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बीकानेर के हिसामुदीन उस्ता को उस्ता कला पर अर्पित किया गया पद्मश्री सम्मान

‘कद आवैला खरूंट’ कवि-कथाकार राजेंद्र जोशी का पहला राजस्थानी कविता संग्रह है। इससे पूर्व हिंदी में उनके तीन...

Danik Bhaskar | Sep 13, 2018, 02:51 AM IST
‘कद आवैला खरूंट’ कवि-कथाकार राजेंद्र जोशी का पहला राजस्थानी कविता संग्रह है। इससे पूर्व हिंदी में उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं। राजेंद्र जोशी संवेदनशील मन के कवि हैं और वे अपने मन में उठते भावों को बखूबी चित्रित करते हैं। इसलिए वे अपने इष्ट से सवाल करने से भी नहीं चूकते, वहीं मातृभाषा राजस्थानी को अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिल पाने की पीड़ा को भी मार्मिकता से उजागर करते हैं। उनका कवि - मन गरीब-दलित-दमित की पीड़ा को अनुभूत कर द्रवित होता है और चाहता है कि इन लोगों के मन में रिसते पीड़ा के घाव जल्दी भरें और उन पर जल्दी से जल्दी खरूंट आये ताकि वे भी आराम की जिंदगी बसर कर सकें। विविध भाव-भंगिमाओं से ओतप्रोत इस कविता संग्रह का राजस्थानी साहित्य जगत में भरपूर स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है ।

पुस्तक : शेखावटी के िभत्तििचत्रों का सामािजक और सांस्कृितक अध्ययन

लेखक : रीतेश व्यास

प्रकाशक : यूनिवर्स बुक कार्नर, बीकानेर

संस्करण : 2018 मूल्य : 325 रुपए

आमजन का साथी और हमदर्द होता है नुक्कड़ नाटक

नाटक के जरिए जनता को जाग्रत करने के कई माध्यम हैं, उनमें से एक माध्यम नुक्कड़ नाटक है । आम जनता के बीच ज्वलंत समस्याओं को उठाकर समाधान करना नुक्कड़ नाटक का उद्देश्य होता है। भारत में आजादी से पहले और उसके बाद कई ऐसे आंदोलन हुए जिनमें नाटकों, विशेषकर नुक्कड़ नाटकों को विशेष ध्यान मिला। बंगाल के अकाल के समय, देश की आजादी के आंदोलन में और आपातकाल में नुक्कड़ नाटकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बीकानेर में सन 1980 में एनएसडी के वागीश कुमार सिंह ने बादल सरकार के लिखे नुक्कड़ नाटक के विभिन्न जगहों पर 25 शो किये । सन 2008-09 में हमने रेलवे की तरफ से राजस्थान के विभिन्न शहरों में तथा 2010-11 में बीकानेर मंडल के स्टेशनों, रेलवे क्रॉसिंग, मंडियों, पेट्रोल पंपों आदि के पास सतर्कता विषय पर लोगों को जाग्रत करने के लिए करीब 150 शो किए। एक और जहां मंच पर किए जाने वाले नाटक सभ्रांत दर्शक को केंद्र में मानकर किए जाते हैं, वहीं नुक्कड़ नाटक साधारण आदमी को ध्यान में रखकर । इन नुक्कड़ नाटकों में दर्शकों से सीधा संपर्क किया जाता है। देखने वाले नाटकों के पात्रों में अपने को ढूंढते हैं और नाटक के पात्र उनके जीवन की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समस्याओं को दिखाते हैं। लेकिन आज हम नुक्कड़ नाटकों को देखें तो थोड़ी चिंता होती है। ढेरों नुक्कड़ नाटक हो रहे हैं । सरकारें भी उन्हें खूब बढ़ावा दे रही है। सरकारी अनुदान लेकर सरकार द्वारा दिए गए विषयों पर नारेबाजी और भाषण भरे उपदेशात्मक नुक्कड़ नाटक करके खानापूर्ति की जा रही है। इस वजह से नुक्कड़ नाटक अपना महत्व खोते जा रहे हैं ।एक अच्छा नुक्कड़ नाटक लिखना और करना उतना ही मुश्किल है जितना स्टेज पर कोई नाटक करना। नुक्कड़ नाटक बहुत सशक्त माध्यम है । उसे लोगों का साथी और हमदर्द बनाना चाहिए ताकि उन्हें अपने जीवन में नई रोशनी मिले । अपने जीवन, समय और समाज को बदलने की इच्छा पैदा हो । उसके लिए वह अपने में संघर्ष की शक्ति का अनुभव करे तभी वह अपने सार्थक भविष्य की नींव रख पाएगा ।

विनोद भटनागर

यहां भेजें अपनी रचनाएं

भित्ति चित्रों के प्रति आरंभ में ही मानव में आकर्षण रहा है। इसके माध्यम से हम तत्कालीन सभ्यता एवं मानवीय संस्कारों से परिचित होते रहे हैं। इतिहास लेखक एवं प्राध्यापक डाॅ. रीतेश व्यास ने “शेखावाटी के भित्ति चित्रों का सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन’ पुस्तक में राजस्थानी की चित्रकला के उद्‌भव और विकास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी के साथ भित्ति चित्रों की परम्परा और शेखावाटी भित्ति चित्रों की तकनीक, उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक पक्ष का विशद विवेचन किया है। शेखावाटी के प्रमुख भित्तिचित्रों की उपलब्धता के मानचित्र एवं उनके छाया चित्र होने से यह पुस्तक संग्रहणीय बन गई है।

पुस्तक : कद आवैला खरूंट

लेखक : राजेंद्र जोशी

प्रकाशक : ऋचा इंडिया पब्लिशर्स, बीकानेर

संस्करण : 2018 मूल्य : ₹200 रुपए

आपकी अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएं भास्कर कार्यालय, कीर्ति स्तंभ पर या e-mail : shabdrang@dbcorp.in पर भेज सकते हैं। पेज से जुड़ी प्रतिक्रियाएं एवं सुझाव इसी मेल आईडी पर भेज सकते हैं।

गंभीर आलोचना की प्रतीक्षा में राजस्थानी साहित्य

राजस्थानी ही नहीं भारतीय और विश्व भाषाओं में विपुल सृजन की तुलना में आलोचना का अनुपात कम है। यह कमी राजस्थानी के संदर्भ में अत्यधिक लगेगी यदि हम आलोचना से हमारे अनपढ़ और साक्षर आलोचकों को बाहर कर देंगे। आलोचक बहु-पठित, बहु-श्रुत और कुशाग्र बुद्धि संपन्न व्यक्तित्व होना चाहिए अन्यथा हमारी सारी अपेक्षाएं बेकार हैं।

राजस्थानी साहित्यकारों को चाहिए कि अपने लेखन का प्रति वार्षिक आकलन स्वयं करें कि उन्होंने कितना-क्या लिखा है। क्या उनका यह अवदान पर्याप्त है? लेखक लिखता है क्योंकि उसके पास जीवन का विशद अनुभव और दृष्टि है, जबकि आलोचक का काम किसी कृति के सिर्फ गुण-दोष, पसंद-नापसंद और कथ्य का सारांश लिखना भर नहीं है। साहित्य अगर अपने पाठकों को नवीन दृष्टि और विचार देता है, तो इसी तर्ज पर आलोचना को भी अपनी व्यापकता अवधारणों-विचारधारों और उपादेयता के संदर्भ में विचार करते हुए मौलिकता को सृजित करना चाहिए। जब कि हो यह रहा है कि अपनी मातृ-भाषा और साहित्य के प्रति प्रतिबद्ध लेखक प्रतिकूलताओं से जूझते हुए निरंतर सृजनरत हैं, वे प्रकाशन के मोर्चे पर भी सक्रिय हैं। एक ओर राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए राजस्थानी लेखक वर्षों से संघर्षरत है, वहीं दूसरी ओर वह विभिन्न विधाओं में सृजन करते हुए राजस्थानी साहित्य को समृद्ध करने में लगा है। प्रकाशकों की उदासीनता के कारण अधिकांश राजस्थानी लेखकों को अपने खर्चे से पुस्तकें छपवानी पड़ती है।किंतु उनकी किताबें पाने वाला पाठक अथवा कहा जाए लेखक-मित्र किताबों को बिना पढ़े ही बोलता-लिखता है। माफ करें- बहुत खूब, शानदार, बधाई और शुभकामनाओं से आगे का रास्ता आलोचना का है। राजस्थानी में आलोचना साहित्य बहुत कम है और अगर विशद चिंतन अथवा विचारधाराओं के तात्विक विवेचन और जीवन-दृष्टि मूल्यांकन परक आलोचना-दृष्टि की बात करें तो हम बहुत पीछे हैं। हमारे पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण यह भी है कि सच्ची आलोचना और गरिष्ट आलोचना लेखक पचा नहीं सकते हैं।

बहुधा संबंधों में कटुता आ जाती है। यही कारण है कि आलोचना के नाम पर पुस्तक सारांश अथवा कतिपय वर्णय-विषय का उल्लेख ही आलोचना माना जाने लगा है। हमारी विशद परंपरा और आधुनिक विकास के परिपेक्ष्य में आलोचक को देखने-परखने का काम संभालना होगा। एक-दो कविताएं लिख कर कोई अपने को कवि समझने की भूल कर सकता है, किंतु आलोचक एक-दो समीक्षाएं लिखकर खुद को आलोचक समझने की भूल नहीं करे तो बेहतर होगा।

लघु कथा

एक फिल्म का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारी ने अपने दल के वरिष्ठ सदस्य को फोन लगाया- हेलो भैयाजी, जहां हम प्रदर्शन कर रहे हैं उस रास्ते से किसी स्कूल की तीन बसें जा रही हैं तो क्या हम सब किसी और जगह जाकर प्रदर्शन करें? उधर से भैयाजी का जवाब आया-अरे नहीं नहीं.. कहीं जाने की जरूरत नहीं है .. कुछ डंडे और पत्थर उन बसों पर ही मार दो और जरूरत लगे तो ड्राइवर को भी एक दो थप्पड़ मार देना... इससे हमारे विरोध की गूंज बहुत दूर तक सुनाई देगी.. थोड़ी देर बाद भैयाजी का फोन दोबारा बजा। उधर से उनकी प|ी फोन कर रही थी - अजी सुनिए, आज मुन्ना की स्कूल बस पर किसी ने पत्थरों से हमला कर दिया जिससे मुन्ना और बस में बैठे कुछ बच्चों के चोट लगी है ... मैं हॉस्पिटल में हूं.. डॉक्टर साहब कह रहे हैं कि मुन्ने के बहुत गहरी चोट लगी है ...आप जल्दी आइए... हेलो हेलो अरे कोई जवाब तो दीजिये।

डॉ. श्रेयांश गुप्ता

बीकानेर

गुरुवार

13 सितंबर 2018

शब्दरंग

गूंज

राजस्थानी में आलोचना साहित्य बहुत कम है और अगर विशद चिंतन अथवा विचारधाराओं के तात्विक विवेचन और जीवन-दृष्टि मूल्यांकन परक आलोचना-दृष्टि की बात करें तो हम बहुत पीछे हैं।

डॉ नीरज दइया

कहना तो पड़ेगा

मायड़ भाषा

आज राजस्थानी भासा री मानता सारू सरकार माथै दबाव बणायो जा रैयो है। राजस्थान सरकार साम्ही इण बात री मांग लगोलग उठाई जा रैई है कै इण नैं राजभासा घोषित करी जावै ताकि राजस्थान मांय इण भासा पेटै रोजगार रा साधन ढूकै। आज इण भासा री मानता सारू संघर्ष चाल रैयो है। इण बात री आस अर उडीक सगल़ा नैं है कै सरकार इण मांग नैं पूरसी। बरसां पैली जिका सुपनाे अठै रा साहित्यकारां देख्यो बो जरूर पूरो होसी। आ बात मन मांय जरूर खटकै कै आपां बात तो मानता री करां पण घर मांय ई इण भासा रो अनादर करां। आपानैं दूजी भासा नैं जाणनो अर समझणो चाहिजै पण इण बात रो भी ध्यान राखणो चाहिजै कै आपां री भासा रो मान कठै आपां तो कोनी गुमावां ? आज आपानै आपणी भासा रो मान राखणो पड़सी अर पछै मानता री बात करणी पङसी।

चन्द्रकला रंगा

आपां तो राखां मायड़ रो मान

राजस्थानी क्षणिकावां

डॉ घनश्याम नाथ कच्छावा

कंचन काया

कैवेै है/जीवण नै लोग / कंचन काया।

हुवै है/ बा तो काेरी/ माटी री माया।।

काळ

खिलै जद

जीवण रो फूल

भँवरौ बण’र

मंडरावै काळ ।

बैठ’र अेक दिन

फूल रै ऊपरां

पी ज्यावै प्राण ।।

बीकानेर में पहली बार पूर्णत: मौलिक एवं अप्रकाशित साहित्यिक रचनाएं, व्यंग्य, स्मृतियां सिर्फ भास्कर में...

उलटबांसी

शोक सभा चल रही है

उनके विराट व्यक्तित्व को शब्दों में बांधने की सामर्थ्य मुझ में क्या, किसी में नहीं है। वे अपनी अंतिम सांस तक समाज के सभी वर्गों के उत्थान में लगे रहे। समाज सेवा का जैसा जज्बा और समर्पण उनमें था, वैसा मैंने आज तक किसी में नहीं देखा। उनका यूं अक्समात चले जाना पूरे देश के लिए अपूरणीय क्षति है ।

शोक सभा चल रही है । समाजसेवी जी का स्मरण किया जा रहा है। समाजसेवी जी सच में अक्समात चले गए। मात्र नब्बे बसंत देख पाए । अभी तो उन्हें बहुत कुछ करना था। समाज के विकास के लिए उनके मन में अखूट सपने थे। उनके यूं अचानक चले जाने से अब उनके अधूरे सपने कौन पूरा करेगा। सच में, उन्होंने समाज सेवा में अपना जीवन होम दिया था। अनेक कष्ट सहे। बहुत विरोध सहा। किंतु वे अपने पथ से डिगे नहीं। विरोधियों का मुंह बंद करते रहे। समाज का कल्याण करते रहे। उन्होंने कैसीनो यानी जुआघरों का सफल संचालन किया। ऐसे सुरक्षित स्थानों पर, जहां जुआ जैसे महाभारत कालीन धंधे को निर्बाध चलाने में किसी भांति की बाधाएं न आएं। वैसे सब भांति की बाधाओं के निवारण में उन्हें महारत थी। नेता, पुलिस, अफसर, प्रशासन वगैरह सबसे बना कर चलते थे। नियम- कानून बताने वालों को खुश करना भी वे बखूबी जानते थे। क्योंकि उन का मूल लक्ष्य समाज सेवा था। साम, दाम, दंड , भेद यानी सब भांति के अस्त्र - शस्त्र प्रयुक्त करते हुए वे दत्तचित भाव से समाज सेवा में लगे रहे।

उन्होंने जुए के धंधे में बुजुर्ग और युवा ही नहीं , किशोरवय की नई पौध को पारंगत करने में भी सराहनीय कार्य किया। बेरोजगारी से संत्रस्त शिक्षित युवाओं का डिप्रेशन उन्हें डिप्रेशन में ला देता था। वे जानते थे कि डिप्रेशन में युवा वर्ग असामाजिक कुकृत्यों में लिप्त हो सकता है। आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा सकता है। इसलिए उन्होंने शहर के बाहर हुक्का बार खोले ताकि हुक्के की नली से मुंह लगाकर युवा अपने भविष्य की चिंता से मुक्त हो सकें। उन्होंने ‘ डेटिंग ‘ देने वाले युवकों- युवतियों के लिए भी समुचित सुविधाएं उपलब्ध करवाईं। वे सदैव युवाओं को प्रोत्साहित करते रहे। कहते - मस्त रहो मस्ती में, आग लगे बस्ती में। अपनी मस्ती के लिए घर पर चोरी भी करनी पड़े तो करो । मम्मी के गहने बेचने पड़े तो बेचो । खुशी है कि युवाओं पर समाजसेवी जी के उपदेशों का सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। वे उनके बताए मार्ग पर चलते हुए भांति भांति के नशे करके स्वयं अपने को भूलते रहे हैं । समाजसेवी जी के ऐसे सामाजिक सद्कार्यों का उल्लेख नहीं करके भी सभी वर्गों के वक्तागण उनके अविस्मरणीय योगदान का गुणगान कर रहे हैं ।

शोक सभा चल रही है ।

बुलाकी शर्मा

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