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रंगकर्म यानि परंपराअाें का विस्तार, समाज की वाणी, जीवन मूल्याें की यात्रा, नाट्य, जीवन और मनुष्यता काे श्रेष्ठ बनाने का माध्यम

एक वर्ष पहले
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पांचवा पांच दिवसीय बीकानेर थिएटर फेस्टिवल का समापन रविवार काे किया गया। इस माैके पर फिल्म अभिनेता अाैर रंगकर्मी अखिलेंद्र मिश्र के साथ रंग-संवाद का अायाेजन कर रंगकर्म के विविध अायामाें पर चर्चा की गई वहीं अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में समापन दिवस पर मंचित सभी नाटक नारी मन की भावनाअाें अाैर समय की विसंगतियाें अाैर क्रूरताअाें का सामना जीवटता के साथ कर रही महिलाअाें के भीतर की व्यथाअाें पर केंद्रित रहे। टीएम अाॅडिटाेरियम में फेस्टिवल के समापन माैके पर सहयाेगियाें अाैर रंगकर्मियाें का अभिनंदन किया गया। समापन पर अाभार सुधेश व्यास ने जताया। इस दाैरान अनेक गणमान्यजन माैजूद थे।

पांचाली- परिवार के बीच परिवार से ही प्रताड़ना सहता नारी मन

पांचाली, पांच पतियाें अाैर अजेय याेद्धाअाें के परिवार की बहू द्राेपदी का सबके सामने अपमान। अपमान भी एेसा कि काेई भी महिला इस अपमान काे सहने की कल्पना तक भी नहीं कर सकती। एेसे में द्राेपदी का अकल्पनीय अपमान सहना। अपने परिवार की असहाय कमजाेर साेच अाैर परिवार के मुखियाअाें का इस असहनीय अपमान काे अपनी नजराें के सामने देखकर भी माैन से दुखी द्राेपदी की पीड़ा काे उभारते मुखियाअाें काे ललकारते नाटक पांचाली का मंचन टीएम अाॅडिटाेरियम में अमित तिवारी के निर्देशन में किया गया। नाटक में मंदाकिनी जाेशी ने अपने संवादाें से द्राेपदी की संवेदनाअाें काे साकार किया।

रियाे- महिला मन की संवेदना अाैर पीड़ा भरी व्यथा

हर युग, हर दाैर में पुरुषसत्तात्मक समाज में नारी मन की संवेदनाअाें अाैर उसकी काेमल भावनाअाें काे राैंदा गया है। पर हर परिस्थिति हर विपदा काे सहते हुए भी नारी ने अपनी जिम्मेदारियाें काे शिद्दत के साथ निभाया है। बदले में कुछ नहीं चाहा। सिवाय अात्मसम्मान के। इसी अात्मसम्मान काे पाने के लिए शाेषित हाेकर भी दुनियां से लाेहा लेती महिला की कहानी काे नाटक रियाे में मंचित किया गया। टीएम अाॅडिटाेरियम में अांद्रे व बेतिना के निर्देशन अाैर अभिनय के साथ नाटक का मंचन करते हुए नाटक के जरिए महिलाअाें काे अात्मसम्मान देने का अाह्वान किया गया। वहीं इस दाैरान नाटक एलादिदि का मंचन भी किया गया।

अ वूमन अलाेन- माैन काे ताेड़, निकृष्ट साेच के लाेगाें काे सबक

पुरुष सत्ता की बर्बरता से घर में कैदी की तरह जिंदगी बीता रही महिला। घरेलु जिम्मेदारियाें काे निभाने के बाद भी राेज प्रताड़ना का शिकार हाेना। निकृष्ट साेच के लाेगाें से बचते मजबूर हाेकर जीवन काे जीना। इन सबके चलते अवसाद, पागलपन का शिकार हाेकर भी चुप हाे चुकी महिला अाैर फिर एक अन्य महिला की प्रेरणा से माैन काे ताेड़ विराेध करने की बात कहते नाटक अ वूमन अलाेन का मंचन रेलवे अाॅडिटाेरियम में उम्मेद भाटी के निर्देशन में किया गया। नाटक में पूजा जाेशी, जयंत कच्छावा, जयवर्धन सिंह अाैर नवीन रतावा ने अभिनय किया।

कुरेदने दाे- शाेषण से पीड़ित नारी मन की भावनाअाें की अभिव्यक्ति

नारी मन की संवेदनाअाें काे राैंदते शाेषण की शिकार हाेती महिला मन के अथाह दुखाें की कहानी। नारी मन की संवेदनाअाें काे कुचलते पुरुष प्रधान युग में महिला की दर्द भरी दास्तान अाैर उस दर्द से अपने बूते बाहर निकलकर संघर्ष करते जुल्म सहते सपनाें काे पूरा करने वाली एक महिला की कहानी काे नाटक कुरेदने दाे के माध्यम से साकार किया गया। लेखिका इस्मत चुगताई की लिखी दाे कहानियाें लिहाफ अाैर दाे हाथ पर केंद्रित नाटक का मंचन टाउन हाॅल में नम्रता शर्मा के निर्देशन में किया गया। नाटक में नम्रता, अमित, अमनदीप, अमित, राजपाल अाैर अार्यन ने अभिनय किया।

मंचन- नारी मन की संवेदनाअाें काे मंच पर किया साकार

द कट- कुप्रथा का मुखर विराेध, सिस्टम काे ललकार


समाज के अभिन्न अंग महिलाअाें पर प्रथा काे कुप्रथा में बदलकर उनका शाेषण करते हुए उनके जीवन काे अंधकार में डूबाे देना। इस शाेषण काे सहते-सहते एक महिला का विद्राेही हाे जाना। खुलकर समाज में फैली कुप्रथा का विराेध करना। समाज अाैर शाेषण कर रहे सिस्टम काे चुनाैती देकर उन्हें कुप्रथा से उबारने की कहानी द कट नाटक का मंचन रेलवे अाॅडिटाेरियम में शर्वरी लहाड़े के निर्देशन में किया गया। नाटक में मानसी, उन्नति, रेणु, सीमा, अपर्णा, रूपाली, रेणुका, सायली, वैभव, मृण्मयी, राजेंद्र, गायत्री, काैस्तुभ, व्यंकटेश, चिन्मय, राहुल, दीपक, अंजली ने अभिनय किया।


बीकानेर| बीकानेर थिएटर फेस्टिवल के पांचवे िदन समापन माैके पर रविवार काे 6 नाटकाें का मंचन किया गया। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के माैके पर फेस्टिवल के अंतिम दिन मंचित सभी नाटक महिला अभिव्यक्तियाें पर केंद्रित रहे। नाटकाें में महिलाअाें की व्यथाअाें के साथ ही उनके भीतर के दर्द काे सामने रखते हुए महिलाअाें के सपनाें काे पूरा करने का संदेश दिया गया।


रंग-संवाद... अखिलेंद्र बाेले किरदार अाैर श्राेताअाें के यथार्थ का मिलन है नाटक

नाटक यानि साहित्य का संसार। शब्दाें काे प्रसार। भावनाअाें का भंडार। परंपराअाें का विस्तार। रंगकर्म का उद्गार। समाज का दर्पण। व्यक्तित्व अाैर मनुष्यता का निखार। अभिनेता का समर्पण-तर्पण। मूलाधार से सहत्राधार की यात्रा। फिल्म अभिनेता अाैर रंगकर्मी अखिलेंद्र मिश्र ने रंगकर्म की अपनी अब तक की यात्रा के पड़ावाें के संस्मरण साझा करते हुए नाट्य मंचन की महत्ता बताई। जीवन में नाटक के महत्व काे सामने रखते मिश्र बाेले जीवन का असल स्वाद ही नाटक है। नाटक जीवन काे महकाता है। प्रासंगिकता पर कहा नाटक किरदार अाैर दर्शक के दाे यथार्थाें का मिलन है। बदलते स्वरूप काे बदलने की बात कहते हुए कहा हम जड़ाें काे भूलने लगे है। हम भूल चुके है कि प्रकृति का संवर्धन करना हाे ताे जड़ाें काे सींचना पड़ता है। हम यह भूला बैठे है कि सृष्टि में कुछ भी नकारात्मक नहीं है। अपने में सकारात्मकता रहे एेसे प्रयास हर पल करने चाहिए। इस दाैरान डाॅ.चंचला पाठक ने नाट्य कर्म पर मिश्र से संवाद किया। संवाद के माैके पर बाफना एकेडमी के सीईअाे डाॅ.परमजीत सिंह वाेहरा, कमल रंगा, संगीता भटनागर, विजिया राठाैड़, सीमा सिंह ने मिश्र का अभिनंदन किया।
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