मां कात्यायनी की पूजा, शहद अर्पण करने से बढ़ती है सुंंदरता

Bikaner News - दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। नवरात्रा के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन...

Mar 30, 2020, 07:12 AM IST

दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। नवरात्रा के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन ‘आज्ञा’ चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्म जन्मांतर समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। ज्योतिर्विद पंडित हरिनारायण व्यास मन्नासा के अनुसार मां कात्यायनी काे शहद अर्पण करने से सुंदरता बढ़ती है।

कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना की। कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो। मां भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं। इनका गुण शोधकार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं। यह वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर पूजी गईं।

मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की गई थी। इसीलिए यह ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। यह स्वर्ण के समान चमकीली हैं और भास्वर हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। दायीं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। मां के बांयी तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है।

मां कात्‍यायनी की पूजा विधि

} नवरात्रि के छठे दिन यानी कि षष्‍ठी को स्‍नान कर लाल या पीले रंग के वस्‍त्र पहनें

} सबसे पहले घर के पूजा स्‍थान नया मंदिर में देवी कात्‍यायनी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें

} अब गंगाजल से छिड़काव कर शुद्धिकरण करें

} अब मां की प्रतिमा के आगे दीपक रखें

} अब हाथ में फूल लेकर मां को प्रणाम कर उनका ध्‍यान करें

} इसके बाद उन्‍हें पीले फूल, कच्‍ची हल्‍दी की गांठ और शहद अर्पित करें

} धूप-दीपक से मां की आरती उतारें

} आरती के बाद सभी में प्रसाद वितरित कर स्‍वयं भी ग्रहण करें

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