...लफ्ज मत घोलना इबादत में इश्क को इश्तहार मत करना

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Apr 05, 2020, 07:27 AM IST

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बीकानेर, रविवार 05 अप्रैल, 2020

हम आभासी और भ्रमपूर्ण समय में हैं। तनाव और दबाव हमारी नियती है। सुख, दुख, सफलता, विफलता, गौरव, दर्प, भौतिकता और आध्यात्मिकता आदि-आदि सब अपनी-अपनी राह पर हैं। हम भी अपनी-अपनी राह पर है अपनी-अपनी प्यास, अपने-अपने मार्ग, अपने-अपने द्वार, अपनी-अपनी चाह, अपनी-अपनी राह। जीवन एक जययात्रा है जो अविराम है क्योंकि इतिहास बताता है कि जीवन तमाम संकटों, विपदाओं, आपदाओं के बाद भी आगे बढ़ा है और बढ़ेगा भी। इसलिए जीवन एक जययात्रा है। इस समय संस्कृति एक सघन संकट से जूझ रही है। मनुष्यता हैरान-परेशान है। सब कुछ बहुत तेजी से बदल रहा है। पर, प्रकृति आज भी हमेशा की तरह अपने में लीन। मन्द-मन्द बयार में अचानक जीवन को चेतावनी देता कुमार गंधर्व की अद्भुत आवाज में कबीर का उद्घोष रह-रहकर कानों में टकराता है-

उड़ जाएगा, हंस अकेला

जग दर्शन का मेला

कोई भी आपदा-विपदा कभी भी अचानक ही या हवा मंे ही नहीं प्रकट होती है। कुछ संकेत होते हैं कि भावी जीवन खतरे की राह पर है, लेकिन गतिशीलता बल्कि कहें अत्यधिक गतिशीलता के साथ जब सहजता का लोप और अनियंत्रित तेजी के बढ़ते दखल से ही संस्कृति मंे आपदाओं-विपदाओं का प्रवेश होता है। अगर विचारपूर्ण समाज न हो और विकृत जीवन शैली का प्रचंड पराक्रम माथे चढ़कर बोलता हो, तो समय विनाश की लीला देखने को बाध्य होता है। अपनी ही कमियों और कुंठाओं की भरपाई के लिए सारी प्रजाति ही दांव पर लग जाती है। यह भी तथ्य है कि संस्कृति मंे जब-जब धन, विचारहीनता और प्रकृति के प्रति ही नहीं वरन् कहें कि जीवन और अस्तित्व के प्रति असंवेदनशीलता का विस्तार होता है, तब-तब समाज को नई आपदाओं-विपदाओं से दो हाथ होने के लिए तत्पर होना पड़ता है। बीज से पेड़ और भ्रूण से मनुष्य बनने की प्रक्रिया पर्याप्त धीमी है। पूर्ण नियंत्रित है। अनुशासित है। यानी साफ है कि जीवन विकास के लिए धैर्य सबसे बड़ा धन है। शक्ति है। इन दिनों हम अनावश्यक, अनियंत्रित और उद्दाम आवेग से भरे जीवन मंे धंसते ही जा रहे हैं। हम भूल रहे हैं कि प्रकृति और जीवन ने धैर्य से जुड़कर ही अब तक की यात्रा को आनन्दपूर्ण बनाया है। देखिये-हमारी नदियां, हवाएं सब कुछ तो धीमेपन से भरपूर है। तेज हवाओं को हवा नहीं, तूफान कहते हैं और विकराल एवं प्रचंड वेग से बहने वाली नदियों को नद कहा जाता है, नदी नहीं। तूफान और नद जीवन विकास के कारक नहीं है। अपनी प्रकृतिक गति से बहती नदियां और हवाएं जीवन के लिए अनुकूल साबित होती है। आज का उतावला और आवेगभरा मन प्रश्न कर सकता है कि धीमेपन की इतनी वकालत क्यों? ध्यान रहे धीमी गति से सोच की गति पर प्रभाव नहीं पड़ता न ही वह मंद होती है। जल्दी अच्छा शब्द है, पर जल्दबाजी बुरी चीज।

मुझे याद आ रही है कालजयी कवि जयशंकर प्रसाद की अमरकृति कामायनी की ये पंक्तियां-

प्रकृति रही दुर्जेय पराजित

हम सब थे भूले मद में

भोले थे, तिरते केवल शब्द

विलासिता के नद में

वे सब डूबे, डूबा उनका विभव

बन गया पारावार

उमड़ रहा था देव-सुखों पर

दुःख-जलधि का नाद अपार

संस्कृति के जानकार लोग तो सदैव ही कहते आ रहे हैं कि मनुष्य जिन चीजांे के बारे मंे कम जानता-समझता है, उन पर सबसे तेज प्रतिक्रियाएँ करता है। देख रहा हूं कि संकट के इस अत्यन्त संवेदनशील समय मंे निश्छल मानव धर्म की राह पर लोग आगे आ रहे हैं। लेकिन जीवन को सतही दृष्टि से देखने-समझने वाले हमारे कुछ अपरिपक्व सहचर इस पावन अनुष्ठान को एक प्रायोजित उत्सव की तरह ले रहे हैं। वे इसे व्यक्तिगत ओर गौरवपूर्ण उपस्थिति का अनूठा अवसर बनाने में लगे हैं। जो लोग मदद कर रहे हैं, उन्हें कोटि-कोटि नमन। जो उन्हें प्रेरित कर रहे हैं, उन्हें भी नमन। बस, प्रार्थना इतनी-सी कि यह अहसान जताने का नहीं, अहसास कराने का समय है। आत्मविज्ञापन और प्रचार-प्रसार हमारी संस्कृति का अहम् हिस्सा कभी नहीं रहे हैं। कोई जिज्ञासा रख सकता है कि आत्मविज्ञापन और प्रचार से दूर रहने की यह नसीहत क्यों? तो इसके उत्तर में एक सामान्य तथ्य है कि प्रकाश हमारे सामने हों, तो आंखें चौधियां जाती हैं। लेकिन वही प्रकाश हमारे पीछे हो, तो आगे का रास्ता साफ एवं स्पष्ट नजर आने लगता है। इसलिए हमारी परम्परा मंे आत्मविज्ञापन एवं प्रचार-प्रसार से दूरी बनाए रखी जाती रही है। वैसे भी लोक में एक कहावत है कि-गाजै सौ बरसै नहिं यानी जो बादल अत्यधिक गरजते हैं वे प्रायः बरसते नहीं अगर बरस भी जाय तो अनुभव यह बताता है कि मात्रा अत्यल्प होती है। कहने वाले करते नहीं और करने वाले कुछ कहते नहीं है। एक शायर ने कहा भी है कि -

लफ्ज मत घोलना इबादत में

इश्क को इश्तहार मत करना

हमारी संस्कृति मंे आय से ज्यादा इसके सम्यक् व्यय मंे और लाभ से ज्यादा शुभ को अधिक महत्त्व दिया गया है। हमारा अपना दैनिक जीवन इसका उदाहरण है। आप देखिये कि हमारे यहां दान, दक्षिणा, मान, मर्यादा न्यौछावर की प्रधानता है। यानी दिये जाने पर जोर है। उसके लिए किसी शोर, तस्वीर और उत्सवधर्मिता का प्रावधान नहीं है। हमारे यहाँ तो घर के दरवाजों पर भी पहले शुभ फिर लाभ लिखा जाता है। यानी हमारी संस्कृति शुभ प्रधान है, लाभ प्रधान नहीं है।

इस विकट समय और विपरित परिस्थतियों में मदद का उत्स्वीकरण, प्रस्तुतीकरण एक प्रकार की सामाजिक अश्लीलता है। हम सब पर मनुष्य ही नहीं वरन् समस्त प्राणिजगत के गौरव, गरिमा और विकास हेतु उचित आपदा प्रबंधन का गुरुतर दायित्व है। यह समय आपदा को उत्सव की तरह लेने का नहीं है, न ही नायकत्व निर्धारण करने का। हो सके तो इससे बचिए। सामान्यतः हम यह समझते हैं कि परिवर्तन के साथ नए रास्ते, नए अवसर आते हैं। पर यह जरूरी नहीं है कि चीजें उसी रूप व परिस्थिति अनुसार ही होंगी, जैसा हम चाहते हैं। हमें विज्ञान के नेतृत्व मंे आगे बढ़ना है। अपनी जययात्रा जारी रखनी है। लेकिन इस पर भी पर्याप्त चिंतन करना है कि विज्ञान वह है जो जीवन को सहज बनाए, सभीप्रकार की असहजताओं से मुक्त करे।

हमारी संस्कृति खोज प्रधान संस्कृति रही है। इतिहास साक्षी है कि हमने रोग के ऊपरी लक्षणों को कभी महत्त्व नहीं दिया चाहे वह रोग शरीर का हो या संस्कृति का। इसलिए हमारे निदान भी तात्त्कालिक न होकर दीर्घकालिक हैं। यह समय हमारी भावुकता को सँवारने का हैं, हिलोरों से भटकने का नहीं। आयुर्वेद मंे पहले रोगी के लक्षणों की पहचान, फिर जीवन शैली को संज्ञान मंे लाया जाता है। पश्चात् उसके मूल कारण की जड़ तक जाकर उसका निवारण करने की कोशिश की जाती है। ठीक यही विधि महात्मा बुद्ध ने भी मनुष्यता के उपचार हेतु अपना थी। हमारी पहली प्राथमिकता यह है कि हम अपनी संस्कृति के रोग की पहचान करें, जीवन शैली मंे आए बदलावों के कारणों को गहराई से जाने, उनकी पहचान कर निराकरण के पथ पर आगे बढ़ें। हमारा अहंकार दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। इसके मूल में जीवन शैली से ऋण (तीन ऋण) भावना का लोप है। त्रिऋण के प्रभाव के चलते जीवन संयमित था। इस पर विचार करना होगा कि कैसे व किस तरह आधुनिक जीवन शैली मंे भी इनका पुनः प्रवेश हो। चलते-चलते दो शब्दों पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। ये शब्द हैं सम्पन्नता और समृद्धि। संपन्नता का व्यक्तिगत से निकट का रिश्ता है, समृद्धि का सामाजिकता से। अतः हमें सम्पन्नता से समृद्धि की ओर बढ़ना है। हमंे आत्मवान, आत्मचेतस होने की राह पर अग्रसर होना है।

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