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धनंजय वर्मा बोले, म्हारी गाय तो बाखड़ी है...

Bikaner News - होली पर कवि सम्मेलन हो रहा था। संचालन कर रहे थे लोकप्रिय हास्य कवि भवानी शंकर व्यास विनोद। उन्होंने सुरीले गीतकार...

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2018, 02:25 AM IST
धनंजय वर्मा बोले, म्हारी गाय तो बाखड़ी है...
होली पर कवि सम्मेलन हो रहा था। संचालन कर रहे थे लोकप्रिय हास्य कवि भवानी शंकर व्यास विनोद। उन्होंने सुरीले गीतकार धनंजय वर्मा को मंच पर आमंत्रित करने से पहले भूमिका बनाते कहा- धनंजय जी और उनकी रूपमाधुरी रात को एक- एक गिलास दूध पिया करते हैं। एक दिन धनंजय जी की गिलास का दूध बिल्ली पी गई तब उनकी रूपमाधुरी जी ने मासूमियत से कहा सुनो जी थारो दूध तो बिल्लड़ी पियगी... थे म्हारों पी लो। इस द्विअर्थी संवाद पर श्रोताओं की हंसी फूट पड़ी। किंतु मंच पर माइक के सामने पहुंच धनंजय वर्मा ने अपने गंभीर अंदाज में जवाब दिया- भवानी शंकर जी ठा हुवैला के म्हारी गावड़ी तो बाखड़ी है। दूध कोनी देवे। (एक युवा कवि की ओर इशारा कर) आ रीं गाय सुवावड़ी है। दूध सांतरों देवें। ए पीवंता हुवैला... धनंजय जी का इतना कहना था कि तालियों की बौछार शुरू हो गई।

हिरोइन को ले उड़े लड़के

होली के आसपास का समय। नाटक मंडली नाटक खेल रही थी। दर्शकों में डूंगर कॉलेज के छात्र भी थे। तब डूंगर कॉलेज आज की फोर्ट स्कूल में लगती थी। स्टेज पर मनमोहक मेकअप के साथ नाटक की हीरोइन का प्रवेश। उसे देखते ही सीटियां बजने लगी। हीरोइन ने बांकी मुस्कान फेंकी। डूंगर कॉलेज के लड़के देखते देखते स्टेज पर पहुंचे और हीरोइन को उठाकर ले गए। जब सच्चाई का पता चला तो बहुत शरमाए लड़के क्योंकि जो हीरोइन थी वह मादा नहीं नर था। और वह थे उस समय के बहुत अच्छे रंगकर्मी आत्माराम। संवित् सोमगिरी जी महाराज के बड़े भ्राता। वह नायिका का ऐसा रूप धारण करते थे कि सबको यही लगता कि वह चित्तचोर युवती ही है।

अररर पर्दा बंद करो

बीकानेर में पहली बार स्टेज पर नारी पात्र। इससे पहले नाटकों में पुरुष ही नारी पात्र निभाते थे। गजब रोमांच। दर्शकों की अपार भीड़। पर्दा खुलने का सबको इंतजार देखें कैसा जलवा होगा उसका इंतजार समाप्त पर्दा खींचा जाने लगा लेकिन यह क्या पर्दे के साथ-साथ अभिनेत्री की साड़ी भी ऊपर जाने लगी दशक अजब अनुवाद में किंतु इसी बीच आयोजक का ध्यान गया और वह चिल्लाया गड़बड़ हो गई पर्दा बंद करो जल्दी बंद करो और फुर्ती से पर्दा पुनः बंद कर दिया गया

शीशी बट्टा सौ

बीकानेर महामूर्ख कवि सम्मेलन कराने में सिरमौर समाजसेवी बृजु भा कवियों के संग चाय पत्ती में गप्प गोष्टी कर रहे थे। चाय का आर्डर एक कवि की ओर से था। पहले पहल चार महाशय थे। इसलिए कविराज ने दो बट्टे चार का आर्डर मारा। कवियों की संख्या के साथ साथ बट्टा बढ़ता रहा। आंकड़ा दो बट्टे आठ तक पहुंच गया। सभी ने चाय के घूंट लिए और उठने लगे तो बृजु भा ने घर पर कल के लिए चाय का आमंत्रण दिया। दूसरे दिन अच्छी तादाद में कविगण उनके आवास पहुंच गए। जब सब आ चुके तब उन्होंने चाय के लिए आवाज दी। चाय एक शीशी में आई और साथ में ड्रापर। सब अचंभे में। ऐसे कैसे? तब बृजु भा ने गंभीरता तोड़ते कहा- कल दो बट्टा आठ चाय पी। आज शीशी बट्टा सौ चाय पिएंगे। सीसी में से शिप मारिए और चाय का आनंद लीजिए। कविगण खिसियानी हंसी हंस कर रह गए।

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