों इस नवस्थापित राज्य में शासक की स्थिति सुदृढ़ होती चली गई और शासक पद की गरिमा एवं प्रतिष्ठा कायम होती हुई दृष्टिगत हुई, त्यों-त्यों शासक के कामदार की स्थिति तथा उसके पद की गरिमा में भी अभिवृद्धि होती दिखाई देने लगी। बीकानेर राज्य का पहला दीवान कर्मचंद्र बच्छावत था, जिसने राजा राय सिंह के दीवान की हैसियत से राय सिंह के शासनकाल के दौरान अपरिमित शासन शक्तियों का इस्तेमाल किया और दीवान के पद को कई अर्थों से गौरवांवित होने का अवसर सुलभ कराया। (लगातार)

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