‘बीकानेर की संस्कृति, सबका सांझा सीर, दाऊजी मेरे देवता, नौगजा मेरे पीर...’

Bikaner News - हमारा शहर बीकाणा अलमस्त-फक्कड़ और मनमौजी जीवनशैली वाला। जो चौक-चौक, गळी़-गुवाड़ और चौकी-पाटों पर धड़कता है-जीता है।...

Apr 07, 2020, 07:25 AM IST

हमारा शहर बीकाणा अलमस्त-फक्कड़ और मनमौजी जीवनशैली वाला। जो चौक-चौक, गळी़-गुवाड़ और चौकी-पाटों पर धड़कता है-जीता है। अपने से ज्यादा अपनों-परायों के लिए। अपने 532 वर्षों के कई उतार-चढ़ाव के साक्षी रहे बीकाणै ने, कभी भी अपनी पहचान को खंडित नहीं होने दिया। चाहे कैसा भी दौर एवं कैसी भी विपरीत परिस्थितियां आई हो। पर बीकाणा हमेशा अपनी साझा संस्कृति को संवाई करता रहा है-

‘बीकानेर की संस्कृति, सबका सांझा सीर।

दाऊजी मेरे देवता, नौगजा मेरे पीर।’

पर अचानक कोरोना महामारी की काली आंधी आई। कोरोनासुर का मारक प्रहार। इससे पूरे विश्व के साथ सम्पूर्ण भारत भी इससे नहीं बच सका। संक्रमण से सुरक्षा के लिए देश-प्रदेश में लोकडाउन करना पड़ा। घर से बाहर निकलने पर पाबन्दी और कहीं-कहीं कर्फ्यू। संक्रमण और मौत के आंकड़े बढते गये जिससे ओर चिंताएं बढ़ने लगी और हमारा दायित्व भी ओर अधिक बढ़ने लगा, हमें अपने आप पर शासन के साथ अनुशासन रखना ही है। पूरा शहर खामोश-हर तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा। घर की देहरी उलांघना, यानि लक्ष्मण रेखा उलांघना हो गया है। बीकानेर की जनता ने इस सुरक्षा व्यवस्था में पूर्ण सहयोग दिया है और कठोरता से सहयोग देना भी चाहिए।

इस घरबन्दी और घरवास ने बीकानेर की जनता और विशेषतः सृजनधर्मियों ने सकारात्मक एवं रचनात्मक रूप में स्वीकार किया। अपनी-अपनी विधाओं में सृजन कर समय का सदुपयोग कर रहे हैं। अध्ययन, चिंतन-मनन लेखन, अधूरी रचनाओं को पूर्ण करना, नई का शुभारंभ करना। चित्रकारों द्वारा नए-नए चित्र बनाना, नाटककारों द्वारा नाटक लिखना, रंगमंच प्रस्तुतियों के लिए पाण्डुलिपियाें को हर दृष्टि से पूर्ण करना कवियों द्वारा काव्य रचना के साथ-साथ ऑनलाइन कवि गोष्ठियां करना, मोबाइल पर साहित्यिक विचार विमर्श करना। स्वाध्याय करना, शहर में सृजनात्मक एवं रचनात्मक विकास कार्यों को अपनाया।

ऐसे में समय का सही उपयोग करना मेरे लिए भी जरूरी था। अतः मैंने अपनी प्रकाशनाधीन पाण्डुलिपियों को सुधारने, संवारने का काम शुरू किया, ताकि वे शीघ्र प्रकाशित हो सकें। कम्पोज हुई का प्रूफ शोधन भी कर रहा हूं। कोरोना से बचाव के लिए क्या-क्या सावधानियां व सतर्कताएं रखनी चाहिए, उसके लिए रोज फेसबुक पर पोस्ट करता हूं। परिवार और बाल बच्चों के साथ भी समय बिताता हूं। और अपने बचपन को और बाल मनोविज्ञान को पुनः समझने का उपक्रम कर रहा हूं। ऐसा लगा इस दौर में शायद छोटे बच्चे हमसे ज्यादा सजग है। आज कोरोना देश के सामने एक गंभीर चुनौती के रूप में आया है। इस विकट घड़ी में हम सभी को सुरक्षा के नियमों एवं अन्य आदेशों की कठोरता से पालना करना व हर स्तर पर सहयोग देना हमारा मानवीय एवं राष्ट्रीय कर्तव्य है। इस क्षेत्र में जो भी लोग एवं संस्थाएं जनहित में काम कर रहे हैं, उन्हें सहयोग ही नहीं अपितु उनकी सेवाओं का सम्मान करना एवं प्रोत्साहित करना भी अत्यावश्यक है। आज डॉक्टर, नर्सेज, स्वास्थ्यकर्मी, सफाईकर्मी, पुलिसकर्मी, आदि अपनी जान की परवाह न करके जनसुरक्षा एवं व्यवस्था कार्य में लगे है, वे वंदनीय हैं। लखदाद है-ऐसे कोरोना कर्मयोगियों का समाज व सता को आभार मानना चाहिए। साथ ही हमारे मीडियाकर्मी जो भी जान-जोखिम में डालकर शहर-प्रदेश देश की पल-पल की कवरेज कर रहे है साथ ही अनेकों कठिनाइयों का सामना कर रहे है। उनका भी अभिनन्दन। सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, बैंकों का स्टाफ तथा अन्य सभी संवर्ग के प्रति आदरभाव रखना अत्यावश्यक है। इसी प्रकार उन जनसेवी संस्थान एवं दानवीर जो अन्न-धन आदि प्रदान कर जरूरतमंदों की आवश्यकताएं पूरी कर रहे हैं, स्तुत्य है।

आज के हालातों में बीकाणै की नारी शक्ति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, वो अपने परिवार को हमेशा की तरह एक सूत्र में बांधे अपनी आम दैनिक जीवन शैली से अधिक सक्रिय होकर सूत्रधार की भूमिका का बखूबी निर्वहन कर रही है। ऐसी नगर की बहु-बेटियाँ भी नमन योग्य है, ऋणी हैं हम उनके।

इस विकट समय में डरने या घबराने की जरूरत नहीं है। क्योंकि हर रात के बात सवेरा आता ही है। रात जितनी काली होगी-सवेरा उतना ही सुनहरा होगा। हमारे देश की एकता कोरोनासुर का अवश्य सर्वनाश करेगी। इसी तरह महरूम साहिर लुधियानवी के गीत की पंक्तियां भी साहस बढाती है, आशा जगाती है-

रात जितनी भी संगीन होगी।

सुबह उतनी ही रंगीन होगी।।

अंत में हम सब मिलकर शायर दुष्यंत की इन पंक्तियों को अपने साहस-संकल्प-सकारात्मक सोच के साथ पूरा करेंगें-

ये सच है कि पांवों ने बहुत कष्ट उठाए,

पर पांव किसी तरह से राहों पर आए।

‘कोरोना हारेगा-हम जीतेंगे-अवश्य जीतेंगे।’

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