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राज्यों में उत्तरदायी शासन की मांग

शीघ्र ही एक नया विकासक्रम भी देखने में आया, जिसकी चर्चा भी यहां पर अपनी प्रासंगिकता रखती है। सन् 1928 में इंडियन नेशनल...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 18, 2018, 03:10 AM IST

शीघ्र ही एक नया विकासक्रम भी देखने में आया, जिसकी चर्चा भी यहां पर अपनी प्रासंगिकता रखती है। सन् 1928 में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने प्रस्तावित भारतीय संघ के लिए संविधान का प्रारूप तैयार किया। उसने एक प्रस्ताव पारित कर भारतीय राज्यों के शासकों से यह अनुरोध किया कि वे अपने-अपने राज्यों में उत्तरदायी शासन की स्थापना करें। यहीं नहीं, इस प्रस्ताव में शासकों से इस आशय का अनुरोध भी किया गया कि वे अपनी प्रजा के मौलिक अधिकारों की उचित रक्षा किए जाने की व्यवस्था भी करें।

कांग्रेस ने राज्यों की जनता के उत्तरदायी शासन के लिए किए जा रहे शांतिपूर्ण तथा उचित संघर्ष में अपनी सहानुभूति भी प्रकट की। कांग्रेस संविधान से वह धारा जो राज्यों में हस्तक्षेप के विरुद्ध थी, निकाल दी गई। इसे एक ऐतिहासिक विकास क्रम के रूप में रेखांकित किया जा सकता है, जिससे राज्यों में जनप्रतिनिधियों को मौलिक अधिकारों तथा प्रजातंत्रात्मक संस्थाओं की स्थापना के लिए संघर्ष करने के लिए नैतिक समर्थन मिला। सन् 1929 में इंडियन स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस ने अपने अधिवेशन में राज्यों के लिए पृथक्क स्वतंत्र न्यायपालिका, राजाओं के व्यक्तिगत खर्चे को प्रशासनिक खर्च से पृथक्क रखने तथा प्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना पर अधिक बल दिया। स्थूलत: यह कहना गलत नहीं होगा कि राज्यों में प्रतिनिधिक संस्थाओं की स्थापना का संघर्ष एक प्रकार से अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का ही एक भाग था। (लगातार)

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